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जन्मदिन विशेष, माखन सिंह : एक बदकिस्मत 'फ्लाइंग सिख'

मुफलिसी में अर्जुन अवार्ड तक बेचना पड़ा माखन के परिवार को

Norris Pritam | Published On: Jul 01, 2017 02:14 PM IST | Updated On: Jul 01, 2017 03:02 PM IST

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जन्मदिन विशेष, माखन सिंह : एक बदकिस्मत 'फ्लाइंग सिख'

खेलों में सफलता के लिए पसीना तो बहाना ही पड़ता है. लेकिन कुछ खिलाड़ी ऐसे भी होते हैं जो पसीना बहाने और अच्छे प्रदर्शन के बाद भी सफलता के शिखर पर नहीं पहुंच पाते. बस मन मार कर यही कहकर सब्र कर लेते हैं कि `काश किस्मत ने साथ दिया होता'. यह सच है कि किसी भी खिलाड़ी की सफलता के पीछे काफी कुछ किस्मत या भाग्य पर निर्भर करता है. पूर्व स्प्रिंटर स्वर्गीय माखन सिंह का नाम भी इसी लिस्ट में आता है.

मिल्खा सिंह को भी लगता था माखन से डर

साठ के दशक में `फ्लाइंग सिख'  मिल्खा सिंह और पाकिस्तान के अब्दुल ख़ालिक़ एशिया के दो वर्ल्ड क्लास स्प्रिंटर थे. दोनों का बहुत नाम था. दोनों को आज भी भारत-पाकिस्तान के अलावा दुनिया के कई देशों में याद किया जाता है. लेकिन यह  कम ही लोगों को मालूम है कि इन दोनों को उनके करियर के टॉप पर हराने वाला वाला भी एक एथलीट था, जिसका नाम था माखन सिंह. और 1 जुलाई के दिन, जब माखन का जन्मदिन है तो वो सब बातें याद आती हैं जिनसे उस खिलाड़ी को याद किया जा सकता है और खिराजे अकीदत पेश की जा सकती है.

1 जुलाई 1937 को होशियारपुर में जन्मे माखन ने अपना खेल खेल करियर मिल्खा के साथ आर्मी में ही शुरू किया था.  1959 में कटक के नेशनल गेम्स में 400 मीटर में ब्रोंज जीत कर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई. 1962 में जकार्ता के एशियन गेम्स में माखन ने मिल्खा सिंह, जगदीश सिंह और दलजीत सिंह के साथ चार गुणा 400 मीटर रिले का गोल्ड गेम्स रिकॉर्ड के साथ जीता. लेकिन  नाम उनका तब हुआ जब उन्होंने 1964 में कलकत्ता के नेशनल गेम्स में मिल्खा को 400 मीटर में हराया. यह बात अलग है कि इस मीट के करीब एक महीने बाद दिल्ली में नेशनल ओपन चैम्पियनशिप में मिल्खा ने अपनी हार का बदला लिया.

लाहौर में भी माखन ने ज़बरदस्त 200 मीटर रेस दौड़ी और मिल्खा को पकड़ने की होड़ में अब्दुल खालिक को पछाड़ गए. मिल्खा आज भी मानते हैं कि अगर हिंदुस्तान में उन्हें किसी से डर लगता था, तो वो थे माखन सिंह.

मिल्खा से अलग था माखन का ट्रेनिंग का तरीका

पूर्व राष्ट्रीय कोच जोगिन्दर सिंह सैनी 1962 में जकार्ता एशियन गेम्स में भारतीय टीम के कोच थे. भारतीय टीम के साथ वह उनका पहले विदेशी दौरा था. फर्स्टपोस्ट से खास बातचीत में सैनी याद करते हैं,  `माखन स्टार्ट पर थोड़े स्लो थे वरना वो बहुत ही अच्छे स्प्रिंटर थे.' सैनी कहते हैं, `वो 200 और 400 मीटर अच्छी भागते थे. अगर उनकी बेसिक स्पीड थोड़ी और होती तो वो मिल्खा की टक्कर के होते.'

1964 टोक्यो ओलंपिक्स से पहले सैनी जर्मनी में प्रशिक्षण लेने गए थे. उसी समय वहां भारतीय एथलीटों का दल, जिसमें मिल्खा और माखन भी थे, ट्रेनिंग के लिए आया. भारतीय एथलेटिक्स फेडेरशन ने सैनी को भारतीय टीम के साथ ट्रांसलेटर के रूप में नियुक्त किया. सैनी कहते हैं, 'मैंने देखा कि मिल्खा और माखन दोनों दोस्त तो थे लेकिन कभी-कभी माखन बिलकुल अलग ट्रेनिंग करता था.' माखन को जरूर लगता होगा कि किसी दिन उन्हें मिल्खा से अच्छा बनना है.

किस्मत की रेस में मात खा गए माखन

भारतीय क्रिकेट टीम के फिटनेस एक्सपर्ट रह चुके पूर्व एथलीट कैप्टन कुलभूषण डोगरा ने भी मिल्खा और माखन को बहुत करीब से देखा है. डोगरा के मुताबिक, 'माखन की शक्ल थोड़ी नेपालियों जैसे थी, इसलिए उसके सब साथी उसे गोरखा बोलते थे.'  डोगरा याद करते हैं, 'ये तो बस उसकी बदकिस्मती थी कि वो ऐसे समय पर आया जब मिल्खा भी था वरना माखन का भी खूब नाम होता.'

इसके लिए डोगरा क्रिकेट उदाहरण देते हैं, `यह ठीक वैसे ही है, जैसा स्पिनर राजेंदर गोयल के साथ हुआ. वो रणजी ट्रॉफी में विकेट ले ले कर थक गए लेकिन टेस्ट नहीं खेल सके क्योंकि उसी समय भारत के पास बेदी, प्रसन्ना और चंद्रशेखर जैसे स्पिनर पहले ही थे.'

Mrs Makhan

माखन की किस्मत सिर्फ ट्रैक पर ही खराब नहीं थी. उसके बाहर तो और भी खराब थी. 1972 में आर्मी से सूबेदार की पोस्ट से रिटायर होने के बाद तो माखन का बुरा हाल  हो गया था. चार-पांच साल में उनके जीवन में बिलकुल उथल पुथल मच गयी  थी. उनके एक बेटे का मर्डर हुआ, दूसरा नौकरी न मिलने  के कारण एक ढाबे पर बर्तन धोने पर मजबूर हुआ और साथ ही माखन खुद ट्रक चलाने लगे. लेकिन बदकिस्मती ने उनका साथ ना छोड़ा. डायबिटीज की वजह से उनकी एक टांग काटनी पड़ी और जो उनकी किसी तरह गुजर-बसर हो रही थी वो भी खत्म हो गई.

इन्हीं दिनों मैं दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम किसी काम से गया तो वहां रिसेप्शन पर एक आदमी को बैसाखी पर एक टांग से खड़े एक आदमी को सिक्योरिटी गार्ड से स्टेडियम में जाने की विनती करते देखा. कुछ फटे से बदबूदार कपड़े, खुली दाढ़ी और फटी चप्पल -- लेकिन जब उस इंसान ने गार्ड को बताया की वो भागता था और उसका नाम माखन है तो मेरे तो पांव तले जमीन खिसक गई थी.

अफसोस गार्ड ने तो वो नाम कभी सुना भी ना था. बड़ी हुज्जत के बाद गार्ड ने माखन सिंह को अंदर जाने दिया. कुछ समय ट्रैक को पास से देख कर माखन नम आंखों से वापस चले गए. यह हाल था उस एथलीट का जिसे 1964 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने राष्ट्रपति भवन के अशोक हॉल में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया था. बाद में माखन की पत्नी सुरिंदर कौर घर का चूला जलने के लिए उस पुरस्कार को नीलाम करने पर मजबूर हो गईं.

अगर माखन फेसबुक और ट्वीट के दौर के एथलीट होते तो आज उन्हें `हैप्पी वाला हैप्पी बर्थडे ' का ट्वीट तो कम से कम मिल ही जाता. अफसोस, फ्लाइंग सिख को चुनौती देने वाले सिख को याद करने वाले बहुत कम लोग हैं.

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