विधानसभा चुनाव | गुजरात | हिमाचल प्रदेश
S M L

संडे स्पेशल: बड़े बल्लेबाजों और गेंदबाजों की चमक में खो गए विकेटकीपर

काबिल होने के बावजूद लंबे समय तक टीम में नहीं रह पाते थे विकेटकीपर

Rajendra Dhodapkar Updated On: Sep 17, 2017 03:55 PM IST

0
संडे स्पेशल: बड़े बल्लेबाजों और गेंदबाजों की चमक में खो गए विकेटकीपर

ऐसे खिलाड़ियों की काफी चर्चा होती है जो काबिल होने के बावजूद किसी वजह से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेल पाए या उतना नहीं खेल पाए जितनी उनसे उम्मीद थी.

जिंदगी की और  बातों की तरह क्रिकेट का गणित भी सीधी-सीधी लकीरों पर नहीं चलता. हो सकता है कि किसी प्रतिभाशाली बल्लेबाज का करियर तभी अपने उरूज पर हो जब टीम में किसी नए बल्लेबाज की जगह ही न हो. जब भारत में राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण जैसे बल्लेबाज थे तब मध्यक्रम में किसी बल्लेबाज की जगह ही नहीं हो सकती थी.

यहां तक कि वीवीएस लक्ष्मण जिन्हें मार्क वॉ के साथ अपने दौर का सबसे आकर्षक बल्लेबाज कहा जा सकता है, उन्हें भी टीम में काफी अनिश्चिताओं का सामना कर पड़ा था. वैसे ही पद्माकर शिवलकर और राजिंदर गोयल को बाएं हाथ का महान स्पिनर माना जाता है, जो इसलिए एक भी टेस्ट नहीं खेल पाए क्योंकि उस वक्त बिशनसिंह बेदी थे. इसके साथ यह भी सही है कि कभी जगह खाली होने की वजह से अपेक्षाकृत कमजोर खिलाड़ी भी टीम में आ जाते हैं.

इकलौते विकेटकीपर के लिए कई विकल्प

बल्लेबाजों और गेंदबाज़ों के बारे में यह जितना सच है, उससे कहीं ज़्यादा यह विकेटकीपर के बारे में सच होता है. इसकी वजह यह है कि टीम में बल्लेबाज़ों की पांच या छह जगहें होती हैं, गेंदबाज भी कम से कम से कम चार-छह होते ही हैं. लेकिन विकेटकीपर की एक ही जगह होती है और अगर कोई विकेटकीपर अच्छा काम कर रहा हो तो उसे हटाने की कोई वजह नहीं होती. विदेशी दौरे के लिए जो अतिरिक्त विकेटकीपर चुने जाते हैं वे अक्सर एक टेस्ट  मैच खेले बिना वापस आ जाते हैं. अगर पहले विकेटकीपर का प्रदर्शन बहुत खराब हुआ हो या वह चोट की वजह से अनफिट हो जाए तो ही उसके लिए मौका बनता है.

संडे स्पेशल: क्यों आसान नहीं है भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान बनना और बने रहना?

साल 1971 के वेस्टइंडीज़ दौरे के संदर्भ में हम पुलैया कृष्णमूर्ति की चर्चा कर चुके हैं जो फारूख इंजिनीयर की गैरमौजूदगी में पांचों टेस्ट खेले लेकिन इंजीनियर की वापसी के बाद एक भी टेस्ट नहीं खेल पाए. उस दौरे के दूसरे विकेटकीपर रूसी जीजीभॉय एक भी टेस्ट नहीं खेले और फिर कभी भारतीय टीम के लिए चुने भी नहीं गए.

शुरुआती दिनों में टिक कर नहीं खेलते थे विकेटकीपर

भारत के लिए सिर्फ एक टेस्ट खेलने वाले खिलाड़ियों की लिस्ट में तीन विकेटकीपर हैं - विजय राजिंदरनाथ , विजय यादव और नमन ओझा. इसके अलावा भी दो चार टेस्ट खेले विकेटकीपर भी काफी हैं, बल्कि शुरुआती दिनों में तो विकेटकीपर की जगह आने-जाने वाली जगह ही थी. भारत के लिए पहला टेस्ट खेलने और भारत की पहली पारी में पहली गेंद का सामना करने वाले जनार्दन नवले भी टीम में टिक नहीं पाए. वे सिर्फ दो टेस्ट के बाद टीम से बाहर हो गए. उनकी जगह लेने वाले दिलाकर हुसैन भी तीन टेस्ट मैच खेल पाए. आलम यह था कि 1952 में पाकिस्तान के खिलाफ पांच टेस्ट मैचों में चार विकेटकीपर, प्रोबीर सेन, इब्राहिम माका, नाना जोशी और विजय राजिंदरनाथ खेले. राजिंदरनाथ का यह एकमात्र टेस्ट था.

फारूख इंजीनियर और बुधी कुंदरन के बीच की विकेटकीपिंग प्रतिस्पर्धा

भारत में विकेटकीपरों का सबसे दिलचस्प मुकाबला फारूख इंजीनियर और बुधी कुंदरन के बीच था. साठ के दशक में इन दोनों विकेटकीपरों के बीच तगड़ी प्रतिस्पर्धा थी. दोनों काफी हद तक एक जैसे थे. दोनों ही अच्छे और स्टाइलिश विकेटकीपर थे. दोनों बहुत आक्रामक और आकर्षक बल्लेबाज़ थे. दोनों बहुत लोकप्रिय थे. बुधी कुंदरन की उम्र इंजीनियर से कम थी लेकिन वे पहले टेस्ट खेले. उन्होंने नरेन्द्र ताम्हणे को हटाकर अपनी जगह बनाई थी.

ताम्हणे को कई लोग अब तक का सर्वश्रेष्ठ विकेटकीपर मानते हैं लेकिन वे चुपचाप अपना काम करने वाले विकेटकीपर थे. कुछ रिद्धिमान साहा की तरह. साहा किस्मत वाले हैं कि वे टेस्ट टीम में हैं, क्योंकि अक्सर इस किस्म के विकेटकीपर स्टाइलिश और आकर्षक विकेटकीपरों से मात खा जाते हैं. ताम्हणे बल्लेबाज़ भी कुंदरन की तरह के नहीं थे.

कुंदरन के एक साल बाद इंजीनियर का टेस्ट मैच में खेलना हुआ. फिर यह प्रतिस्पर्धा शुरू हुई. कभी इंजीनियर बाजी मार जाते, कभी कुंदरन. जनता के लाडले दोनों ही थे दोनों की धुआंधार बल्लेबाजी के कई किस्से हैं. कुंदरन इतने अच्छे बल्लेबाज थे कि तीन टेस्ट मैचों में उन्हें सिर्फ बल्लेबाज़ की तरह खिलाया गया. हालांकि तब तक यह साफ हो गया था कि क्रिकेट के आकाओं की पहली पसंद इंजीनियर ही थे क्योंकि विकेटकीपिंग इंजीनियर ने ही की.

बड़े नामों में दब गया इंद्रजीत सिंहजी का नाम

कुंदरन ने ओपनिंग बल्लेबाजी की और एक टेस्ट में तो गेंदबाज़ी की भी शुरुआत की. कई बार अच्छे प्रदर्शन के बावजूद कुंदरन बाहर रहे. एक बार गुस्से में उन्होंने चयनकर्ताओं को काफी खरी-खोटी सुनाई, और यह तय हो गया कि वे अब भारत के लिए नहीं खेल पाएंगे.  वे स्कॉटलैंड जाकर बस गए. उनकी पत्नी स्कॉटिश थीं जिनसे उनका प्रेमप्रसंग इंग्लैंड दौरे पर हुआ था.

उसके बाद भारतीय क्रिकेट के आकाओं ने उन्हें कभी याद नहीं किया जिसका उन्हें साल 2002 में अपनी मौत तक मलाल रहा. इंजीनियर अब इंग्लैंड में रहते हैं और अब भी उनका जलवा फिल्मी सितारों से कम नहीं है. कीथ मिलर और डेनिस कॉम्पटन के बाद वे तीसरे क्रिकेटर हैं जो ब्रिलक्रीम के विज्ञापनों में आए.

इन दो चमकीले सितारों की चमक में कम से कम एक और बढ़िया विकेटकीपर बल्लेबाज खो गया. ये थे केएस इंद्रजीत सिंहजी, जो महान रणजी और दुलीप सिंहजी के रिश्तेदार थे तो हनुमंतसिंह और सूर्यवीर सिंह भी रिश्ते में उनके भाई लगते थे. मैंने खुद उन्हें चंद्रशेखर की गेंदबाजी पर शानदार विकेटकीपिंग करते देखा है, जो किसी भी विकेटकीपर की अंतिम कसौटी है. इंद्रजीत सिंहजी साठ के दशक में सिर्फ चार टेस्ट मैच खेल पाए.

पूरा पैकेज हैं महेंद्र सिंह धोनी

महेंद्र सिंह धोनी भारत के पहले विकेटकीपर कप्तान हैं. धोनी की विकेटकीपिंग में कुछ कमियां हैं लेकिन एक पूरे पैकेज की तरह धोनी का व्यक्तित्व और प्रदर्शन इतना जबरदस्त है जो किसी और विकेटकीपर बल्लेबाज का नहीं रहा. धोनी के दौर में पार्थिव पटेल, दिनेश कार्तिक, नमन ओझा, रिद्धिमान साहा , संजू सैमसन, ऋषभ पंत जैसे विकेटकीपर उनकी छाया में ओझल रहे. साहा तो टेस्ट मैच में भारत के विकेटकीपर हो गए लेकिन बाकी तो टीम में लगातार जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे हैं. सैमसन और पंत के लिए उम्मीद इसलिए है क्योंकि उम्र उनके साथ है.

इसीलिए विकेटकीपर होना आसान नहीं हैं , उसके लिए टीम के साथ साथ अपना भी हौसला बनाए रखने की कठिन चुनौती होती है और गेंद के अलावा भी बहुत कुछ झेलना होता है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi