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नॉर्थ कोरिया की धमकियों के बीच भारत-चीन बैठक के मायने

आतंकवाद के मसले पर भारत की चिंता में शामिल होकर चीन ने संकेत दिया है कि उसे अपने पड़ोसी देश से स्वस्थ और टिकाऊ संबंध की अहमियत का पता है

Sandipan Sharma Updated On: Sep 05, 2017 07:28 PM IST

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नॉर्थ कोरिया की धमकियों के बीच भारत-चीन बैठक के मायने

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के अवसर पर भारत और चीन का द्विपक्षीय मुलाकात का फैसला और इसमें दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों की सकारात्मक सोच के साथ आपसी चर्चा एक खास जरुरत के इशारे करती है. इस चर्चा के संकेत हैं कि तेजी से बदल रहे विश्व में नीतियों के धरातल पर आपसी जुड़ाव की बहुत ज्यादा जरुरत है.

भारत और चीन दोनों के लिए आपसी संबंध को ‘स्वस्थ और स्थायी’ बनाना जरुरी है. चीन के राष्ट्रपति ने दरअसल अपनी तरफ से यह बात दोहरायी भी. ऐसा करना जरुरी है क्योंकि फिलहाल दुनिया में अमेरिका का प्रभाव तेजी से कम हो रहा है. ऐसे में एशिया और यूरोप में भू-राजनीतिक लिहाज से नयी चिन्ताएं पैदा हो रही हैं.

चीन फिलहाल अपने को एक विश्वशक्ति साबित करने पर तुला है, वह अपने को अमेरिकी शक्ति के विकल्प के तौर पर पेश कर रहा है और इस क्रम में उसे भान हो गया है कि भारत को अलग-थलग करके चलने से उसे कुछ हासिल होने वाला नहीं है. आतंकवाद के मसले पर ब्रिक्स देशों के घोषणापत्र से यह बात साफ-साफ जाहिर होती है. दूसरी तरफ भारत को भी महसूस हुआ है कि चीन को नाराज ना किया जाए तो बदलते वैश्विक संबंधों के परिवेश में भारत के हितों के लिए यह फायदेमंद साबित होगा.

चीन क्यों एक अहम भू-राजनीतिक ताकत बनकर उभर रहा है, इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा और उस जबानी जंग पर नजर रखनी होगी जो प्योंगयांग के साथ जारी तनातनी के बीच अमेरिका और उसके सहयोगी दक्षिण कोरिया के बीच चल रही है.

दो दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने सबको हतप्रभ करते हुए दक्षिण कोरिया की आलोचना की, कहा कि वह उत्तर कोरिया का साथ दे रहा है. उत्तर कोरिया ने दावा किया कि उसने हाइड्रोजन बम का सफल परीक्षण किया है. उत्तर कोरिया अब धमकी दे रहा है कि इस बम का इस्तेमाल वह अमेरिका के खिलाफ करेगा. उत्तर कोरिया के इस दावे के चंद घंटे के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति ने सिओल(दक्षिण कोरिया) पर जबानी हमला बोल दिया.

सीएनएन के मुताबिक, ट्रंप के सहयोगियों का कहना है कि राष्ट्रपति बहुत झुंझलाये हुए हैं, उन्हें लग रहा है कि दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जेई-इन उत्तर कोरिया के प्रति नरम रुख अपना रहे हैं क्योंकि उन्होंने तेजी से बढ़ते तनाव को कम करने के लिए प्योंगयांग(उत्तर कोरिया) के साथ बातचीत करने पर जोर दिया है.

दक्षिण कोरिया अपनी स्थापना के समय से ही अमेरिका का सहयोगी देश है. संकट के कई अवसरों पर वह अमेरिका के साथ खड़ा हुआ है. सो सवाल उठता है कि आखिर दक्षिण कोरिया अचानक ट्रंप के गुस्से का निशाना क्यों बन रहा है? आखिर दक्षिण कोरिया यह दलील क्यों दे रहा है कि उत्तर कोरिया के प्रति नरम रुख अपनाया जाए जबकि साफ दिख रहा है कि उत्तर कोरिया की सरकार अमेरिका और पूर्वी एशिया के उसके सहयोगी देशों के साथ हर कीमत पर युद्ध करने की ठान चुकी है?

क्यों उत्तर कोरिया से बात करना चाहता है दक्षिण कोरिया

इसकी एक बड़ी वजह तो घरेलू राजनीति है. मून जेई-इन मई महीने में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति बने. चुनाव में उन्होंने वादा किया था कि उत्तर कोरिया के साथ बातचीत शुरु की जाएगी और भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जाएगी. जाहिर है, मून जेई-इन को अपने मतदाताओं की फिक्र है. लेकिन एक और वजह भी समान रुप से अहम है. इलाके में उत्तर कोरिया का एकमात्र दोस्त चीन है और दक्षिण कोरिया चीन को नाराज करना नहीं चाहता.

जैसा कि गार्जियन अखबार का कहना है, दक्षिण कोरिया बातचीत पर जोर दे रहा है क्योंकि उसे लग रहा है कि पैसेफिक इलाके में चीन एक उभरती हुई महाशक्ति है. गार्जियन अखबार का तर्क है, "एक ध्रुवीय दुनिया अब समाप्त हो रही है, उसकी जगह विश्व-व्यवस्था का एक अस्त-व्यस्त ढांचा खड़ा हो रहा है जिसमें रुस और चीन इलाकाई तौर पर दबंग शक्ति केंद्र बनकर उभर रहे हैं. अगर आप कोरियाई प्रायद्वीप के वासी हैं तो फिर आपके लिए यह जान पाना मुश्किल नहीं कि 21 वीं सदी में किस शक्ति केंद्र के इर्द-गिर्द आपके इलाके का स्वरुप तय होगा.”

संक्षेप में कहें तो अब हर किसी को नजर आ रहा है कि अमेरिका की ताकत कम हो रही है और चीन का प्रभाव बढ़ रहा है.

भारत भी नहीं है अछूता

जो गड़बड़-झाला मचने वाला है उसकी एक बानगी भारत ने डोकलाम संकट से निबटने में देख ली है. बेशक भारत चीन के सामने डटकर खड़ा रहा और डोकलाम में सड़क बनाने की चीन की चाल पर ऐन वक्त पर अंकुश लगा दिया लेकिन ध्यान रहे कि भारत ने इस मसले पर अपनी आवाज ज्यादा ऊंची नहीं की. उसने अपने बरताव में संयम से काम लिया, चीन को चुनौती देने या अपमानित करने की हद तक नहीं गया (हालांकि चीन की सरकार-नियंत्रित मीडिया ने अपनी तरफ से चुभती हुई चेतावनी जारी करने में कोई कोताही नहीं की.)

भारत ने अपना ध्यान कूटनीतिक स्तर पर संवाद कायम करने पर लगाया. भारत ने समझ लिया था कि भले ही अमेरिका उसकी तरफ झुकता दिख रहा है लेकिन उभरते हुए बहुध्रुवीय विश्व में ठीक-ठीक संतुलन बनाना भारत के हित में है.

डोकलाम विवाद के शांतिपूर्ण समाधान और ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत से पता चलता है कि भारत और चीन ने अपना पुराना ढर्रा छोड़कर नई वास्तविकताओं के मद्देनजर तालमेल बैठाना सीखा है.

आतंकवाद के मसले पर भारत की चिन्ता में शामिल होकर चीन ने संकेत दिया है कि उसे अपने पड़ोसी देश से स्वस्थ और टिकाऊ संबंध की अहमियत का पता है. भारत भी अब इस बात को लेकर एकदम सहज है कि चीन अमेरिका की घटती ताकत के बीच खाली होती जगह को भरने की महत्वाकांक्षा रखता है.

बीते वक्त में विचारधाराओं का जोर था लेकिन अभी जोर व्यावहारिक तकाजों का है और यह बदलाव स्वागत-योग्य है. आपसी आदर-भाव और अमन से भारत और चीन को कई तरह से फायदा होगा. एक टिकाऊ और लोकतांत्रिक पड़ोसी देश के रुप में भारत चीन के उत्पादों का बड़ा उपभोक्ता है और इस नाते चीन को फायदा होगा क्योंकि भारत के साथ उसका व्यापार बढ़ेगा. भारत को नाराज करना ना तो चीन के लिए सियासी तौर पर फायदेमंद है ना ही व्यावसायिक रुप से.

भारत का फायदा यह है कि वह विशाल आर्थिक तथा सैन्य ताकत वाले अपने पड़ोसी देश की नाराजगी की फिक्र किए बगैर अपनी अर्थव्यवस्था के निर्माण का काम जारी रख सकता है. बहुध्रुवीय होती दुनिया में बहुत संभव है कि जल्द ही बहुत सी विश्व-शक्तियों के बीच अपना राजनीतिक, रणनीतिक तथा व्यावसायिक साथी ढूंढ़ने की होड़ मचे और ऐसे विश्व में चीन के साथ रिश्तों में मिठास रखने से भारत अपने को नुकसान से बचा सकेगा.

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