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ओला-मेरू को सरकारी मदद की जरूरत क्यों पड़ गई?

कारोबार में सरकारी दखल का न्यौता देकर इन कंपनियों ने बड़ा जोखिम ले लिया है.

K Yatish Rajawat | Published On: Dec 17, 2016 07:43 AM IST | Updated On: Dec 17, 2016 07:44 AM IST

ओला-मेरू को सरकारी मदद की जरूरत क्यों पड़ गई?

हाल के दिनों में बेहद कामयाब ऐप बेस्ड टैक्सी सेवाओं ओला और मेरू ने बहुत बड़ी बेवकूफी का काम किया है. इन दोनों कंपनियों ने सरकार से मदद मांगी है कि वो उन्हें उबर जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से बचाए.

इन कंपनियों का अपना कोई बिजनेस मॉडल नहीं

सरकार से मदद मांगकर ओला और मेरू ने साबित कर दिया है कि वो नए कारोबारियों की उस जमात से अलग हो गए हैं, जो मौजूदा कारोबारियों को चुनौती देते हैं. कुछ नया करके कारोबार को लेकर नया नजरिया पेश करते हैं.

लेकिन अब वो सरकार के भरोसे धंधा चलाना चाहते हैं. इन कैब कंपनियों के मालिक ठीक उसी तरह अफसरों के दरवाजे खटखटा रहे हैं, जैसे कभी बड़े उद्योगपतियों का बॉम्बे क्लब किया करता था.

इन लोगों ने रेडियो टैक्सी एसोसिशन भी बना ली है ताकि बड़ी विदेशी कंपनियों के खिलाफ सरकार के सामने अपनी बात रख सकें.कारोबार में सरकारी दखल का न्यौता देकर इन कंपनियों ने बड़ा जोखिम ले लिया है.

Photo. uber facebook page

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इससे साफ जाहिर हो गया है कि उनके पास कोई बिजनेस मॉडल नहीं है. उनके पास सिर्फ पूंजी इकट्ठा करने का मॉडल है. साफ है कि उनके कारोबार की कामयाबी में तकनीक का कोई खास रोल नहीं रहा है.

सरकार से मदद की गुहार लगाकर इन कंपनियों ने साफ कर दिया है कि उनका धंधा सस्ते पूंजी निवेश की वजह से चमक रहा है.

कर्ज लेने की नौबत 

ओला और उबर दोनों का बिजनेस मॉडल टैक्सी के ड्राइवर और ग्राहक, दोनों के लिए फायदे का और सस्ता सौदा देने पर आधारित है. ये कंपनियां सब्सिडी देने के लिए बाजार से पूंजी जुटाती हैं.

हाल के दिनों में ये सवाल भी उठे हैं कि क्या इन कंपनियों ने कर्ज लिया है? अगर ये बात सही है तो ये कारोबार के लिए और टैक्सी सर्विस के पूरे माहौल के लिए बुरी बात है.

इन कंपनियों को मिलने वाला निवेश पिछले कुछ सालों में काफी कम हो गया है. अब मुनाफे के लिए इन कंपनियों के पास कोई जरिया कोई और नुस्खा नहीं बचा है.

ये कंपनियां अब तक ये सोच रही थीं कि मुफ्त की पूंजी उनके पास हमेशा के लिए उपलब्ध होगी. ऐसे में जब उनका सामना उबर जैसी ज्यादा पैसे वाली कंपनी से होता है तो उनके कारोबार को गंभीर चुनौती मिलती नजर आती है.

पिछले साल ही मैंने ये मुद्दा उठाया था कि ठेके पर टैक्सी सेवाएं देने वाली ये कंपनियां नियमों के दायरे में लाई जानी चाहिए. ये जिस तरह से ड्राइवरों को भुगतान करती हैं और जिस तरह से रेट तय करती हैं, उसके लिए नियम बनाए जाने की जरूरत है.

ये कंपनियां जिस कारोबारी मॉडल से चल रही हैं, वो बहुत दिनों तक मुनाफा नहीं दे सकता.

जिस तरह ये कंपनियां सरकार से मदद की गुहार लगा रही हैं, उससे साफ है कि खतरे की घंटी बज चुकी है.

अगर ये कंपनियां बिखरती हैं तो इससे निवेशकों पर असर पड़ेगा. अगर निवेशकों को सुरक्षा नहीं मिलेगी तो वो किसी एक शख्स के शुरू किए हुए टैक्सी के कारोबार को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

दूसरे कारोबारी भी प्रभावित

पिछले कुछ सालों में इन टैक्सी सेवाओं ने जबरदस्त तरीके से कारोबार बढ़ाया है और इस तरह दूसरे टैक्सीवालों के धंधे की कमर तोड़ डाली है. बहुत से टैक्सी चलाने वालों ने अपना धंधा बंद करके ओला या उबर से हाथ मिला लिया था. वो इनके कर्मचारी बन गए, वो भी आधे-अधूरे.

ओला और उबर अपने ड्राइवरों को अपना कर्मचारी नहीं मानते. वहीं ड्राइवरों को लगता है कि उन्हें स्थाई नौकरी मिल गई है. वो ये सोचते हैं कि उनकी कमाई ऐसे ही चलती रहेगी.

ओला और उबर उन ड्राइवरों को दुगुना पेमेंट देते हैं जो काम के घंटे का टारगेट पूरा कर लेते हैं. मसलन 1100 रुपए के बिल में से उबर के ड्राइवर को दो से ढाई हजार तक मिलते हैं. इसे इंसेंटिव कहते हैं.

ये हमेशा चल नहीं सकता क्योंकि कंपनियां ड्राइवरों को ये भुगतान बाहर से जुटाई गई पूंजी से करते हैं. जो ड्राइवर ये नहीं जानते, वो समझते हैं कि उन्हें ये भुगतान उनकी मेहनत के एवज में मिल रहा है.

Photo. meru facebook page

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वे नहीं जानते कि आगे चलकर ऐसा इंसेंटिव खत्म हो सकता है. जब ऐसा होगा तो ड्राइवर अपनी गाड़ी की ईमआई भी बमुश्किल भर पाएगा. जब ऐसा होगा, या जब कोई कंपनी बंद होगी, तो ग्राहकों के लिए भी दूसरी सेवाएं उपलब्ध नहीं होंगी.

इन कंपनियों का किराए का मॉडल एक कैब चलाने वालों को तबाह कर देगा. अभी हमारी सरकार और नीतियां बनाने वालों को इस बात की परवाह नहीं. ये कंपनियां पब्लिक ट्रांसपोर्ट के सिस्टम को तबाह करने में लगी हैं.

काम करने के तरीके में बदलाव की जरूरत

कई राज्य सरकारों के साथ-साथ केंद्र ने भी कई बार ये कहा है कि वे इन कैब कंपनियों को नियमों के दायरे में लाने की कोशिश कर रही हैं. जो ये कैब एग्रीगेटर कंपनियां हैं इन्हें एक कैब के मालिकों से अलग दर्जे में रखने की जरूरत है.

कैब एग्रीगेटर कंपनी और ड्राइवरों के बीच साफ शब्दों का समझौता होना जरूरी है. साथ ही ग्राहक और ड्राइवर के लिए दुर्घटना बीमा का होना भी जरूरी होना चाहिए. इनके किराए की भी निगरानी होनी चाहिए. ताकि ग्राहकों और ड्राइवरों को नुकसान न हो.

Photo. meru facebook page

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किराए के मामले में इन्हे मनमानी की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए. ड्राइवरों और कंपनी के बीच इंसेंटिव का समझौता भी साफ-सुथरे शब्दों वाला होना चाहिए और ड्राइवरों को इसको अच्छे से समझाया जाना चाहिए.

ये कंपनियां सरकार की जिम्मेदारी नहीं

ओला और मेरू कंपनियां ये कहकर अपने लिए सुरक्षा मांग रही हैं कि वो भारतीय कंपनियां हैं. जबकि उन पर मालिकाना हक विदेशी कंपनियों का है. इन कंपनियों के संस्थापक तो चेहरे मात्र हैं. इनकी कंपनी में हिस्सेदारी भी बेहद कम है.

सरकार को इनकी बातों में नहीं आना चाहिए. उबर के प्रचार तंत्र ने ये भ्रम फैला दिया है कि छात्र भी उसके जरिए लाखों रुपए कमा रहे हैं.

उबर कंपनी के कैब ड्राइवरों से पूछिए. वो बताएंगे कि लगातार शिफ्ट में काम करके भी वे इतना पैसा नहीं कमा पाते.

दुख की बात ये है कि टैक्सी सेवा के मामले में सरकार शहर, राज्य और केंद्र स्तर तक हर मोर्चे पर नाकाम रही है. सरकार ये भूल गई है कि ग्राहक को सुरक्षा देना उसकी जिम्मेदारी है. व्यवस्था को बनाए रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है. इन कंपनियों के निवेशकों को बचाना सरकार की जिम्मेदारी नहीं.

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