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चीन-पाक करार: तो पाकिस्तान पर हो जाएगा 'ड्रैगन' का आर्थिक कब्जा

जानिए चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की पूरी योजना क्या है

Nazim Naqvi Updated On: May 16, 2017 11:13 AM IST

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चीन-पाक करार: तो पाकिस्तान पर हो जाएगा 'ड्रैगन' का आर्थिक कब्जा

फरवरी 22, 2017 को चीन ने उस मसौदे को अंतिम रूप दे दिया जिसे ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे’ की दीर्घकालिक योजना के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. पिछले महीने इसे हस्ताक्षर के लिए नवाज शरीफ के पास भेजा जा चुका था.

पिछले लगभग ढाई महीने से यही संशय बना हुआ था कि चीन और पकिस्तान ने जिस योजना पर हस्ताक्षर किए हैं वह क्या है. अनुमान पर ही सारी चर्चाएं टिकी थीं लेकिन अब पकिस्तान के एक राष्ट्रीय दैनिक ‘डॉन’ ने दावा किया है कि वह मसौदा जो 30 पन्नों का है, उसके पास है.

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कैसा है सीपीईसी का मसौदा

‘डॉन’ लिखता है कि इस मसौदे के प्रारूप में परिभाषाओं के व्यापक बिंदु, परिकल्पना और लक्ष्य, दिशानिर्देश और सिद्धांत, आपसी सहयोग के मौलिक क्षेत्र, निवेश और वित्तपोषण तंत्र और सहायक उपायों पर व्यापक समझ शामिल है.

दरअसल भारत के लिए इस मसौदे का विश्लेषण करना इसलिए बहुत ज़रूरी है क्योंकि जिस ‘इकनॉमिक-रूट’ पर चीन और पकिस्तान हस्ताक्षर करने जा रहे हैं वह हर दृष्टि से भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इस समझौते की एक धुरी पर पकिस्तान है जिसके साथ भारत के रिश्ते पारंपरिक रूप से असहज हैं और इन दिनों तो रिश्तों का तनाव अपने चरम पर है, और दूसरी धुरी पर चीन है जिस पर पूरी तरह यकीन कर पाना मुश्किल है.

भारत के लिए यह जानना बहुत जरूरी है कि पाकिस्तान के साथ संबंधों में, चीनी इरादे क्या हैं और उसकी प्राथमिकताएं क्या हैं? इस बारे में अभी तक सार्वजनिक रूप से चर्चा नाम-मात्र ही हुई है. बहुत से ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब समय रहते पाने होंगे.

फिर भी बहुत से सवाल हैं?

बहुत से सवाल ऐसे भी हैं जिनके जवाब पाकिस्तानी जनता को भी चाहिए और देर-सवेर वह ये जरूर चाहेगी कि उसके प्रश्नों के जवाब देकर पकिस्तान की सरकार उसे संतुष्ट करे.

pak-afghanistan border

मिसाल के तौर पर ‘डॉन’ लिखता है इस सड़क परियोजना के दोनों ओर, हजारों एकड़ कृषि भूमि चीनी उद्यमों को पट्टे पर दी जाएगी. इस योजना में ये भी शामिल है कि पेशावर से लेकर कराची तक, शहरों-शहरों में निगरानी की एक पूरी प्रणाली का निर्माण किया जाएगा, जिसमें सड़कों और व्यस्त बाजारों में कानून और व्यवस्था पर नजर रखने के लिए 24 घंटे की वीडियो रिकॉर्डिंग का पूरा सिस्टम तैयार किया जाएगा. इसके अलावा राष्ट्रीय-स्तर पर एक नेशनल फाइबर-ऑप्टिक का जाल बिछाया जायेगा, जिसका इस्तेमाल न सिर्फ इंटरनेट बल्कि टेलीविजन प्रसारण के लिए भी होगा ताकि पाकिस्तान, 'चीनी संस्कृति के प्रसार' में, चीनी मीडिया के साथ सहयोग कर सके.

मई 2013 से लेकर अब तक, यानी पिछले चार वर्षों में ‘चीन-पकिस्तान आर्थिक गलियारे’ में कब क्या हुआ, इस पर नजर डालें तो एक बात साफ नजर आती है कि पकिस्तान के साथ एक लंबे व्यावसायिक रिश्ते की बुनियाद रखते हुए चीन ने हर कदम पर पूरी सतर्कता बरती है.

चीन ऐसे जमाएगा पाकिस्तान में जड़ें

डॉन अपनी एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में इस योजना पर टिप्पणी करते हुए लिखता है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्रों में व्यापक आधार पर प्रवेश की परिकल्पना इस मसौदे में की गई है जिसमें चीनी उद्यमों और उसकी संस्कृति का प्रवेश पाकिस्तानी समाज पर अपना प्रभाव डालेगा. वह लिखता है कि पाकिस्तान के इतिहास में ऐसी कोई दूसरी मिसाल नहीं है जहां विदेशी उद्यमों की भागीदारी के लिए घरेलू अर्थव्यवस्था को इस तरह खोला गया हो.

दरअसल चीन ‘आर्थिक-गलियारे’ के साथ-साथ कृषि उत्पादों को प्रोत्साहन देकर वह मौका चाहता है जिसके जरिए वह अपने झिंजियांग क्षेत्र का भला कर सके जो 50 प्रतिशत गरीबी से जूझ रहा है और इतना अलग-थलग है कि उसके विकास को बढ़ावा देने के लिए उसका बड़े बाजारों से जुड़ना मुश्किल है.

पाकिस्तान की कृषि में निवेश के पीछे चीन कि असली प्रेरणा-शक्ति यही है. इसके साथ उन अवसरों की भी लंबी सूची है जो उसके उद्यमों को स्थानीय बाजार से जुड़ने के बाद मिलेंगे.

PakistanDay

कुल मिलकर ‘चीन-पकिस्तान दीर्घकालीन मसौदा’ जो 15 वर्षों के लिए लिपिबद्ध किया गया है, उसके विस्तार में जाने से आभास होता है कि यदि इसपर 70 प्रतिशत भी अमल हो गया तो पूरे पकिस्तान पर चीन का आर्थिक कब्जा हो जाएगा.

कृषि, उद्योग, फाइबर ऑप्टिक्स के जरिए निगरानी, पर्यटन और मनोरंजन क्षेत्र में चीन का निवेश ईस्ट इंडिया कंपनी की याद दिलाता है. यह सब करते हुए ऐसा नहीं कि वित्तीय जोखिम पर चीन कि नजर नहीं है.

‘डॉन’ की रिपोर्ट लिखती है कि- पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक निवेश का सामना करने वाले जोखिमों को उजागर करते समय मसौदे की भाषा कठोर हो जाती है. मसौदे में योजना का मुख्य जोखिम राजनीति और सुरक्षा को माना गया है. 'कई प्रतिस्पर्धी दल, धर्म, जनजातियां, आतंकवाद और पश्चिमी हस्तक्षेप जैसे पाकिस्तानी राजनीति को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं.'

भारत के लिए अहम है समझौता

बहरहाल, चीन और पकिस्तान दोनों को ही मसौदे का अंतिम रूप मान्य है. 12 मई को नवाज शरीफ पूरे दल-बल के साथ, जिसमें पंजाब, खैबर पख्तुन्वा, बलोचिस्तान और सिंध के मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री, रेल मंत्री, योजना मंत्री, कॉमर्स मंत्री, और सूचना एवं तकनीक मंत्री, के साथ बीजिंग जाना इसका सुबूत है.

लेकिन जैसा कि लेखक पहले ही कह चुका है कि भारत के लिए यह गतिविधियां हर दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं. भारत इन गतिविधियों को पड़ोसी मुल्कों के आंतरिक कार्यकलाप समझकर तटस्थ नहीं रह सकता. चीन और पकिस्तान के रिश्तों में प्रगाढ़ता या खटास, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसे प्रभावित करेंगे.

India-China

पाकिस्तान कहता आया है कि वह खुद अपनी जमीन पर उग रही आतंकवाद की फसल से उतना ही परेशान है जितना कि उसके पड़ोसी देश. क्या यही दलील वो चीन को भी देगा या फिर आतंकवादी चीन के साथ हाथ में हाथ डालकर घूमेंगे? क्योंकि चीन का अपने देश के मुसलामानों के साथ जो सख्त रवैया है वो किसी से छुपा हुआ नहीं है.

2016 में चीनी हुकूमत ने अपने देश के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में सरकारी कर्मचारियों, छात्रों और बच्चों के रमजान का रोजा रखने पर रोक लगा दी थी. क्या भविष्य में होने वाले ऐसे किसी कदम पर पाकिस्तान के इस्लामी संगठन कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराएंगे?

चीन का मुस्लिम बहुल इलाका ‘जियांग’ लंबे समय से विद्रोही कार्यवाहियों में लिप्त है. 2013 या 14 में, चीन की सरकार ने कुछ पाकिस्तानियों को धर दबोचा था जो इन विद्रोहियो को हथियारो और पैसों से मदद कर रहे थे. क्या ऐसा आगे नहीं होगा? क्या पाकिस्तान अपने इस्लामी-राज्य के एजेंडे से बाज आ जाएगा? जियांग प्रांत के चीनी-मुसलमान ‘मुस्लिम-राष्ट्र’ के सपने देखते हैं, क्या वह चीन-पाकिस्तान रिश्तों का फायदा अपने हक में उठाने की कोशिश नहीं करेंगे? क्या पाकिस्तान का कट्टरपंथी समाज नहीं चाहेगा या चीन के मुसलमान, पाकिस्तान पर उनके हक में बोलने के लिए दबाव नहीं डालेंगे? अगर ऐसा हुआ तो दोनों के रिश्ते क्या ऐसे ही दोस्ताना बने रहेंगे?

एक बात और अगर भविष्य में चीन को पाकिस्तानी कट्टरपंथियों और आतंकवादियों से कोई मुश्किल पेश नहीं आती तो सिर्फ ये एक बात यह साबित करने के लिए काफी होगी कि पाकिस्तानी जमीन से भारत पर होने वाले हमले पाकिस्तानी हुकूमत की रजामंदी से ही होते आये हैं, जिनको संयुक्त राष्ट्र में अबतक वह नकारता आया है.

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