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जन्मदिन विशेष : जब उषा के पास किराए के पैसे तक नहीं थे... और जाना था पाकिस्तान

27 जून को 53 साल की हो गईं भारत की उड़न परी पीटी उषा

Norris Pritam | Published On: Jun 27, 2017 12:05 PM IST | Updated On: Jun 27, 2017 12:45 PM IST

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जन्मदिन विशेष : जब उषा के पास किराए के पैसे तक नहीं थे... और जाना था पाकिस्तान

बात 1980 की है. महीना शायद मार्च का था. काफी तादाद में दिल्ली के एथलीट नेशनल स्टेडियम में ट्रेनिंग कर रहे थे. उनमें मैं भी था. तभी एक छोटी सी पतली सी लड़की वहां आई, जो शक्ल से दक्षिण भारतीय लग रही थी. पता चला कि उसका नाम पीटी उषा था. हमने उसका नाम सुना था. हमने उससे बात करने की कोशिश की. दिक्कत यह थी कि न उसे हिंदी या इंग्लिश आती थी ना हमें मलयालम.

उसने ट्रेनिंग की और उसे देख कर साफ मालूम हुआ कि महज 16 साल की होने के बावजूद वो काफी टैलेंटेड थी. उषा कराची में होने वाले पाकिस्तान नेशनल गेम्स के लिए पाकिस्तान जाने के लिए दिल्ली में थीं. हमेशा की तरह एथलेटिक फेडरेशन ने उषा और लॉन्ग जम्पर मेर्सी मेथीओस की एंट्री तो भेजी. लेकिन पैसा एक नहीं दिया - दोनों अपने पैसे इकट्ठा करके केरल से दिल्ली आए और फिर पटियाला में कुछ और भारतीय खिलाडियों के साथ अमृतसर के रास्ते वाघा बॉर्डर पहुंचे. वहां तो पहुंच गए. लेकिन उनके पास वाघा से लाहौर जाने का किराया नहीं था.

पंजाब के एथलीट अमृतपाल सिंह ने उन दोनों का किराया दिया और तब किसी तरह वो पाकिस्तान पहुंचे. यह थी उषा की पहली विदेश यात्रा और उनके अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत -- भले दर्दनाक ही सही. और अब (27 जून), जब देश की यह महान एथलीट अपना 53वां जन्म दिन मना रही हैं तो फर्स्ट पोस्ट और उनके लाखों चाहने वालों की तरफ से बहुत बहुत बधाई.

इस बधाई के पीछे उनकी वर्षो की कड़ी मेहनत और खेल जीवन के खट्टे मीठे अनुभव हैं. एक खेल पत्रकार के रूप में मैंने उषा के इस अनुभव को काफी करीब से देखा है. हर खिलाडी के करियर में एक मौका होता है और अगर खिलाडी उस मौके पर खरा उतरे तो जिंदगी बदल जाती है. उषा के जीवन में यह मौका 1984 के लॉस एंजिलिस ओलिंपिक गेम्स में था. लेकिन वो 400 मीटर हर्डल में पदक जीतने से चूक गईं. पदक आता तो यकीनन जिंदगी और भी ऊंचे मुकाम पर होती.

मेरे लिए वर्ष 1985 में जकार्ता की एशियाई चैंपियनशिप उषा के जीवन की सबसे बड़ी सफलता रही. मैं जकार्ता में मौजूद था जब उषा ने पांच दिन में हीट्स, सेमी फाइनल और फाइनल मिला कर कुल 12 रेस दौड़ीं और पांच गोल्ड और एक ब्रॉन्ज मैडल जीते. जकार्ता में उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि जिस भी दुकान में हम गए दुकानदारों ने हमें इस शर्त पर भारी डिस्काउंट दिया कि हम उषा को उनकी दुकान में लाएं. जो हमने किया भी.

उषा जीत सकती थी ओलिंपिक पदक!

जकार्ता के बाद 1986 के सिओल एशियाई गेम्स में भी उषा ने धमाका किया और चार गोल्ड और एक सिल्वर जीते - मुझे आज भी  लगता है की अगर नाम्बिआर के बदले उषा किसी अच्छे देशी या विदेशी कोच के पास प्रशिक्षण लेतीं तो ओलिंपिक पदक उनकी पहुंच में था. इस बात को कई बार लॉस एंजिलिस में गोल्ड जीतने वाली मोरक्को की नवल मोवतिकल ने मुझसे कहा है. नवल ने खुद कहा की अगर उन्हें किसी से डर था तो वो थीं उषा.

जब मैंने इंडियन एक्सप्रेस अखबार में काम करते हुए एक लेख में लिखा कि नाम्बिआर को हर्डल्स की ट्रेनिंग देनी नहीं आती तो काफी लोगों ने उसका विरोध किया, खासतौर से दक्षिण भारतीय खेल पत्रकारों ने. यहां तक कि खुद  नाम्बिआर ने दिल्ली के नेहरू स्टेडियम में मुझे पीटने की धमकी दी और गला भी पकड़ा. लेकिन उषा ने मुझसे माफी मांगते हुए नाम्बिआर को अलग किया. उषा को भी शायद लगता था की उन्हें नाम्बिआर से अलग हो जाना चाहिए लेकिन शायद शराफत की वजह से ऐसा नहीं कर सकीं. लेकिन फिर ऐसा हुआ.

1994 में नवल मोवतिकल ने अपने गोल्ड मैडल की दसवीं वर्षगांठ पर मोरक्को में एक शानदार कार्यक्रम किया और फाइनल में पहुंचने वाली सभी आठ एथलीटों को एयर टिकट भेज कर मोरक्को आमंत्रित किया. उषा के अलावा बाकी सब इसमें कार्यक्रम में गए. नवल ने मुझे बाद में बताया कि किसी भारतीय अधिकारी ने उन्हें फोन पर यह कहा कि उषा बिना कोच के नहीं आ सकती. लेकिन उषा को न तो टिकट का पता चला ना अधिकारी के फोन का!

जब उषा के पास नहीं थे भागने के लिए जूते

इस तरह के ना जाने कितने हादसे उषा के साथ हुए हैं. 1998 में एशियन गेम्स के लिए बैंकॉक जाने से दो दिन पहले मैं उषा से दिल्ली नेहरू स्टेडियम में मिला. थोड़ी देर बात करके जब घर पहुंच कर अपनी पत्नी को बताया कि मैं उषा से मिलकर आया हूं तो उसने भी उषा से मिलने की इच्छा जाहिर की. हम उषा को लेकर मलयाली खाना खिलाने कनॉट प्लेस लाए.

बातों बातों में उषा ने बताया कि उसके स्पाइक्स (भागने के जूते) फट गए हैं और बार बार कहने के बावजूद एथलेटिक्स फेडरेशन इंतजाम नहीं कर रही है. सवाल यह था वो बैंकॉक में वो बगैर अच्छे स्पाइक्स के कैसे भागेंगी. मैंने अपने एक दोस्त के जरिए सिंगापुर से जूते मंगवा कर उषा को दिए. यह कहानी सिर्फ ये बताने के लिए है कि उषा को कुछ भी आराम से नहीं मिला.

ट्रैक पर तो उषा ने जी जान लगा ही दी थी लेकिन स्टेडियम के बाहर उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी. इसलिए उषा के प्रदर्शन के लिए उन्हें दोहरी दाद देनी पड़ेगी. कई बार उन्हें चुप रहने या फिर अधिकारियों के खिलाफ बोलने के लिए नुकसान उठाना पड़ा है. लेकिन आज कोच के रूप में और जीवन में संघर्ष करके उषा को होशियारी से काम लेना आ गया है.

कुछ दिन पहले दिल्ली में ओडिशा एशियन एथलेटिक्स की प्रेस कांफ्रेंस में स्टेज पर बैठी उषा से पत्रकारों ने उनके मुंह में शब्द डाल कर फेडेरशन के खिलाफ कुछ उगलवाने की काफी कोशिश की. उनसे पूछा गया कि क्या भारत में एथलीटों के प्रदर्शन में सुधाए हुआ है. उन्होंने मुस्करा कर टाल दिया. लेकिन कांफ्रेंस के बाद मुझे बोला कि क्या खाक सुधार हुआ है. उन्होंने मुस्कराकर कहा, ‘अब भी 1985 की मेरी जकार्ता वाली परफॉरमेंस से मेडल आ सकता है.’ अगर अपने खेल जीवन में उषा यह मंत्र सीख लेती तो अपने लिए जरूर और अच्छा स्थान हासिल कर सकती थी.

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