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गोल्डा मेयर: 'आयरन लेडी' जिसने पूरी दुनिया में ढूंढ-ढूंढ कर मारे देश के दुश्मन

गोल्डा मेयर इजरायल की पहली और दुनिया की तीसरी महिला प्रधानमंत्री थीं

Avinash Dwivedi | Published On: May 03, 2017 09:45 AM IST | Updated On: May 03, 2017 09:55 AM IST

गोल्डा मेयर: 'आयरन लेडी' जिसने पूरी दुनिया में ढूंढ-ढूंढ कर मारे देश के दुश्मन

आतंकवाद से सारी दुनिया बेहाल है. एक ओर कुछ लोग ग्लोबल गांव की अवधारणा को सफल बनाना चाहते हैं. तो कुछ लोग खुद तो कट्टरता की बेड़ियों में जकड़े हुए हैं ही. कोई भी राष्ट्राध्यक्ष सख्ती से आतंकवाद से निपट पाने में सफल नहीं हो रहा.

ऐसे में पूर्व इजरायली प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर का जिक्र जरूर होना चाहिए. ये वो महिला है, जिन्होंने आतंकियों को आतंकित करने की ठानी और ऐसा करके दिखाया भी. जिन्होंने अपने लोगों पर हुए आतंकवादी हमले का बदला लेने के लिए अरब से ही नहीं यूरोप से भी आतंकवादियों को साफ ही कर दिया.

उसी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन आज दुनिया और देश के नेताओं से अपेक्षित है. वरना रोज ही शरणार्थी, सीमावर्ती लोग या कश्मीर में भारतीय जवान मारे जाते रहेंगे और अखबार उनकी गिनती करते रहेंगे, नेता उनकी मौत पर शोक व्यक्त करते रहेंगे.

यूं तो 'बदला' एक बर्बर शब्द है पर कई बार ये घावों को भरने का एक मात्र तरीका होता है. यहां एक ऐसे ही बदले की कहानी सुनाई जा रही है जो करीब 30 सालों तक चलता रहा.

दरअसल, शुरुआत 1972 से होती है. जर्मनी के म्यूनिख में 17वें ओलंपिक खेल शुरू होने जा रहे थे. जर्मनी में ओलंपिक की तैयारियां 1972 के पहले महीनों में पूरी की जानी थीं. उधर लाखों की संख्या में अतिथियों का स्वागत करने के लिए रोज ही शहरों में नए-नए रेस्टोरेंट और होटल खुल रहे थे. दूसरी ओर दुनिया के कुछ देशों में दूसरे ही तरह की तैयारियां चल रही थीं.

सारी दुनिया की नजरें इन खेलों पर जमी हुई थीं. इजरायल भी इन खेलों में भाग ले रहा था. इजरायल ने अपने 28 एथलीट इन खेलों में भेजे थे. हजारों लोग ओलंपिक खेलों को देखने के लिए सारी दुनिया से म्यूनिख आ रहे थे. पर नियति को कुछ और ही मंजूर था.

इसीलिए 1972 के ओलंपिक खेल बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले एथलीट्स के बजाए बिल्कुल ही दूसरी चीजों के लिए याद किए जाते हैं. दरअसल खेलों की शुरुआत से पहले, 5 सितंबर, 1972 को सवेरे 4 बजकर 40 मिनट पर भारी मात्रा में हथियारों के साथ आतंकवादी ओलंपिक गांव में इजरायली खिलाड़ियों के कंपाउंड में घुस आए.

आतंकियों ने अपनी कुछ मांगें मनवाने के लिए इजरायली एथलीट्स को बंदी बना लिया. इस पूरी आतंकी घटना में इजरायल के 11 एथलीट मारे गए. जिसके बाद शुरू हुआ, 'इजरायलियों की मां' कही जाने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर का बदला.

फिलिस्तीनी सुनाना चाहते थे सारी दुनिया को अपनी आवाज

लेबनान का एक आतंकवादी संगठन था, जिसका नाम था 'ब्लैक सेप्टेम्बर'. 'पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन' यानि 'PLO' की एक शाखा भी इन ओलंपिक खेलों के लिए अपने लोगों को ट्रेनिंग दे रही थी.

कारण था कि फिलिस्तीनियों ने भी इन खेलों में भाग लेने का पूरा प्रयास किया था. पर चूंकि वो एक संप्रभु देश नहीं थे इसलिए ओलंपिक कमेटी ने उनकी हिस्सेदारी पर गौर नहीं किया.

फिलिस्तीनी फिर भी अपनी आवाज खेलों में सुनाने के लिए प्रतिबद्ध थे इसलिए उन्होंने इन खेलों से दूसरे ही तरीके से (आतंकवादी घटना के जरिए) जुड़ने का निश्चय किया.

बेरुत में जनवरी, 1972 में उनके चार लोगों ने ओलंपिक के लिए प्लान तैयार किया. पहला था, मोहम्मद यूसुफ नजर, जो कि PLO में तीसरे नंबर पर था और ब्लैक सितंबर से उसके अच्छे संबंध थे.

दूसरा, 'मुहम्मद दाउद हूडा' जिसे अबू दाउद के नाम से भी जाना जाता था और PLO के लिए वो साजिश रचने का काम करता था. तीसरा, 'अली हसन सलामेह' जो कि ब्लैक सेप्टेम्बर का इंटेलिजेंस ऑपरेटिव था और इजरायलियों ने जिसका नाम 'द रेड प्रिंस' रख दिया था.

चौथा, 'अबू बियाद' जो कि PLO इंटेलिजेंस स्टाफ का प्रमुख था. इसके साथ ही ये ब्लैक सेप्टेम्बर का खुफिया प्रमुख भी था.

ये सभी जनवरी की प्लानिंग में मौजूद थे. हालांकि वे उस समय ये नहीं जानते थे कि जो वो करने जा रहे हैं उसका अंत कितना भयावह होगा? एरिक रूलर जो कि एक लेखक और पत्रकार हैं वो अबू बियाद को बहुत अच्छे से जानते हैं. दोनों ने मिलकर एक किताब भी लिखी है. जिसका नाम है, 'माय होम, माय लैंड'.

एरिक कहते हैं, बुरी तरह से फिलिस्तीनियों को परेशान किया जा रहा था और उनका शोषण हो रहा था और दुनिया इसके बारे में जानती तक नहीं थी.

इसलिए इन लोगों ने म्यूनिख में इतना बड़ा आतंकी ऑपरेशन प्लान किया गया ताकि अपने लोगों का हौसला बढ़ा सकें और फिलिस्तीनियों और PLO को दुनिया भर में थोड़ी इज्जत दिला सकें.

खुद जर्मनी के आतंकी गुट भी शामिल थे

ब्लैक सेप्टेम्बर और PLO के एजेंट ये जानते थे कि अगर वो सफल होना चाहते हैं तो उन्हें ओलंपिक गांव के बारे में सारी जानकारी चाहिए होगी. इसलिए 1972 की गर्मियों में PLO ने रेड आर्मी फैक्शन यानी RAF से कांटेक्ट किया.  RAF एक जर्मन आतंकवादी समूह था.

RAF ने अगस्त में ओलंपिक गांव की सारी जानकारी तो ब्लैक सेप्टेम्बर को दी ही साथ ही साथ खिलाड़ियों से जुड़ी सारी जानकारी और उनके रुटीन से जुड़ी सारी जानकारी भी उपलब्ध कराई. यहां तक कि RAF ने आतंकी घटना को अंजाम देने के लिए इन्हें हथियार भी खरीद कर दिए.

गोल्डा मेयर का मानना था, ये सिर्फ आतंकी घटना नहीं, उससे कहीं ज्यादा

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5 सितंबर को, हुड पहने हुए ब्लैक सेप्टेम्बर के आतंकी इजरायली एथलीटों की बिल्डिंग में घुसे. ये आतंकी चप्पा-चप्पा एथलीट्स की खोज में स्कैन करते जा रहे थे. सवेरा होने तक ये आतंकी 9 इजरायली एथलीट्स को पकड़ चुके थे. 1 को उन्होंने घुसते ही मार दिया था और 1 को तब मार दिया जब उसने लड़ने की कोशिश की.

'एस्थर शाखामारोव' जो कि इजरायली धावक थी, औरतों के कंपाउंड में थी इसलिए वो बच गई. इजरायल में गोल्डा मेयर ने सवेरे उठते ही ये खबर सुनी. इसे सुनकर उन्हें सदमा लगा.

गोल्डा का मानना था कि ये घटना बस एक आतंकवादी घटना से कुछ ज्यादा है. यहूदी लोगों को जर्मन धरती पर मारना सीधे जर्मनी में हुए यहूदी नरसंहार की याद दिलाता है.

गोल्डा मेयर को यहूदी मां मानते थे. और गोल्डा मेयर ने ऐसे में महसूस किया कि अपने बच्चों की रक्षा उसका कर्तव्य है. और ऐसे में बदला ही एकमात्र विकल्प है. इजरायल के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटेलिजेंस एंड सिक्योरिटी एजेंसी जिसे दुनिया एक हिब्रू शब्द 'मोसाद' के नाम से जानती है, तलब किए गए. इजरायल की मिलिट्री इंटेलिजेंस के लोग भी इसमें पहुंचे.

बातें हुईं और दोपहर के ढाई बजे इजरायली अधिकारी म्यूनिख पहुंचे. जैसे ही मीडिया बिल्डिंग के बाहर इकट्ठा हुई आतंकियों ने अपनी मांगें रखनी शुरू कर दी. उन्होंने 234 फिलिस्तीन और जर्मन बंदियों की लिस्ट दी और उनको छोड़ने की मांग की. जर्मनी इजरायल की मदद नहीं चाहता था. पर इजरायल राजी नहीं हुआ.

सारे बंधक एथलीट मारे गए, गेम कैंसिल नहीं हुआ

आतंकी बंधक बनाकर ही सारे इजरायली एथलीट्स को लेकर एयरपोर्ट लेकर जा रहे थे पर मौका पाकर जर्मन सुरक्षाबलों ने उन्हें रोकने की कोशिश की. इसका जवाब आतंकियों ने गोलियां चलाकर और एक हैंड ग्रेनेड फेंककर दिया. इससे सारे 9 एथलीट और पांच आतंकी मारे गए. तीन आतंकी बच गए और जर्मन आर्मी ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. इस बर्बरतापूर्ण घटना से सारी दुनिया सकते में आ गई.

एक सुझाव था कि गेम कैंसिल कर दिए जाएं पर कुछ लोगों ने कहा कि इसे आतंकी अपनी जीत मानेंगें तो ऐसे में एक शोकसभा के बाद फिर से खेलों को जारी रखा गया. इजरायली टीम अपने साथियों को खोने के बाद अब भाग लेने की हालत में नहीं थी तो वो वापस लौट गई.

इजरायली मां अब बस एक बात जानती थी - 'बदला'

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गोल्डा मेयर: इजराइल की प्रथम महिला प्रधानमंत्री [तस्वीर: विकीकॉमन]
उधर इजरायल में गोल्डा मेयर के दिमाग में एक ही बात चल रही थी 'बदला'. उन्होंने इजरायल के सारे इंटेलिजेंस हेड को जुटाया और 'कमेटी एक्स' बनाई. जिसका काम आतंकियों को ही आतंकित करना था. इसके लीडर जनरल अखारामायरीव थे. जनरल सीधे एक्शन में विश्वास रखते थे बिना किसी इंटरनेशनल सहयोग के.

ओलंपिक की इस घटना को अभी 2 महीने भी नहीं गुजरे थे कि आतंकियों ने लुफ्तांसा एअरलाइंस का एक हवाईजहाज हाईजैक कर लिया. आतंकियों ने तीन पकड़े गए आतंकियों को छोड़ने की मांग की. जर्मनी ने उनकी ये मांग मान लीं और अब ये साफ हो चुका था कि इस मामले में इजरायल को अकेले ही आगे बढ़ना होगा.

'कमेटी एक्स' में इजरायल के कई स्पेशल एजेंट शामिल किए गए. इन लोगों का एक ही काम था कि जो भी लोग म्यूनिख की घटना में शामिल रहे हैं उन्हें एक-एक करके मार दिया जाए. गोल्डा मेयर हर चीज पर खुद नजर बनाए हुए थीं. सारे आंतकियों के बारे में छोटी से छोटी जानकारियों की लिस्ट बनाई जा रही थी.

हिट लिस्ट के 12 बड़े आतंकियों में टॉप पर नाम था अली हसन सलामेह का. 'रेड प्रिंस' नाम का ये आतंकी पहले भी मोसाद से भिड़ चुका था पर इस बार मोसाद इसे खत्म करने का मन बना चुकी थी. दुनिया में जगह-जगह इजरायल ने अपने खुफिया इंटेलिजेंस सेंटर खोल दिए. वो ब्लैक सेप्टेम्बर को हथियार और पैसे किन छोटे-छोटे संगठनों से मिलते हैं इसकी जानकारी जुटा रहे थे.

ब्लैक सेप्टेम्बर के आतंके बेहद डरे थे

1970 में जॉर्डन में ब्लैक सेप्टेम्बर का जन्म हुआ था. यहीं से वो अपना सारा काम करते थे. 1970 में उन्होंने तीन तीन प्लेन हाईजैक करके उन्हें बम से उड़ा दिया था. इससे परेशान जॉर्डन के किंग ने भी इनके खिलाफ एक ऑपरेशन चलाया था जिसमें कई फिलीस्तीनी आतंकी मारे गए. फलस्वरूप, इनका ऑफिस बदलकर अब 'बेरूत' हो गया था.

गोल्डा मेयर ने खुद माइक हरारे नाम के एक एजेंट को ऑपरेशन का हेड चुना. बिल्कुल फिल्मी एजेंट्स की तरह ऑपरेशन के लिए जाते वक्त उसका इजरायल से कोई कनेक्शन नहीं छोड़ा गया. हरारे ने फ्रांस को अपना हेडक्वार्टर बनाया.

16 अक्टूबर को 'कमेटी एक्स' को एक वेटर के हमले में शामिल होने का पता चला. 11 गोलियां उसे मारी गईं, एक गोली एक एथलीट के लिए. गोलियां बेरेटा पिस्टल से चली थीं, सभी को समझ आ गया कि ये 'मोसाद' का काम है पर इसे साबित करने के लिए किसी के पास कोई सुबूत नहीं था.

फिर मोसाद ने किसी साजिशकर्ता को फोन रिसीवर में बम रखकर तो किसी के बेड में बम लगाकर उन्हें मारना शुरू किया. हरारे ने यूरोप में काम कर रहे एक-एक ब्लैक सेप्टेम्बर आतंकी की पहचान कर ली थी. अप्रैल, 1973 में मोसाद ने सबसे ज्यादा आतंकियों को निशाना बनाया.

गोल्डा मेयर ने अरब के देशों में घुसकर आतंकियों को मारने को कहा

इजरायल के 11 खिलाड़ियों की हत्या के बदले में ज्यादातर लोगों को 11 गोलियां मारी जा रही थीं. इन हत्याओं में एक चीज कॉमन थी बेरेटा पिस्तौल. हालांकि इजरायल हर बार इनसे अपना कनेक्शन होने से इंकार कर देता था. गोल्डा मेयर ने कमेटी एक्स से सारी दुनिया में जहां कहीं आतंकी छिपे हों उन्हें वहां जाकर मारने का आदेश दिया. वो केवल यूरोप से ही आतंकवाद खत्म करने के पक्ष में नहीं थीं.

लेबनान पहुंचा ऑपरेशन यानि घर में घुसकर मारा

लेबनान आतंकियों का सेंटर था. इजरायली कमांडो लेबनान में आतंकियों की एक बिल्डिंग में घुसकर तीन आतंकियों को मारने में सफल रहे पर कई नागरिक भी इसमें मारे गए. 'मोहम्मद यूसुफ नज्दा' का मारा जाना इसमें खास था क्योंकि वो PLO का नंबर तीन था. यासिर अराफात ने इस घटना की निंदा की.

इसके अगले ही दिन 'अबू जियाद' नाम का एक और आतंकी एथेंस में मार दिया गया. लिस्ट छोटी होती जा रही थी और अली हसन सलामेह का नंबर पास आता जा रहा था. साथ ही PLO में भी लोगों के मरने से इसका कद बढ़ता जा रहा था. लेबनान में अब बेरूत का हेडक्वार्टर भी खत्म हो चुका था.

कमेटी एक्स से हुई एक बड़ी भूल, इजरायल की दुनिया भर में फजीहत

इजरायली एजेंटों से टारगेट को मारने में कभी-कभी गलती भी हो जा रही थी. और असली टारगेट अभी भी बाकी था, सलामेह. जुलाई, 1973 में सलामेह नार्वे पहुंचा. पर सलामेह के धोखे में दूसरे आदमी जो कि एक वेटर था उसे मार दिया है. हरारे किसी तरह वहां से भागे. 6 मोसाद एजेंट पकड़े गए और लंबी कैद की सजा उन्हें हुई. ये इजरायल की बहुत बड़ी फजीहत थी.

गिरफ्तारी होने से दुनिया जान गई कि इस तरह की घटनाओं के पीछे कौन है? गोल्डा मेयर ने हरारे को वापस बुला लिया. सारी दुनिया से एजेंट वापस आ गए. ऑपरेशन की स्पीड भी कम कर दी गई. दिसंबर, 1978 में गोल्डा मेयर की मौत हो गई. पर इससे ऑपरेशन नहीं रुका. 1979 में मोसाद ने फिर से ऑपरेशन शुरू किया और रेड प्रिंस यानी सलामेह पर फोकस किया.

सलामेह ने मिस यूनिवर्स से शादी की थी

सलामेह यूरोप में रह रहा था. और PLO के सबसे बड़े अधिकारी के तौर पर उसे सबसे ज्यादा पैसे मिलते थे. साथ ही उसने 1971 में लेबनान से मिस यूनिवर्स चुनी गई जॉर्जीना से शादी कर ली थी. कुछ लोग कहते हैं कि सलामेह के पास जो अकूत धन था उसका बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता था. क्योंकि वो लेबनान में CIA के एजेंट के रूप में काम करता था.

साथ ही अराफात का दुनिया में महत्व बढ़ाने में भी उसका बड़ा हाथ माना जाता है. मोसाद ने हनी ट्रैप के जरिए उसे निशाना बनाना चाहा क्योंकि औरतों के बारे में उसकी कमजोरी से वो वाकिफ थे. एरिका नाम की एजेंट भेजी गई. सलामेह उससे मिलता था. एक विस्फोटकों से भरी कार एरिका के अपार्टमेंट के पास खड़ी की गई. जैसे ही सलामेह वहां आया कार उड़ा दी गई. सलामेह मारा गया, उस दिन इजरायल में जश्न का माहौल रहा.

कोई नहीं जानता कि कितनी लंबी लिस्ट मोसाद ने बनाई थी पर ये ऑपरेशन 90 के दशक तक चलते रहे. कोई नहीं जानता कि कितने लोग मारे गए. गोल्डा मेयर ने जिन टॉप 12 आतंकियों की बदले वाली लिस्ट बनाई थी, उनमें 'अबू दाउद' नाम का एकमात्र आतंकी जिंदा रह गया.

चलते-चलते

1. 'मोसाद' का शाब्दिक अर्थ, इंस्टीट्यूशन या संस्थान होता है.

2. ये बदला कहकर लिया जा रहा था. अपने टारगेट को निपटाने के पहले 'मोसाद' टारगेट की फैमिली को बुके भेजता था. जिस पर लिखा होता था- 'ये याद दिलाने के लिये कि हम ना तो भूलते हैं, ना ही माफ करते हैं'.

3. सोवियत रूस में पैदा हुई और अमेरिका में पढ़ी-लिखी गोल्डा इजरायल की पहली और दुनिया की तीसरी महिला प्रधानमंत्री थीं.

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