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कंबोडिया: चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ से पिछड़ी भारत की 'एक्ट ईस्ट' पॉलिसी

कंबोडिया में भारतीय संस्कृति की गहरी छाप है और जरूरी है कि हम इसका लाभ उठाएं.

Ajay Singh Ajay Singh | Published On: Dec 26, 2016 12:30 PM IST | Updated On: Dec 27, 2016 01:37 PM IST

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कंबोडिया: चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ से पिछड़ी भारत की 'एक्ट ईस्ट' पॉलिसी

नामपेन्ह एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही आपको अपने घर जैसा महसूस होगा. टुक-टुक सेवा (मोटरसाइकिल से चलने वाली गाड़ी) बड़ी तादाद में सड़कों पर दौड़ती दिखेंगी. यहां घर भारत के नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों की राजधानियों में बने घरों जैसे ही हैं.

भारत की छाप कंबोडिया के प्रिय पुराने स्मारकों में आसानी से देखने को मिल जाएगी. लेकिन, इतिहास के साथ इस लिंक से भारत को शायद ही कोई फायदा हो रहा है, क्योंकि कंबोडिया इतिहास के अवशेषों पर आधुनिकता की इमारत खड़ी कर रहा है.

इस चीज से बिल्कुल इनकार नहीं किया जा सकता कि विकास की इस दौड़ में, इंडिया की दक्षिण एशियाई देशों के साथ ताल्लुकात बढ़ाने की ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी, चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड’ की आक्रामक नीति से काफी पीछे है.

चीन कर रहा भारी निवेश

अगर आपको कोई शक है तो नामपेन्ह के इर्दगिर्द देखिए. नामपेन्ह कंबोडिया की राजधानी है. यहां हर जगह आपको चीन का दबदबा दिखाई देगा. आर्थिक ताकत बढ़ने के साथ ही चीन यहां बड़े पैमाने पर रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर रहा है.

मेकॉन्ग नदी के किनारे के साथ-साथ देश के कई हिस्सों में ऊंची और आधुनिक इमारतें नजर आने लगी हैं. मेकॉन्ग का रुतबा यहां हमारे लिए गंगा की तरह ही है जो देश के अलग-अलग हिस्सों से होते हुए गुजरती है.

मेकॉन्ग नदी (फर्स्टपोस्ट/अजय सिंह)

मेकॉन्ग नदी (फर्स्टपोस्ट/अजय सिंह)

लोकतंत्र के नाम पर राजशाही

हकीकत में, कंबोडिया में हुन सेन की अगुवाई में संवैधानिक राजशाही जारी है. हालांकि, देश में लोगों के प्रतिनिधियों का चुनाव होता है, लेकिन यह लोकतंत्र असल में दिखावा भर है. यह अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करता है और ऐसे कारोबारी मौके देता है जिनमें न केवल करों में राहत मिलती है, बल्कि बिजनेस प्रोजेक्ट्स में पूरे विदेशी नियंत्रण की भी मंजूरी है.

नौकरशाही के चलते पिछड़ रहा भारत

चीन, जापान और इंडोनेशिया के व्यवसायी इन उदार नियमों का फायदा उठा रहे हैं और कंबोडिया में जमकर पैसा लगा रहे हैं. भारतीय इस मामले में पिछड़ गए हैं. भारत से कमजोर ताल्लुकात पर गुस्सा निकालते हुए एक बड़े अधिकारी ने कहा, ‘आप हमसे खुलकर संबंध क्यों नहीं रखना चाहते? आप शायद अमेरिका और यूरोप को ज्यादा पसंद करते हैं और एशिया के पूर्वी हिस्से की अनदेखी कर रहे हैं.’

कंबोडियाई सरकार के अधिकारियों और मंत्रियों के साथ कई बार हुई बातचीत से यह जाहिर था कि भारत से फिलहाल किए जा रहे प्रयासों के मुकाबले कहीं ज्यादा की उम्मीद की जाती है.

यह हताशा कंबोडिया में बैठे भारतीय डिप्लोमैटिक स्टाफ में भी साफ दिखाई देती है. सरकार की एक्ट ईस्ट पॉलिसी पर जिस तरह से काम चल रहा है, वह इसकी एक मिसाल है.

भारत सरकार ने सड़क के जरिए म्यांमार होते हुए कंबोडिया को जोड़ने की योजना पेश की थी. एक प्रस्ताव था कि 60 किमी सड़क का एक हिस्सा तैयार किया जाए ताकि कनेक्टिविटी में नई जान डाली जा सके. लेकिन यह पूरा मसला अप्रूवल और जांच-पड़ताल की फाइलों में गुम हो गया.

फेल हो रही मोदी की एक्ट ईस्ट पॉलिसी

साफ है कि प्रधानमंत्री का एक्ट ईस्ट कार्यक्रम भारत में नौकरशाही की भेंट चढ़ चुका है. एक भारतीय डिप्लोमैट ने कहा, ‘चीन के कारोबारियों को इस तरह की दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता है और वे तेजी से फैसले लेने में सक्षम हैं.’

कंबोडिया दक्षिण पूर्व एशिया का एक खास देश है. आधुनिक इतिहास के साथ इसका जुड़ाव 12वीं सदी में भारत के दक्षिणी हिस्से से प्रवास कर पहुंचे शाही परिवार से मिली ऐतिहासिक विरासत के उलट है.

हत्याओं का इतिहास

नामपेन्ह से केवल 10 किमी दूर एक स्मारक है जिसे ‘किलिंग फील्ड’ के नाम से जाना जाता है. मनुष्यों की खोपड़ियों के ढेर म्यूजियम में लगे हुए हैं. ये कंबोडिया के उस भयावह अतीत की याद दिलाते हैं जिसके साथ यह देश जीने को मजबूर है.

किलिंग फील्ड (फर्स्टपोस्ट/अजय सिंह)

किलिंग फील्ड (फर्स्टपोस्ट/अजय सिंह)

पेरिस में पढ़े तानाशाह पोल पोट ने देश में 1975 में सत्ता संभाली. उनके दौर में देश ने असहनीय प्रयोगों और नरसंहार का सामना किया. इससे देश की करीब एक-चौथाई आबादी खत्म हो गई. पोल पोट खुद को क्रांतिकारी कहते थे और उन्होंने राज्य को हत्या करने वाली मशीन बना दिया, जहां क्रांति के नाम पर नरसंहार किए जाते थे.

खमेर रूज नाम से मशहूर पोल पोट की अगुवाई वाली क्रांति का सिद्धांत था, ‘आपको जिंदा रखने से कोई फायदा नहीं है, आपको खत्म करने से कोई नुकसान नहीं है.’ नतीजतन, लोगों की बेवजह हत्याएं की जाती रहीं. हत्याओं के लिए सस्ते तरीकों का इस्तेमाल किया गया क्योंकि गोलियां महंगी पड़ती थीं.

खमेर रूज की ज्यादतियों से बच निकलने वाले और एक बेहतरीन फिल्ममेकर रिथी पेन्ह ने इस दौर का बयान अपनी किताब ‘एलिमिनेशन’ में किया है.

उन्होंने लिखा है, ‘इन अपराधों के पीछे केवल मुट्ठीभर लोगों का दिमाग था. यह ताकतवर विचारधारा थी, एक सख्त संगठन था. जिसका नियंत्रण का जुनून था. पूरी गोपनीयता रखते हुए, लोगों के अधिकारों का हनन करते हुए मौत को सबसे बड़ा संसाधन माना गया. यह एक ह्यूमन प्रोजेक्ट था.’

भारतीय संस्कृति की विरासत अंकोरवाट

इस स्मारक के उलट अंकोरवाट और सिएम रीप के ता प्रोम मंदिरों को देखें. इतिहास की यह विरासत अद्वितीय है.

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अंकोरवाट (फर्स्टपोस्ट/अजय सिंह)

ये महान मंदिर शाही परिवार के धार्मिक झुकाव के आधार पर कभी हिंदू मंदिर तो कभी बौद्ध मठ में बदलते रहे. हालांकि इनकी मूल संरचना अभी भी बची हुई है. इनमें देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन की पेंटिंग्स बनाई हुई हैं. हिंदू धर्म और इसकी कथाओं को भित्तिचित्रों के रूप में उकेरा गया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इन मंदिरों के संरक्षण और कंबोडिया में भारत के सांस्कृतिक इतिहास को बचाने में बड़ा योगदान दिया है.

इन स्मारकों में दिखने वाला पुरातन भारत की तस्वीरें कंबोडिया में हमारे लिए मौजूद असीम संभावनाओं के स्मृति चिह्न हैं. कंबोडिया निश्चित रूप से चाहता है कि भारत इन संभावनाओं का फायदा उठाए. लेकिन, बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ऐसा करेगा?

एक अर्थशास्त्र-शून्य इतिहास नॉस्टेलजिया भरे आनंद से अधिक कुछ नहीं होगा.

(विदेश मंत्रालय के आयोजित किए आसियान मीडिया एक्सचेंज कार्यक्रम से लौटकर)

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