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फेक न्यूज का खतरा: दोष आपका है, फेसबुक का नहीं

फेक न्यूज का प्रभाव चुनावों, नीतियों, कानून-व्यवस्था और शांति पर पड़ेगा.

Nash David Updated On: Dec 07, 2016 03:15 PM IST

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फेक न्यूज का खतरा: दोष आपका है, फेसबुक का नहीं

पिछले कुछ दिनों से ऑनलाइन फेक न्यूज के बारे में दिख रही खबरों के बारे मेंं सोच रहा हूं. यह सब शुरू हुआ जब अमेरिका ने डोनाल्ड ट्रंप को अपने 45वें राष्ट्रपति के तौर पर चुना. पूरी दुनिया मतगणना के नतीजों पर नजर गड़ाए हुए थी और डोनाल्ड ट्रम्प की बढ़त को देखकर आश्चर्यचकित हो रही थी.

नि:संदेह, हममें से बहुत से ऐसे थे जो परिणाम को लेकर स्तब्ध थे. सभी विश्लेषक व प्रभाव रखने वाले पॉपुलर मीडिया ने हिलेरी की जीत की भविष्यवाणी की थी. हम मान बैठे थे कि सामाजिक मत लोकप्रिय मत का प्रतिबिंब होता है. लेकिन हम सब गलत साबित हुए. और कैसे.

त्वरित हास्य चोट नहीं पहुंचाता

मैं फर्स्टपोस्ट का हिस्सा हूँ और खबरों के व्यापार में हूं, ऐसे में मुझे बीच-बीच में कुछ हल्की-फुल्की चीजें पढ़ना पसंद है. मैं फेकिंग न्यूज (डिस्कलोज़र: टेक 2, फर्स्टपोस्ट और फेकिंग न्यूज नेटवर्क 18 का हिस्सा हैं) पढ़ता हूं. मुझने हंसना पसंद है. मैं द अनियन भी पढ़ता हूं. हास्य जीवन के लिए अच्छा होता है. आपको हास्य की जरूरत होती है. जितना ज्यादा, उतना अच्छा.

यहां जिस बात पर मैं जोर दे रहा हूँ, वह यह कि हास्य, पैरोडी, मीडिया और विश्लेषणों के बीच फर्क साफ होना जरूरी है. उदाहरण के लिए, ट्विटर की बात करते हैं. हम सबके अपने पसंदीदा स्टार होते हैं और हमें शख्सियतों पर किए गए हास्य पढ़ने में मजा आता है. ज्यादा प्रासंगिक उदाहरण मिलता है तकनीकी क्षेत्र से. एक हैं सर जॉनी इव, जो कि एपल के उत्पादों के डिजाइन की जिम्मेदारी संभालते हैं. मैं उन्हें ट्विटर पर ढूंढ नहीं पाया. लेकिन मैं @JonyIveParody से किये गए ट्विट पढ़कर हंस लेता हूं. यहां मैं पूरी तरह स्पष्ट होता हूं कि दोनों को मिलाना नहीं है. लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो पैरोडी अकाउंट के ट्वीट पढ़कर समझते हैं कि यह वास्तविक अकाउंट से किया गया है.

कुछ ही दिन पहले की बात है, एक फेक न्यूज आर्टिकल फेसबुक पर ट्रेंड कर रहा था, ऐसा होना फेसबुक की क्रियान्वयन क्षमता पर सवाल खड़े कर रहा था. बहुत जल्द यह सोशल मीडिया पर बड़ी चर्चा का विषय बनकर उभरा.

facebook

वास्तविकता और काल्पनिकता समान नहीं होती

आपके लिए भले ही यह साफ हो, लेकिन बड़े ऑनलाइन वर्ग के लिए यह सत्य नहीं है. हमारी जिम्मेदारी है कि एक व्यक्ति, ऑनलाइन कंटेंट के उपभोक्ता और सोशल मीडिया के यूजर के तौर पर दुनिया को तर्कसंगत सोच की तरफ ले जाएं. इसमें हम अपने पूर्वाग्रह और अपने अनुभव जोड़ेंगे जरूर लेकिन हमें अपने विचार ठोस तथ्यों के आधार पर बनाने चाहिए.

यहां स्पष्ट कर दूं, अगर आपको लगता है कि फेक न्यूज हास्य पैदा करने वाली खबर होती है तो जान लीजिए कि ऐसा नहीं है. दरअसल इसके पीछे दुर्भावनापूर्ण इरादे होते हैं या विज्ञापन द्वारा कमाई करने का स्वार्थपूर्ण उद्देश्य होता है, जिसके लिए करोड़ों इंटरनेट यूजर्स के भोलेपन के साथ खिलवाड़ किया जाता है और उन्हें कैसी भी विषयवस्तु थमा दी जाती है.

हमें विवेकबोध की जरूरत है जो सच और झूठ में अंतर करने के लिए हमारा बैरोमीटर हो. यह देखना रोचक होता कि अभी कितने भारतीयों के पास अर्थशास्त्र को लेकर जागरूकता है, या कैश व क्रेडिट मार्किट पर कितनी जोरदार पकड़ है, नोटबंदी के बहुमूल्य धातुओं पर प्रभाव और भारतीय अर्थव्यवस्था की भविष्य की संभावनाओं की कितनी जानकारी है. लेकिन अभी सामने आ रहे विचार तथ्यों एवं विश्लेषणों से परे केवल भावनाओं में बह कर दिए जा रहे हैं.

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विश्वनीयता कहां चली गई है?

शोर पैदा करते न्यूज एंकर भावनाएं भड़का रहे हैं. उत्साह के मारे पत्रकार ऑनलाइन सनसनी, सोशल मीडिया के खुराफातों में बह रहे हैं. मुझे याद है मैंने कुछ पत्रकारों के वीडियो देखे हैं जिनमें वे 500 और 2000 के नोटों के बारे में बात कर रहे हैं. उनमें यूनिक GPS चिप को लेकर एक झूठ फैलाया जा रहा था. दावा किया जा रहा था कि अगर नोट को जमीन से 200 फीट नीचे भी गाड़ दिया जाए तब भी यह नोट का पता भेजता रहेगा. यह भी पता लगाया जा सकेगा कि आपसे नोट किसने लिया और आगे कहां गया.

इन्हें देखकर आह निकलती है.

अगर पत्रकारों को खबर देनी है, तो जरूरी है कि वह तथ्यों पर आधारित हो. खबर के कई पहलू हो सकते हैं और प्रत्येक खबर के आसपास कई कहानियां हो सकती हैं. लेकिन जब स्रोत ही झूठ के धरातल पर खड़ा होता है, तब स्थिति दुखद है.

जानकारी के अभाव में इंसान इसका शिकार हो जाता है. लोकप्रिय खासकर वायरल कहानियां आकर्षित करती हैं और इनका प्रभाव इतना ज्यादा हो सकता है कि दलाल कमाई के चक्कर में लोगों का फायदा उठा सकते हैं.

जीपीएस नोट वाले उदाहरण को लीजिए- आप क्या करेंगे इस खबर के बाद कोई उपकरण आ जाता है, जैसे बटुआ, जो दावा करता है कि इसके कारण आपकी नोट की स्थिति का पता नहीं चलेगा? आप और मैं शायद जानते हैं कि यह हो नहीं सकता. बल्कि इसकी कोई ज़रूरत भी नहीं है. लेकिन इससे जो अव्यवस्था पैदा होती है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है? जानकारी ही बचाव है.

अगर कानून बनाने की बात करते हैं तो इससे अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा होता है. अगर कोई संस्था खबरों के स्रोत की विश्वसनीयता पर फैसला करता है तो उसे यह भी हक मिल जाता है कि तथ्यों की रिपोर्टिंग सुनिश्चित कर सके. लेकिन हमारी दुनिया कई ध्रुवों वाली है. ऐसे में आप लोगों को लोगों के खिलाफ, विचारों को विचारों के खिलाफ खड़े करते होते हैं. एक आदर्श दुनिया के लिए नियमन सबसे बेहतर संभावना है लेकिन इससे न केवल सामाजिक शांति के भंग होने का रिस्क होता है बल्कि लोगों के औसत मानसिक स्तर में गिरावट का भी.

फेक न्यूज की समस्या पर वापस आते हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स में छपा एक आलेख फर्जी खबरों से पैदा खतरों पर बात करता है. यह सारा खेल पैसों का है. जब तक विषयवस्तु सनसनी बन रही है, जब तक लाखों लोग वेबसाइट्स पर आ रहे हैं, इसके असर अर्थहीन हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. उनका प्रभाव चुनावों, नीतियों, समाज में कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने पर पड़ेगा. इंटरनेट लोकतांत्रिक जगह है और रहनी भी चाहिए. इस आजादी को नियंत्रित करने की तमाम कोशिशें की जा चुकी हैं. जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया पर कोई भी पोस्ट साझा करने से पहले सावधानी बरती जाए और सच्चाई परखी जाए.

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