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भारत, बांग्लादेश या हो पाकिस्तान, सबके लिए विलेन हैं याह्या खान

पाकिस्तान का राष्ट्रपति बनने से पहले याह्या खान द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के जंगबाज रह चुके थे

Prabhakar Thakur Updated On: Aug 10, 2017 11:02 AM IST

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भारत, बांग्लादेश या हो पाकिस्तान, सबके लिए विलेन हैं याह्या खान

पाकिस्तान के कई फौजी सरदारों में से एक याह्या खान पाकिस्तान के तीसरे राष्ट्रपति थे. लोगों के जेहन में जब पाकिस्तान-बांग्लादेश विभाजन आता है तब याह्या खान भी खुदबखुद ही आ जाते हैं.

उनके राष्ट्रपति रहते ही पाकिस्तान ने मुल्क के दो टुकड़े होते देखे. इस विभाजन से पहले पाकिस्तान दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम मुल्क हुआ करता था.

याह्या खान की नाकामियां एक तरफ, वह पाकिस्तानी फौज के कर्ताधर्ता होने से पहले द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के जंगबाज रह चुके थे. आजादी के बाद वह पाकिस्तानी आर्मी के सबसे सीनियर कमांडरों में से एक बनाए गए.

पढ़ाई में हुआ करते थे बड़े तेज 

याह्या खान की पैदाइश पंजाब के चकवाल में 4 फरवरी, 1917 को एक पठान खानदान हुई थी. लोग बताते हैं कि ब्रिटिश पुलिस में तैनात पिता का यह बेटा पढ़ाई में बहुत तेज था. देहरादून के कर्नल ब्राउन कैंब्रिज स्कूल में पढ़ने के बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से बीए की पढ़ाई की.

याह्या ने देहरादून की मशहूर इंडियन मिलिट्री एकेडेमी ज्वाइन की और फिर आर्मी में शामिल हो गए. जब दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था तब उत्तरी अफ्रीका में ब्रिटेन की तरफ से लड़ते हुए याह्या धुरी राष्ट्र की सेनाओं द्वारा पकड़ कर इटली ले जाए गए लेकिन वह वहां से भाग निकले.

'शराब और शबाब', दोनों बेहद पसंद

1947 में देश के बंटवारे के वक्त तक तो याह्या मेजर के रैंक तक पहुंच चुके थे. 1951 में 34 बरस की उम्र में पाकिस्तान के सबसे युवा ब्रिगेडियर बने याह्या का यह रिकॉर्ड आज भी कायम है. कहा जाता है कि याह्या खान को कड़ी मेहनत के अलावा शराब और 'शबाब' दोनों बेहद पसंद थे. उन्होंने कभी शादी नहीं की थी.

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आजादी के बाद के इस दौर में पाकिस्तान भारी उथल पुथल से गुजर रहा था, सियासी भी और आवामी भी. इसी दौरान 1958 में राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्जा ने मार्शल लॉ लगा दिया और अयूब खान राष्ट्रपति बन गए. अयूब खान के मुल्क का सदर बनने के बाद उनकी नीतियों का विरोध लगातार बढ़ता गया. पूर्वी पाकिस्तान में मुजीबुर रहमान से लेकर पश्चिम में ज़ुल्फिकार अली भुट्टो द्वारा अयूब खान की चौतरफा आलोचना होने लगी. 'देशबंधु' मुजीबुर रहमान पर देशद्रोह का मुकदमा लगने के बाद तो बांग्लादेश में जोरदार प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया.

इसी वक्त याह्या खान के पास असली ताकत आई. 1969 में कोई रास्ता ना देख अयूब खान ने याह्या खान को मुल्क का ताज सौंप दिया. पर यह दरअसल कांटों भरा ताज था. पाकिस्तान में बदहाली और नाइंसाफी का दौर जारी था. पूर्वी पाकिस्तान तो गृह युद्ध की दहलीज पर था. वहां पश्चिम-पाकिस्तान का नेतृत्व बदनाम हो चुका था. ऐसे में देश में अमन कायम करने के लिए याह्या ने 1970 में चुनाव करवाने का फैसला किया.

पंजाबियों को नामंजूर थी बंगाली नुमाइंदगी

पर ये क्या, चुनाव में तो वो हुआ जो पश्चिम-पाकिस्तान में कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था. मुजीबुर रहमान की आवामी लीग पार्टी को 300 में से 160 सीटें आईं और वो सरकार बनाने के लिए तैयार थे. पश्चिम-पाकिस्तान के पंजाबी लोग बंगालियों के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं हुए.

फिर क्या था, पूरे बंगाल में बवाल होने लगा. पूर्वी-पकिस्तान की नाइंसाफी से तंग आ चुके लोगों ने आजादी की मांग करनी शुरू कर दी. याह्या खान ने ऐसे नाजुक मौके पर बंगाली मुसलामानों की बात मानने की बजाय उनका दमन और तेज कर दिया. पाकिस्तानी सेना ने ढाका और अन्य जगहों पर सेना भेज कर सारे विरोध को कुचल देने का घातक काम शुरू कर दिया. यही याह्या खान और पाकिस्तान की सबसे बड़ी गलती साबित हुई.

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इस मुश्किल वक्त में पूर्वी-पाकिस्तान के बंगालियों को भारत का साथ मिला. 1971 में बांग्लादेशी नेता मुजीबुर रहमान की मांग पर भारत ने बांग्लादेश की आजादी की मांग को अपना समर्थन दे दिया. भारत और पाकिस्तान तीसरी बार एक दूसरे से भिड़ने को तैयार थे. याह्या खान के सामने थीं भारत की 'आयरन लेडी' इंदिरा गांधी. इस लड़ाई में पाकिस्तान की ऐसी हार हुई कि याह्या खान कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहे. नब्बे हजार से ज्यादा पाकिस्तानी फौजियों के बंदी बना लिए जाने का वाकया तो आज तक दोनों देशों में कोई नहीं भूल पाया है.

बांग्लादेश हाथ से गया और साथ में इज्जत भी

याह्या खान ने पूरा जोर लगा दिया पर बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग होने से वो बचा नहीं सके. इस हार के कारण पाकिस्तान ने सिर्फ जमीन का टुकड़ा ही नहीं खोया, बल्कि इसके कारण पाकिस्तान की पूरे मुस्लिम जगत में भारी किरकिरी हुई और पाकिस्तान ने अपनी सेना का बांग्लादेशी हिस्सा भी खो दिया. पाकिस्तान की एकता बिखर चुकी थी.

एक जनरल और एक राष्ट्रपति के लिए इससे शर्म की बात और क्या हो सकती है? याह्या ने पद छोड़ कर जुल्फिकार अली भुट्टो को देश का नया राष्ट्रपति बना दिया और खुद दुनिया की निगाह से गायब हो गए. उनके फौजी सम्मान उनसे छीन लिए गए और उन्हें नजरबंद कर दिया गया.

1977 में उन्हें पाबंदियों से आजाद किया गया पर वह खुद पर लगाई पाबंदियों से आजाद नहीं हो सके. एक फौजी के लिए हार पचा पाना मुश्किल होता है. शायद इसीलिए इस फौजी ने 1980 में रावलपिंडी में बेहद खामोशी से इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

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