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चीन-भारत विवाद: जब इंदिरा ने चीन को चखाया था मजा!

चीन की यह रणनीति रही है कि वह दूसरे देश की सीमा में घुसकर उसे ही सीमा छोड़ने को मजबूर करता है

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Jul 07, 2017 01:06 PM IST

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चीन-भारत विवाद: जब इंदिरा ने चीन को चखाया था मजा!

चीन की सीमा उसकी सेना के साथ आगे बढ़ती रहती है. जितना क्षेत्र वो दबा लेते हैं, वहां तक उनकी सीमा बन जाती है.

नेहरू ने 8 नवंबर 1962 को लोकसभा में यह बात कही थी. उस समय चीन भारत पर हमला कर चुका था. नेहरू ने सदन के सामने युद्ध के हालात रखे थे. चीन के हमले से निपटने के लिए 26 अक्टूबर को देश में इमरजेंसी लगा दी गई थी.

चीन के शोर के पीछे का सच?

आज चीन हल्ला मचा रहा है कि डोकलाम में भारत की फौज चीन की सीमा में घुस गई है. यह पढ़कर एक मिनट के लिए ऐसा लग सकता है कि भारत चीन पर भारी पड़ रहा है. लेकिन हकीकत इससे दूर है. अाप अभी भूले नहीं होंगे कि सितंबर 2014 में देश के माथे (लद्दाख) पर जब चीनी सेना सवार थी, तो हमारी सरकार चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को साबरमती के किनारे झूले झूला रही थी. हमारी इतनी हिम्मत और ऐसी जुर्रत कि हम चीन की सीमा में घुस जाएं. और अगर ऐसा करते तो क्या हम चुप रहते? हम सर्जिकल स्ट्राइक करते हैं तो पूरी दुनिया में इसके चर्चे होते हैं. म्यांमार में सैन्य कार्रवाई की तो 'घुस कर मारा, घुस कर मारा' इतनी बार बोला कि साथी देश भी असहज हो उठा.

खतरनाक है चीन का स्टाइल?

अलर्ट हो जाएं, चीन का यह पुराना स्टाइल है. चढ़ाई करने से पहले दुनिया में हल्ला मचा देना कि 'चीन बस अपनी सीमा की रक्षा कर रहा है'. 1962 में भी उसने यही किया था. तब भी चीन ने हमला करने से पहले भारतीय सैनिकों के घुसपैठ करने की बात की थी. तिब्बत पर जब उसने कब्जा किया था तो वहां के प्रशासन को कहा था कि तिब्बत को मुक्त करो. भारत के अक्सई चिन पर कब्जा कर उसने इसे चीन का एरिया बता रखा है.

डोकलाम में आज के हालात पर भारत सरकार खुलकर नहीं बोल रही है कि हमारी सेना चीन में नहीं घुसी है, बल्कि वह चीन की सेना को बॉर्डर पर रोक रही है. 1962 में चीनी आक्रमण के बाद नेहरू ने लोकसभा में साफ-साफ चीन के छलावे के बारे में बताया था। उन्होंने कहा था...

'यह कहना की हमने चीन पर हमला किया है, एक दुरंगी चाल है, जिसे मेरे सीधे सादे आदमी के लिए समझ सकना मुश्किल है. क्या यह संभव है कि हम अपने ऊपर ही, अपने देश की जमीन पर ही हमला करें और वे हमारे क्षेत्र के पहाड़ों से उतर कर उसकी रक्षा करें? अजीब बात है, लोग अपनी करतूतों को न्यायसंगत बनाने के लिए किस हद तक जा सकते हैं.'

डोकलाम क्यों है अहम?

डोकलाम में चीन सड़क बना रहा है और आर्मी बेस मजबूत कर रहा है. वह एरिया भारत के लिए इतना संवेदनशील है कि नॉर्थ ईस्ट के राज्यों को जोड़ने वाला 20 किलोमीटर चौड़ा गलियारा चीन की सेना के जद में आ गया है.

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मैप में जब इसे देखेंगे तो इसका आकार गैंडे की सिंग जैसा दिखता है. स्ट्रैटेजिक लैंग्वेज में इसे चिकेन नेक (मुर्गे की गर्दन) कहते हैं, जिसे झटके में अलग करने का खतरा होता है. भारत की सेना का पक्ष है कि रोड बनाने के बहाने चीन की सेना भूटान और भारत के बॉर्डर की अनदेखी कर रही है.

भारत की सुरक्षा के लिहाज से भूटान इतना अहम है कि 1959 में लोकसभा में नेहरू ने ऐलान कर दिया था कि 'भूटान पर कोई भी हमला भारत पर हमला माना जाएगा.' दरअसल तब तक चीन तिब्बत पर कब्जा कर चुका था और सांस्कृतिक-प्रशासनिक तरीके से भूटान पूरी तरह तिब्बत से जुड़ा हुआ था. अपने अभियान को पूरा करने के लिए चीन कभी भी भूटान को घेर सकता था. बफर स्टेट के तौर पर तिब्बत के खत्म होने के बाद भूटान भारत के लिए ज्यादा अहम स्ट्रैटेजिक प्वाइंट हो गया है. यही वजह रही कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी का पहला विदेश दौरा भूटान ही था.

चीन की आदत है धमकी देना

चीन के राजदूत लोऊ झोउई ने धमकी भरे लहजे में कहा है कि डोकलाम पर भारत फैसला करे कि इस विवाद को कैसे निपटाना है. गेंद भारत के पाले में है और उसे ही फैसला करना है. डिप्लोमैटिक लैंग्वेज में अगर कहा जाता है कि सैन्य विकल्प और बातचीत, दो रास्ते हैं और इसका फैसला भारत काे करना है. तो इसका सीधा मतलब है कि चीन युद्ध करने की धमकी दे रहा है. चीन ने शर्त रखी है कि सबसे पहले भारत की सेना डोकलाम से हटे. भारत की सेना कहां से हटे? अपना बॉर्डर छोड़कर पीछे हट जाए?

क्या है चीन का डबल गेम?

पहले दूसरे की सीमा में घुस जाओ और फिर वहां से दूसरे को हटने को बोलो... श्रीलंका में एक अखबार ने 1962 में चीन की इस आक्रामक रणनीति को दिलचस्प अंदाज में समझाया था...

वकील: तुमने बैंक में जबरदस्ती घुसकर, चौकीदार को मारने के बाद, वहां की संपत्ति हथियाई या नहीं?

मुल्जिम: बिल्कुल नहीं. मैंने तो पहले ही यह बयान प्रकाशित करवा दिया था कि मैं बैंक को अपनी संपत्ति मानता हूं. चूंकि चौकीदार ने मुझे रोकने की कोशिश की, मुझे आत्मरक्षा के लिए मारना पड़ा.

मजिस्ट्रेट: लेकिन क्या बैंक अथवा अन्य अधिकारियों ने तुम्हारा दावा माना था कि बैंक तुम्हारी संपत्ति है?

मुल्जिम: यही तो बात है. वे यह बात न मानकर हालात को बिगाड़ना चाहते थे. मैं हिंसा बिल्कुल नहीं चाहता था. लेकिन पहली दुश्मनी चौकीदार ने निकाली. उसने मुझे वहां नहीं घुसने दिया, जिसे मैं पहले ही अपनी संपत्ति घोषित कर चुका हूं. मैं तो खून खराबे को अंतिम उपाय मानता था. अगर वे शांत रहते तो मैं वहां बिना किसी खून खराबे के जाने वाले था.

2014 में फिल्म आई थी हैदर. उसमें शाहिद का कुछ मिनटों का मोनोलॉग है, जिसमें ऐसी ही पॉलिसी को वह चुत्स्पा बताता है.

इंदिरा गांधी ने बदल दिया समीकरण

सिक्किम सेक्टर में 1967 में भी चीनी सेना और भारतीय फौज आमने सामने आई थी. 1962 की लड़ाई के महज 5 साल बाद ही चीन इस झड़प में मात खा गया था. भारत ने तब कोई शेखी नहीं बघारी थी, क्योंकि हमारे 99 सैनिक शहीद हुए थे. यह अलग बात है कि दुश्मन को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी. चीन के अपने आकलन में ही उसके 400 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे. वह इंदिरा गांधी का समय था.

आगे चलकर उन्होंने सिक्किम को भारत में मिला लिया. वो भी बिना कोई हो-हल्ला किये. लेकिन यह भी सैन्य कार्रवाई ही थी. सिक्किम के राजतन्त्र के खिलाफ वहां की बागी जनता का साथ देने भारत की सेना 1975 में गंगटोक तक घुस गयी थी. जनमत संग्रह के द्वारा सिक्किम को भारत में मिला लिया गया. यह कार्रवाई इतनी तेज थी की चीन को भी तब समझ नहीं आया था की उसकी नाक के नीचे से क्या निकल गया. चीन की मीडिया ने इसकी आलोचना की थी और कहा था की दो लाख की आबादी वाले देश में भारत ने एक लाख सेना भेज दी.

हालांकि सिक्किम चीन का हिस्सा कभी नहीं रहा था और तिब्बत से इसका डिमार्केशन ब्रिटिश काल में ही हो गया था. पर चीन का क्या भरोसा. तिब्बत भी तो उस समय चीन में नहीं था जब आज़ाद भारत और कम्युनिस्ट चीन का उदय हुआ था.

रेफरेंस तिब्बती संसदीय एवं नीति शोध केंद्र, नई दिल्ली से प्रकाशित लेखों के संकलन भारत-चीन संबंध ओर तिब्बत -एक पुनर्विचार से

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