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धरती के पास बचे हैं सिर्फ 100 साल, इंसान को दूसरे ग्रह में तलाशना होगा ठिकाना

हॉकिंग का दावा है कि इंसानों का समय पूरा हो चुका है और वजूद बचाने के लिए अपनी ही धरती को छोड़ना होगा.

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: May 05, 2017 03:07 PM IST

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धरती के पास बचे हैं सिर्फ 100 साल, इंसान को दूसरे ग्रह में तलाशना होगा ठिकाना

क्या धरती का काउंटडाउन शुरू हो गया है? क्या धरती की उम्र सिर्फ 100 साल बची है? क्या 22वीं शताब्दी धरती की तबाही के नाम होगी? क्या मानव सभ्यता धरती पर पूरी तरह 100 साल में खत्म हो जाएगी?

सवाल बहुत सारे हैं क्योंकि सवाल सिर्फ एक जिंदगी का नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता का है. लेकिन इस सवाल को सुलगाया है मशहूर भौतिकशास्त्री स्टीफन हॉकिंग ने. हॉकिंग का कहना है कि धरती सौ साल बाद रहने लायक नहीं बचेगी इसलिए मानव सभ्यता को जिंदा रहने के लिए नई जगह की तलाश करनी चाहिए.

बीबीसी में ‘एक्सपिडिशन न्यू अर्थ’ नाम की डॉक्यूमेंट्री शुरू होने जा रही है जिसमें अंतरिक्ष में इंसानों के लिए नई दुनिया की तलाश होगी. इसी सीरीज में हॉकिंग का दावा है कि इंसानों का समय पूरा हो चुका है और उन्हें अपना वजूद बचाने के लिए अपनी ही धरती को छोड़ना होगा. दरअसल हॉकिंग की इस चिंता की कई बड़ी वजहे हैं.

धरती में जलवायु परिवर्तन, तेजी से बढ़ती जनसंख्या, करीब से गुजरते उल्का पिंडों के टकराने का खतरा तो युद्ध उन्माद में डूबे आक्रमक होते इंसानों के हाथों में न्यूकलियर हथियारों का होना अनिश्चित भविष्य का संकेत है. ऐसे में हॉकिंग का सौ साल का अल्टिमेटम ही सिहरन पैदा करने के लिये काफी है.

आज मंगल ग्रह के खालीपन और चीखते सन्नाटे को धरती के बड़े वैज्ञानिक सुनने और जानने की कोशिश कर रहे हैं. कहीं न कहीं उन्हें ये अहसास है कि मंगल ग्रह भी धरती की तरह सरसब्ज था. फिर अचानक कैसे ये लाल ग्रह खंडहर में तब्दील हो गया जहां सिर्फ सूखी बंजर जमीन और कोना कोना जला हुआ सा नजर आता है. क्या धरती भी मंगल ग्रह की तरह आने वाले समय में किसी बंजर ग्रह की तरह इतिहास बन जाएगी. सवाल कई हैं क्योंकि उसकी वजह कम नहीं.

इंसानी अतिक्रमण ही उसके बेदखल होने की वजह बनेगा

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प्रतीकात्मक तस्वीर

धरती के पर्यावरण का चीरहरण आदि से अनंत की तरफ बढ़ रहा है. धरती की खूबसूरती में इंसानी अतिक्रमण ही उसके बेदखल होने की वजह बनेगा.

नदियों के बहावों को मोड़ना, पहाड़ों को नेस्तनाबूत करना, प्राकृतिक संपदाओं के लिए धरती का कलेजा चीरना जैसे उदाहरण सामने है. इंसान ने अपनी तरक्की के लिये प्रदूषण की परवाह नहीं की. ओजोन परत में छेद होना,  ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्र का सूख जाना भी गहरी नींद में सोए इंसान को जगा नहीं सका.

जहरीली जमीन, आसमान और पानी के बीच इंसान की तरक्की की अंधी होड़ मानव सभ्यता के ताबूत पर आखिरी कील ठोंकने का काम कर रही है.

यही हाल रहा तो एक दिन न पानी होगा न पेट्रोल, न बिजली होगी न कोयला और न खेती होगी न खाने का अन्न.

आर्थिक विकास के लिए धरती का दोहन कर इंसान ने धरती को खोखला कर दिया है.

धरती पर ही कुदरत के वो नजारे अब विलुप्त हो रहे हैं जो कहानी-कविताओं में सुनाई देते हैं. दुर्लभ जीवों पर विलुप्त होने का खतरा है तो चीता जैसे जीव गायब हो चुके हैं.

कटते जंगल और बढ़ते सीमेंट के जंगलों से बने शहरों से निकलता विषैला धुआं, फैक्ट्रियों, कारखानों और मोटर-कारों से निकलता जहर आब-ओ-हवा को गैस चैंबर बनाता जा रहा है. न जमीन पर जीवों के लिये साफ जल और वायु बचा है और न पानी के भीतर मौजूद जीवों के लिये पानी. समुद्र के किनारों पर व्हेल मछलियों का मृत मिलना तो आसमान से पक्षियों का बेसुध होकर जमीन पर गिरना अजब-गजब खबरों में गुम हो जाता है.

व्हेल मछलियों की मौत की क्या है वजह?

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ट्विटर से साभार

एक साल में ही दुनियाभर में तकरीबन पांच सौ व्हेल समुद्र के तटों पर मरी हुई मिलीं. लेकिन इंसान उस सच से मुंह छिपा रहा है कि एक दिन यही घटनाएं उसके साथ भी होने वाली हैं.

बढ़ते प्रदूषण की वजह से कॉर्बन डाइ ऑक्साइड का बढ़ना धरती को गर्म करता जा रहा है. इसी ‘ग्लोबल वार्मिंग’ की वजह से ग्लैशियर सिकुड़ रहे हैं . हिमालयी ग्लैशियरो का लगभग 2077 किमी का इलाका पांच सौ वर्ग किमी सिकुड़ गया है. ग्लैशियर पिघलेंगे तो समुद्रों का जलस्तर बढ़ेगा.

एक रिपोर्ट के मुताबिक समुद्रों का तल 6 से 8 इंच बढ़ चुका है. जाहिर तौर पर समुद्र के किनारों पर बसे शहरों को लहरें लील जाएंगीं. प्रशांत महासागर का टापू किरीबाटी समुद्र में डूब चुका है. यही सच नदियों में बाढ़ के रूप में हर साल दिखाई देता है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, अगर जलवायु परिवर्तन की वजह से धरती की गरमाहट इसी तरह बढ़ती रही तो 2030 तक तकरीबन दस करोड़ लोगों की मौत हो सकती है. धरती का बढ़ता तापमान ही सदी के आखिर में प्रलय की दस्तक दे सकता है.

उत्तराखंड की 4 साल पहले की त्रासदी प्रकृति के प्रकोप का ट्रेलर भर है. खास बात ये है कि इंसानी फितरत अब कुदरत के कहर को भी प्राकृतिक आपदा बता कर संतुलित करने की कोशिश कर रही है. लेकिन सबक नहीं सीख रही.

जलवायु परिवर्तन का आलम ये है कि फ्रांस जैसे देश में लू ने हजारों की जान ली. आबूधाबी में बर्फ गिरी. अमेरिका में समुद्री तूफान और चक्रवात की तीव्रता लगातार बढ़ती जा रही है. अब साल में 30 से ज्यादा चक्रवात आने लगे हैं. यहां तक कि ग्रीनलैंड की बर्फ भी पिघलना शुरू हो गई है. इंसान सिर्फ एक मूकदर्शक की तरह कुदरत के बदलते नियम को किसी अजूबे की तरह निहार रहा है. खैर कर भी क्या सकता है?

महात्मा गांधी ने भी दी थी चेतावनी

mahatma gandhi

गांधी जी ने कहा था कि 'प्रकृति हमारी हर जरूरत को पूरा कर सकती है, लेकिन लालच किसी एक का भी नहीं'. अपने भोग और विलासिता के लिए धरती का दोहन ही मानव सभ्यता के दहन का कारण बनेगा क्योंकि आधुनिक विकास के रास्ते महाविनाश की तरफ बढ़ रहे हैं.

लेकिन स्टीफन हॉकिंग की चिंता एक दूसरे अनर्थ की तरफ भी इशारा कर रही है. पिछले महीने ही हॉकिंग ने कहा था कि न्यूक्लियर और बॉयोलॉजिकल हथियार धरती को पूरी तरह खल्लास कर सकते हैं. महाविनाश के हथियारों की होड़ से पैदा हुई अहं की लड़ाई अब सिर्फ एक चिंगारी का इंतजार कर रही है.

उत्तरी कोरिया और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की असली वजह ही परमाणु हथियार हैं. उत्तरी कोरिया तमाम प्रतिबंधों के बावजूद परमाणु परीक्षण कर रहा है और अमेरिका को खाक में मिला देने की धमकी दे रहा है. अगर अमेरिका की कार्रवाई पर युद्ध भड़का तो वो विश्व युद्ध होगा.

उसके बाद मशहूर वैज्ञानिक आइन्सटाइन की बात ही याद रखने लायक रह जाएगी कि – तीसरे विश्वयुद्ध का पता नहीं लेकिन चौथा विश्वयुद्ध लाठी-डंडों से लड़ा जाएगा. कल्पना की जा सकती है कि विश्वयुद्ध के बाद धरती किसी सुलगते हुए उपले सी लाल नजर आएगी.

अमेरिका और रूस के पास फादर और मदर ऑफ ऑल बॉम्ब हैं. लेकिन धरती को बचाने के लिए कोई धरती पुत्र नजर नहीं आता है. ऐसे में मानव सभ्यता के वजूद पर ही विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है.

एक डरावने भविष्य की तरफ धरती अब आहिस्ता-आहिस्ता नहीं बल्कि तेजी से बढ़ रही है. वक्त अब सौ साल की उम्र में सिमटा हुआ है.

ऐसे में दूसरे ग्रहों में जीवन की तलाश की यात्रा को रोका नहीं जा सकता है.  माना जा रहा है कि अंतरिक्ष में तकरीबन 4600 ग्रह हैं जिनमें 2300 ग्रहों पर इंसानी बस्ती बसाई जा सकती है.

बहरहाल मोटर न्यूरोन नाम की बीमारी से जूझ  रहे 75 साल के स्टीफन हॉकिंग ने कंप्यूटर के जरिये साफ बता दिया कि धरती की उम्र सौ साल भी हो सकती है या फिर उसकी अकाल मृत्यु भी हो सकती है.

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