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अमेरिका का IS पर हमला: इस वक्त और 'मदर ऑफ ऑल बम' ही क्यों?

गुरुवार को किया गया ये हमला फिर से 16 साल पीछे ले जाता है

FP Staff | Published On: Apr 14, 2017 11:40 AM IST | Updated On: Apr 14, 2017 11:40 AM IST

अमेरिका का IS पर हमला: इस वक्त और 'मदर ऑफ ऑल बम' ही क्यों?

अमेरिका ने अफगानिस्तान में आईएसआईएस के ठिकानों पर दुनिया का बड़ा बम गिराया है. 21600 पौंड वजन के इस बम का नाम GBU-43 है. इसे ‘मदर ऑफ आल’ बम भी कहा जाता है. जानकारी के मुताबिक अफगानिस्तान के अचिन जिले में नंगरहार इलाके में ISIS के ठिकाने पर शाम 7 बजे अमेरिका ने यह हमला किया है.

यह बम कितना खरतनाक है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस तरह का बम पूरी दुनिया में सिर्फ 15  है. मार्च 2003 में इराक युद्ध से ठीक पहले इसका टेस्‍ट किया गया. आईएसआईएस पर इस तरह के बड़े हमले के बाद अब कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. उनमें से एक सवाल ये भी है कि आखिर 'मदर ऑफ ऑल बम' जैसा खतरनाक बम ही क्यों और इतना बड़ा हमला अभी ही क्यों किए गए.

सीएनएन की न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक व्हाइट हाउस के प्रवक्ता सीन स्पाइसर ने कहा, 'ISIS के खिलाफ लड़ाई को अमेरिका बेहद गंभीरता से ले रहा है. हमने ISIS के आतंकियों के सुरंगों को निशाना बनाया. इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि इससे आम नागरिकों और उनकी संपत्तियों को कोई नुकसान न पहुंचे.'

गुरुवार को किया गया ये हमला फिर से 16 साल पीछे ले जाता है. जब ओसामा बिन लादेन के टोरा बोरा कॉम्प्लेक्स में छुपे होने की खबर पर अमेरिकी एयर फोर्स द्वारा 15,000 पौंड का ‘डेजी कटर’ नाम का बम गिराया गया था. टोरा-बोरा, अचिन जिले से मात्र 1 या 2 किलोमीटर की दूरी पर बसा है.

उस हमले में अल-कायदा के बहुत से आतंकियों के मारे जाने की खबर आई थी. साथ ही ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा के कई बड़े नेता भाग निकले थे. अमेरिकी एयर फोर्स के लिए यह बड़ी जीत साबित हुई थी.

शायद यह हमला अमेरिका की इस तरह दूसरी कोशिश है. गुरूवार को किया गया यह हमला अमेरिका द्वारा नार्थ कोरिया और सीरिया को दी गई चेतावनी के तौर पर भी देख सकते हैं. शायद अमेरिका ये जताना चाह रहा है कि वो अपने दुश्मनों के खिलाफ इस तरह के विध्वंसक हथियारों का प्रयोग भी कर सकता है.

अमेरिका पर 9/11 के हमले के बाद से अब तक तालिबान के खिलाफ जंग जारी है. अमेरिकी सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार अफगानिस्तान की आबादी के एक तिहाई हिस्से पर तालिबान का नियंत्रण है. ये पूरा इलाका आईएसआईएस के कब्जे वाले सीरिया और इराक के कुल हिस्सों से भी ज्यादा है.

अल-कायदा और आईएसआईएस ने अपने पांव अब अफगानिस्तान में भी जमा लिए हैं. सवाल है अब किया क्या जाए. अमेरिका का ट्रंप प्रशासन पहले ही कह चुका है कि अफगानिस्तान के साथ उनकी रणनीतिक साझेदारी है. ओबामा के दौर में हुए इस साझेदारी का कार्यकाल 2014 तक है. इस समझौते के मुताबिक यूएस आर्मी तब तक अफगानिस्तान की फौजी और सैन्य सामाग्री से सहायता करती रहेगी जब तक देश पर तालिबान का प्रभाव को खत्म नहीं किया जाए.

अफगानी लोग इस बात की फिक्र नहीं करते कि उनके यहां कितने अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं. उनके लिए सिर्फ ये भरोसा ही काफी है कि अमेरिका उन्हें अकेला नहीं छोड़ रहा है.

अमेरिकी अफगानिस्तान की ये लंबी साझेदारी नाटो की सेना के साथ इस क्षेत्र में लड़ रही दूसरी सहयोगी ताकतों को हौसला देंगी. ये तालिबान को खत्म करने में कारगर साबित हो सकता है.

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