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नॉर्थ कोरिया से ज्यादा खतरनाक था क्यूबा-अमेरिका का मिसाइल संकट

1962 में 50 फीसदी से ज्यादा लोग क्यूबा-अमेरिका युद्ध का अनुमान लगा रहे थे. आज तो हालात बिल्कुल अलग हैं, आज अमेरिका-नॉर्थ कोरिया युद्ध होने की 20-25 फीसदी ही संभावना है

Avinash Dwivedi Updated On: Oct 22, 2017 10:50 AM IST

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नॉर्थ कोरिया से ज्यादा खतरनाक था क्यूबा-अमेरिका का मिसाइल संकट

तारीख थी 22 अक्टूबर, 1962. अमेरिकी समय के हिसाब से शाम के सात बजे टीवी पर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी का राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित हुआ. इसमें उन्होंने कहा, 'अगर क्यूबा से कोई भी मिसाइल पश्चिमी गोलार्द्ध के किसी भी देश पर छोड़ी जाती है तो इसे सोवियत यूनियन के अमेरिका पर हमले के रूप में देखा जाएगा और इसके बदले में माकूल जवाब सोवियत यूनियन को दिया जाएगा.'

इसके साथ ही कैनेडी ने एक और घोषणा की- 'इस आक्रामक इंतजाम (कैनेडी का इशारा अमेरिका पर हमले के लिए क्यूबा में लगी परमाणु मिसाइलों की ओर था) को रोकने के लिए आक्रामक सैन्य हथियारों से लैस एक मजबूत अवरोधक दस्ता, जहाजीबेड़े के रूप में क्यूबा की ओर भेजा गया है (भाव था, क्यूबा को घेर लिया है). किसी भी देश या बंदरगाह से क्यूबा जाने वाले सभी तरह के जहाजों में से अगर किसी में सैन्य माल या आक्रामक हथियार पाए जाएंगे तो उन्हें वापस लौटा दिया जाएगा. अगर जरूरत पड़ी तो ये इंतजाम दूसरे तरह के माल ले जाने वाले जहाजों पर भी लागू कर दिया जाएगा.'

वैसे इससे अलग भी एक भाषण तैयार कर के कैनेडी के लिए रखा गया था और दुनिया को इस बात की खुशी होनी चाहिए कि उस शाम इस भाषण को कैनेडी ने नहीं पढ़ा. कैनेडी के इस दूसरे भाषण की शुरुआती पंक्तियां थीं, 'इस सुबह, मुझे अनिच्छापूर्वक सेनाओं को क्यूबा में बने परमाणु बंदोबस्त को तहस-नहस करने की इजाजत देनी पड़ी.'

जिसका मतलब होता क्यूबा यानि सोवियत यूनियन से सीधी लड़ाई मोल लेना. और चूंकि उस वक्त लगभग पूरी दुनिया अमेरिका और सोवियत यूनियन के नेतृत्व में दो भागों में बंटी हुई थी तो ये तीसरे विश्वयुद्ध की शुरुआती घटना भी बन सकता था. फिर इस तीसरे विश्वयुद्ध को लड़ने के लिए दोनों ही गुटों के पास बड़ी संख्या में परमाणु हथियार भी थे. यानी इस पड़ाव पर किसी भी तरह से बात बढ़ने का मतलब होता तीसरे विश्वयुद्ध के रूप में लगभग पूरी दुनिया का अंत.

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कुछ यूं थी पूरी घटना

आए दिन छोटा सा देश क्यूबा जो अमेरिका के नीचे स्थित है, फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में बनी कम्युनिस्ट सरकार को गिराने के अमेरिकी प्रयासों के चलते परेशान रहता था. इसलिए क्यूबा ने अमेरिका के विरोधी सोवियत यूनियन से अपनी सुरक्षा के लिए हाथ मिला लिए. क्यूबा के संबंध सोवियत यूनियन से दोनों में ही कम्युनिस्ट सरकारें होने के चलते और मधुर हो गए. इसी बीच क्यूबा ने सोवियत यूनियन से मंगाकर परमाणु मिसाइलों के अड्डे अपने देश में बना लिए. ये परमाणु मिसाइलें पूरे अमेरिका पर कब्जा करने में सक्षम थीं.

क्यूबा का सोवियत यूनियन के साथ मिलकर शक्ति नियंत्रण बिठाने के लिए इस तरह से मिसाइलों को स्थापित करना और इस घटना के चलते दुनिया पर खात्मे की तलवार के लटकने के इस संकट को ही 13 दिन के 'क्यूबाई मिसाइल संकट' के रूप में जाना जाता है.

बतिस्ता शासन के हटाये जाने के बाद से क्यूबा के साथ थी तनातनी

बतिस्ता सरकार को हटाकर 1959 में फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में सरकार बना ली थी. इस दौरान बतिस्ता समर्थक कई लोगों ने क्यूबा से भागकर अमेरिका में शरण ले ली. इन मुजाहिरों को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर CIA के जरिए फिदेल कास्त्रो से लड़ने के लिए प्रशिक्षित कर रहे थे क्योंकि अमेरिका कास्त्रो को मारकर फिर से क्यूबा और उसके व्यापार पर अमेरिका का प्रभुत्व जमाना चाहता था.

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ऐसे में कास्त्रो ने सोवियत यूनियन से अपने संबंध मजबूत किए. सोवियत से कम्युनिस्ट स्टेट होने के चलते संबंध कायम करने में उन्हें ज्यादा सहूलियत भी हुई. फिर क्यूबा के 'बे ऑफ पिग' पर क्यूबा छोड़ भागे इन्हीं 1400 लोगों के आक्रमण के बाद से क्यूबा को अपनी सुरक्षा के लिए और शक्तिशाली होने की जरूरत महसूस होने लगी तो क्यूबा ने सोवियत से मंगाकर परमाणु मिसाइलें स्थापित कर लीं यानी परमाणु हथियारों की ये जुटान अमेरिका और क्यूबा के बीच चल रहे इस भितरघाती संघर्ष का ही तात्कालिक परिणाम थी.

एक कार गैरेज के ऊपर बने स्टूडियो में हुआ था इतने बड़े संकट का खुलासा

अमेरिका ने सोवियत यूनियन को नियंत्रण में रखने के लिए अपने सहयोगियों इटली और तुर्की के यहां मिसाइलों के अड्डे बना रखे थे. इसके चलते अमेरिकी आक्रमण का डर सोवियत यूनियन पर मंडराता रहता था. सोवियत ने ऐसे में अपने नए सहयोगी क्यूबा के फिदेल कास्त्रो का सहारा अमेरिका पर शक्ति नियंत्रण स्थापित करने के लिए लेना चाहा. सोवियत ने बड़ी संख्या में परमाणु हथियार और मिसाइलें क्यूबा को भेजीं. क्यूबा से अमेरिका की सीमा मात्र 90 मील थी और यहां से अमेरिका के हर शहर को आसानी से निशाना बनाया जा सकता था.

अमेरिका को इस तरह की गतिविधियों का शक तो था लेकिन उसकी खूफिया एजेंसी CIA का ध्यान क्यूबा पर कब्जे और फिदेल कास्त्रो को मारने पर लगे होने के चलते उसने इस तरफ ध्यान नहीं दिया था. पर जब एक रूसी जासूस से अमेरिका और ब्रिटेन की खूफिया एजेंसियों को ऐसी गतिविधि की पक्की जानकारी मिली तो उन्होंने इसकी तहकीकात जारी की अमेरिकी खूफिया एजेंसी ने अपने जहाजों के जरिए क्यूबा पर नजर रखनी शुरू कर दी. उन्हें सफलता मिली 14 अक्टूबर, 1962 को. जब एक U-2 नाम का अमेरिकी जहाज क्यूबा में कुछ जगहों की तस्वीरें उतार लाया.

इन तस्वीरों का प्रिंट अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में एक कार एजेंसी के गैराज के ऊपर बने CIA के खूफिया अड्डे में निकाला गया और तस्वीर में जो चीजें दिख रही थीं, उन्हें देखकर अमेरिकी अधिकारियों के होश उड़ गए. क्यूबा के एक अड्डे पर अमेरिका को नियंत्रित करने के लिए बड़ी संख्या में परमाणु हथियारों का जखीरा जुटाया गया था.

 

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13 दिन से कहीं ज्यादा का था ये संकट

ये खबर 16 अक्टूबर को तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी को बताई गई. तब तक खूफिया एजेंसी के लोगों ने भी इस समस्या पर विचार शुरू कर दिया था. कैनेडी ने तुरंत सलाहकार समिति (जिसे एक्सकॉम कहा जाता था) की एक बैठक बुलाई और अमेरिका के अगले कदम पर विचार किया.

इस मीटिंग में कई लोगों का विचार था कि अमेरिका को तुरंत ही जवाबी मिसाइल हमले के रूप में जवाब देना चाहिए पर डिफेंस सेक्रेटरी मैकनॉमरा सहित कई लोगों ने एहतियात बरतने का सुझाव दिया ताकि युद्ध जैसी परिस्थितियों से बचा जा सके क्योंकि वो ये समझ रहे थे कि कमोबेश पूरे विश्व के दो भागों में बंटे होने के वक्त अगर कोई युद्ध शुरू होगा तो उसे विश्वयुद्ध बनने में देर नहीं लगेगी.

तत्कालीन डिफेंस सेक्रेटरी रॉबर्ट कैनेडी की उनकी मौत के बाद छपकर आई किताब 'थर्टीन डेज' और इसी नाम से सन् 2000 में बनी फिल्म के चलते संकट के साथ 13 दिन का मिथक जुड़ गया है. बाकि 13 दिन अमेरिकी सरकारी महकमा इसकी जानकारी होने के बाद इसके निपटारे में लगा रहा इसीलिए इसके साथ 13 दिनों की बात जुड़ी है.

इस तरह टला तीसरा विश्वयुद्ध

 हालांकि अमेरिका और सोवियत यूनियन दोनों ही कूटनीतिक भाषणों में पीछे हटने को तैयार नहीं थे और आक्रामक रूप से अड़े हुए थे पर अंदर ही अंदर दोनों ही देशों के प्रमुख जॉन एफ. कैनेडी और निकिता ख्रुश्चेव युद्ध के बाद की दुनिया का हाल सोचकर बेहद डरे भी हुए थे. ऐसे में एक भी गलती बड़ा नुकसान कर सकती थी. पर अमेरिका ने अपने खूफिया मिशन को रोका नहीं और क्यूबा की जासूसी जारी रखी.

ऐसे में 27 अक्टूबर को एक टोही विमान को क्यूबा ने एक सोवियत मिसाइल की मदद से मार गिराया. जिसमें अमेरिकी एयरफोर्स के पायलट मेजर रुडोल्फ एंडरसन की मौत हो गई. इसके बाद अमेरिका में कई लोगों ने क्यूबा पर चढ़ाई का सुझाव दिया पर चूंकि दोनों ही देश एक निष्कर्ष और शांति की ओर बढ़ रहे थे तो इस घटना से उसे प्रभावित नहीं होने दिया गया और आखिर कूटनीतिक सफलता मिली और मास्को रेडियो पर निकिता ख्रुश्चेव की ओर से क्यूबा से परमाणु हथियार वापस मंगाए जाने की घोषणा कर दी गई.

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जिन शर्तों पर सहमति बनी वो ये थीं कि सोवियत यूनियन क्यूबा से हथियारों को वापस मंगा लेगा और अमेरिका क्यूबा पर हमला कर उसे कब्जे में लेने की कोशिश नहीं करेगा. पर जिस शर्त के बारे में राष्ट्रपति कैनेडी और कुछ व्हाइट हाउस के लोगों को छोड़कर किसी को नहीं मालूम था वो ये थी कि अमेरिका तुर्की में अपना परमाणु अड्डा खत्म कर देगा. बाद में जब इसके लिए तुर्की भी राजी हो गया तब इस शर्त का खुलासा हुआ. ऐसे में जो अमेरिकी मानते थे कि इस विवाद में अमेरिका, सोवियत यूनियन को झुकाने में कामयाब हुआ था, वो इस शर्त के खुलासे के बाद बगले झांकने लगे.

जानी दुश्मनों को खुद पर कत्तई विश्वास नहीं था

बहुत बाद में हुए सोवियत यूनियन के कुछ पेपर्स से एक और खुलासा हुआ था जिससे पता चला कि अमेरिका 28 अक्टूबर को ही शांति से बैठ जाने के बजाए 20 नवंबर तक क्यूबा पर नजर बनाए रहा, जब तक सारे परमाणु हथियार वापस नहीं चले गए. पर इन्हीं कागजातों से एक और खुलासा होता है कि अमेरिका को मूर्ख बनाने में सोवियत यूनियन सफल रहा था और क्यूबा के कई ऐसे ठिकाने जहां परमाणु हथियार होने का पता अमेरिका नहीं लगा सका था, वहां उसने परमाणु हथियार 20 नवंबर के बाद भी रहने दिए ताकि अगर अमेरिका क्यूबा पर हमला न करने के वादे से मुकरे तो क्यूबा उन हथियारों का इस्तेमाल कर सके. इन हथियारों को क्यूबा से 1 दिसंबर, 1962 को माहौल में काफी शांति आ जाने के बाद ही हटाया गया.

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चलते-चलते

अमेरिका पर मंडराते इस संकट की अगर तुरंत जानकारी अमेरिकी नागरिकों को हो जाती तो इसके घातक परिणाम हो सकते थे. ऐसे में कैनेडी प्रशासन ने इसे दबाने का पूरा प्रयास किया. 20 अक्टूबर से होने वाले एक चुनाव प्रचार को इस घटना के चलते कैनेडी ने रद्द कर दिया. व्हाइट हाउस ने बयान जारी किया कि कैनेडी को हल्के बुखार और खांसी के चलते ऐसा किया गया है. जबकि उस वक्त कैनेडी पांच घंटे से चल रही एक रक्षा बैठक में शामिल थे. साथ ही कैनेडी ने इस बैठक में विरोधी दल के रिपब्लिकन नेताओं को भी शामिल किया था.

आज के दौर में जब अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परमाणु हथियारों पर जबानी युद्ध जारी है, अमेरिकी जानकार कहते हैं ऐसे में युद्ध होने की 20 से 25 फीसदी संभावना है. जबकि 1962 में युद्ध होने की 50 फीसदी से ज्यादा संभावना हो गई थी पर कैनेडी जैसे नेता होने के चलते युद्ध नहीं हुआ पर आज जैसे राजनीतिक माहौल में अमेरिकी सरकार फैसले ले रही है, कभी भी दुनिया खात्मे के मुहाने पर खुद को खड़ा पा सकती है.

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