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मोदी सरकार में घटी है लोगों के ऑनलाइन डाटा की पड़ताल

इंडिया का इंटरनेट परिदृश्य इतना तानाशाही वाला नहीं है, जैसा हर कोई दिखाना चाहता है.

Anirudh Regidi | Published On: Dec 24, 2016 02:36 PM IST | Updated On: Dec 25, 2016 08:05 AM IST

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मोदी सरकार में घटी है लोगों के ऑनलाइन डाटा की पड़ताल

फेसबुक की हालिया जारी ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट ने तमाम लोगों के मन में शंका पैदा कर दी है. अगर खबरों की सुर्खियों पर नजर डालें तो आप भी इससे परेशान हो सकते हैं. इन खबरों में कहा गया है, ‘सरकार के यूजर डाटा मांगने के अनुरोध 27 फीसदी बढ़ गए हैं.’ है न यह चौंकाने वाली खबर!

लेकिन क्या यही हकीकत है? आइए इस पर नजर डालते हैं.

क्या है ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट?

एडवर्ड स्नोडेन ने खुलासा किया था कि 2013 में अमेरिका और यूरोपीय सरकारों ने अपने नागरिकों की बड़े लेवल पर जासूसी की. तब से ही, फेसबुक, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट ने सालाना ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट जारी करने का फैसला किया.

इन रिपोर्ट में ये कंपनियां बताती हैं कि किसी देश ने उनसे यूजर डाटा (उपयोगकर्ताओं की जानकारियां) के कितने ‘अनुरोध’ किए.

सरकारें दबा देती हैं सूचनाएं

ये आंकड़े आम लोगों के लिए उपलब्ध हैं. इन रिपोर्ट पर सिलसिलेवार ब्योरा मुहैया नहीं कराया गया है और इनमें से कुछ को तो सरकारें दबा भी देती हैं. इंटरनेट की जासूसी और सेंसरशिप के हालात का अंदाजा लगाने के लिए ये आंकड़े काफी हैं.

चूंकि, ये आंकड़े उपलब्ध हैं, ऐसे में हमने एक कदम आगे बढ़कर फेसबुक की ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट को डाउनलोड किया, लेकिन हम यहीं नहीं रुके.

हमने एप्पल, फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ट्विटर की ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट से भी आंकड़े निकाले. हमने इन आंकड़ों की तुलना 2013 के आंकड़ों से की. 2013 से ही पहली बार ये रिपोर्ट जारी होना शुरू हुआ था.

गूगल ने अभी तक 2016 के लिए अपनी ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट जारी नहीं की है. लेकिन, गूगल के पास 2009-2015 तक के आंकड़े हैं और हमारे पास इनका सहारा लेने के अलावा कोई और चारा नहीं था. गूगल नग्नता/अश्लीलता, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे वर्गों में अनुरोधों को बांटती है. यह काफी मददगार साबित हुआ.

आंकड़े झूठ नहीं बोलते

आपका दिमाग चकरा जाएगा जब आपको पता चलेगा कि 2013 से अब तक पाकिस्तान में लोगों के आंकड़े मांगने के मामलों में 2000 फीसदी का इजाफा हुआ है. भारत के मामले में यह बढ़ोतरी 200 फीसदी की है.

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डर लगा? ऐसे में 27 फीसदी का आंकड़ा उतना बुरा नहीं जान पड़ता, है ना?

हालांकि, आंकड़े झूठ भी बोल सकते हैं, लेकिन ऐसा तभी होता है जब उनके साथ कोई संदर्भ न हो.

पाकिस्तान ने 2013 में केवल यूजर डाटा के लिए केवल 23 अनुरोध किए थे. 2016 में यह संख्या बढ़कर 700 हो गई. इंडिया ने 2013 में इस तरह की 3,245 रिक्वेस्ट कीं. 2016 में यह आंकड़ा 6,324 हो गया.

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दूसरा नजरिया

इंडिया के आंकड़े बहुत ऊंचे हैं. अब इस सबको और बेहतर तरीके से समझने की कोशिश करते हैं. इंडिया में फेसबुक का यूजर बेस 2013 में 9.2 करोड़ था. यह संख्या 2016 में बढ़कर 19.5 करोड़ पर पहुंच गई.

इस तरह से यूजर बेस के फीसदी आधार पर देखा जाए तो यूजर डाटा के लिए किए गए अनुरोधों की संख्या में गिरावट आई है. लेकिन, यह गिरावट बड़ी नहीं है. यह महज 3-7 फीसदी ही है, लेकिन यह मेरी बात साबित करने के लिए काफी है.

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आंकड़े देने में कंपनियों का रवैया खराब

इस बात को मजबूत करने वाला तथ्य यह है कि फेसबुक इस तरह के केवल आधे अनुरोधों का पालन करती है, और उसमें भी वह इन्हें पूरी तरह नहीं मानती है.

हकीकत यह है कि अनुरोधों की संख्या देश में इंटरनेट की बढ़ती पहुंच की तर्ज पर नहीं है.

अगर आप पश्चिमी बाजारों पर नजर डालें तो पाएंगे कि गूगल और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर ग्लोबल रिक्वेस्ट में अमेरिका की हिस्सेदारी आधी है.

फेसबुक की इन अनुरोधों को पूरा करने की दर भी इन देशों में 80 फीसदी से ज्यादा है.

सेंसरशिप घट रही है

कंटेंट पर पाबंदी लगाने (यानी सेंसरशिप) के फेसबुक पर मामले देखे जाएं तो सरकारी अनुरोधों की संख्या 7 गुना घटी है.

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2015 की दूसरी छमाही में यह संख्या 15,000 थी जो अब घटकर 2,000 पर आ गई है.

अगर 2014 के आंकड़ों से इसकी तुलना करें तो यह गिरावट करीब 60 फीसदी बैठती है.

2009 से 2015 की अवधि के गूगल के आंकड़े इशारा करते हैं कि सेंसरशिप में इजाफा हुआ है.

हालांकि, इन अनुरोधों में बड़ा उछाल नहीं आया. इसके साथ ही गूगल को मिलने वाले ज्यादातर अनुरोध नग्नता, कॉपीराइट उल्लंघन और हिंसा से जुड़े हुए हैं. यह एक सामान्य चीज है.

यूजर डाटा मांगने में इंडिया काफी पीछे

सेंसरशिप डाटा से यह भी पता चल रहा है कि इंडिया इस मामले में पश्चिमी देशों से काफी पीछे है. मसलन, जर्मनी अकेले ही इंडिया के अनुरोधों के मुकाबले दोगुने अनुरोध दे रहा है. फ्रांस और अमेरिका तो पूरी तरह से दूसरी लीग में हैं.

माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल और ट्विटर के आंकड़े ज्यादा अहम नहीं हैं. ऐपल और ट्विटर से किए गए अनुरोधों की संख्या तो 200 के लेवल तक भी नहीं पहुंची है. माइक्रोसॉफ्ट से डाटा मांगे जाने में इजाफा हुआ है, लेकिन यह संख्या इस साल की पहली छमाही में 500 से 1000 के बीच रही है.

हम नहीं कर रहे इंटरनेट संसाधन का पूरा इस्तेमाल  

इंटरनेट से सूचना की जो संपत्ति हमें हासिल हो सकती है हम उसका पूरा फायदा नहीं उठा पा रहे हैं.

इंडिया में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है. देश में फेसबुक का दूसरा सबसे बड़ा यूजर बेस है. दुनिया में इंटरनेट आबादी के लिहाज से भी हम दूसरे नंबर पर हैं. हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं.

ऐसे में क्या यह कोई आश्चर्य की बात है जो टेक्नोलॉजी कंपनियों के पास हमारे यहां से बड़ी संख्या में यूजर डाटा रिक्वेस्ट भेजी जा रही हैं?

इस लिहाज से देखा जाए तो इंडिया का इंटरनेट परिदृश्य पाबंदियों और तानाशाही वाला नहीं है, जैसा कि हर कोई इसे दिखाना चाहता है.

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