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क्या वाकई मोबाइल खिलाड़ियों को चैंपियन बनने से रोकता है?

गोपी मानते हैं कि मोबाइल जैसी चीजें दिमाग को भटकाने का काम करती हैं, दिमाग ही है, जो आपको चैंपियन बनाता है या उससे रोकता है

Shailesh Chaturvedi Updated On: Aug 30, 2017 05:44 PM IST

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क्या वाकई मोबाइल खिलाड़ियों को चैंपियन बनने से रोकता है?

चंद रोज पहले पुलेला गोपीचंद का एक इंटरव्यू आया था. इसमें गोपी ने भारतीय बैडमिंटन की तो बात की ही थी, चीन की भी बात की. उन्होंने कहा कि आज से दस साल पहले किसी चीनी खिलाड़ी के हाथ में मोबाइल नहीं देखा जा सकता था. आज की तारीख में वे मोबाइल लेकर घूमते हैं. क्या बैडमिंटन में चीन का वर्चस्व खत्म होने की वजह यही है? और क्या वाकई मोबाइल इतनी अहम चीज है, जो आपको चैंपियन बना दे या बनने से रोक दे?

गोपीचंद का स्टाइल हमेशा से ऐसा रहा है, जहां वो खिलाड़ियों के खान-पान से लेकर हर कुछ अपने हिसाब से तय करते हैं. बड़े टूर्नामेंट से कुछ समय पहले मोबाइल इस्तेमाल करने की मनाही होती है. ओलिंपिक सिल्वर जीतकर सिंधु ने कई महीने बाद ठीक से मोबाइल का इस्तेमाल किया था. गोपी मानते हैं कि मोबाइल जैसी चीजें दिमाग को भटकाने का काम करती हैं. दरअसल, दिमाग ही है, जो आपको चैंपियन बनाता है या उससे रोकता है.

हाल ही में विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप हुई थी. इसमें महिला और पुरुष दोनों वर्गों का खिताब चीन को नहीं मिला. लगातार आठ साल पुरुष वर्ग में गोल्ड किसी चीनी खिलाड़ी नहीं जीता था. महिलाओं में 2001 से 2011 तक लगातार गोल्ड चीनी खिलाड़ी के हिस्से आया था. अब भी टॉप 50 खिलाड़ियों में चीन के सात पुरुष खिलाड़ी हैं. चार महिलाएं भी टॉप 50 में हैं. लेकिन हर कोई मानेगा कि चीन का वो दबदबा नहीं रहा, जिसके लिए उसे जाना जाता था.

आज की तारीख में अगर चीन के सात खिलाड़ी टॉप पचास में हैं, तो भारत के भी इतने ही पुरुष खिलाड़ी हैं. महिलाओं में भी तीन भारतीय टॉप पचास में हैं. तो क्या वाकई भारतीय खिलाड़ियों के ऊपर आने और चीन का दबदबा खत्म होने में मोबाइल का भी रोल है?

कुछ साल पहले की बात है. एक हॉकी खिलाड़ी के खेल में अचानक गिरावट आई थी. उस समय कोच ने आपसी बातचीत में कहा था कि सबसे बड़ी दिक्कत मोबाइल है. उन्होंने कहा था, ‘वो रात-रात भर मोबाइल पर लगा रहता है. अगर आप मोबाइल पर ही रहेंगे, तो खेल पर कहां से ध्यान देंगे.’ दिलचस्प बात है कि कुछ समय बाद उस खिलाड़ी ने मोबाइल पर ध्यान देना कम किया और उसके खेल में सुधार नजर आने लगा.

कुछ समय पहले एक किस्सा फिल्म अभिनेता और एक दौर में खेल पत्रकारिता भी करने वाले टॉम ऑल्टर ने सुनाया था. टॉम खुद भी अच्छे खिलाड़ी रहे हैं. दिलचस्प है कि वो मोबाइल नहीं रखते. उन्हें लगता कि मोबाइल आपको गुलाम बनाता है. उन्होंने गीत सेठी का किस्सा सुनाया. ये 2005 की बात है. गीत कई साल से विश्व चैंपियन नहीं बने थे. चिंतित थे. टॉम ऑल्टर ने कहा, ‘गीत ने मुझसे बात की, तो मैंने कहा कि कुछ वक्त मोबाइल से अलग रहकर देखो.’ एक साल बाद यानी 2006 में गीत सेठी एक बार फिर विश्व चैंपियन बन गए. उन्होंने इसका श्रेय भी टॉम ऑल्टर को दिया.

क्रिकेट में भी इस तरह के कई किस्से हैं, जिसमें खिलाड़ी को मोबाइल से दूर रहने की सलाह दी गई है. ऐसे भी, जब कोड ऑफ कंडक्ट की वजह से मोबाइल दूर रखे गए. हालांकि क्रिकेट में बाकी कई खेलों के मुकाबले मोबाइल का असर कम दिखाई देता है. इसमें कोई शक नहीं कि मोबाइल किसी को चैंपियन नहीं बना सकता. लेकिन मोबाइल के इस्तेमाल पर समझदारी न बरतना किसी चैंपियन बन सकने की क्षमता वाले खिलाड़ी को टॉप पर पहुंचने से रोक जरूर सकती है.

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