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संडे स्पेशल: जिस खिलाड़ी के लिए मैदान में नामुमकिन कुछ नहीं था

क्रिकेट उनके लिए हार जीत के परे आनंद और रोमांच का जरिया था.

Rajendra Dhodapkar Updated On: Mar 19, 2017 04:01 PM IST

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संडे स्पेशल: जिस खिलाड़ी के लिए मैदान में नामुमकिन कुछ नहीं था

पिछली बार गॉडफ्रे इवांस की चर्चा करते वक्त दो और नाम बार बार टकराते रहे और जरूरी है कि इनकी चर्चा भी कर ली जाए.

ये दो नाम हैं ऑस्ट्रेलियाई कीथ मिलर और अंग्रेज डेनिस कॉम्प्टन के. इवांस,कॉम्प्टन और मिलर ने दूसरे महायुद्ध के बाद के क्रिकेट को जैसा दिलचस्प बनाया और जैसा रंग भरा, उससे युद्ध के दौरान स्थगित क्रिकेट को फिर से लोकप्रिय बनाने में मदद मिली.

मिलर और कॉम्प्टन गहरे दोस्त थे. दिलचस्प यह है कि दोनों की दोस्ती भारत में युद्ध के दौरान शुरू हुई थी. दोनों ही अपने अपने देश की सेनाओं में थे और कॉम्प्टन को भारत में सेना में भरती हुए नौजवानों की फिटनेस की जांच के लिए भेजा गया था.

वे यहां कुछ रणजी ट्रॉफी मैचों में भी खेले. बहरहाल ऑस्ट्रेलियाई वायु सेना की टीम और अंग्रेज सैनिकों की टीम के बीच मैच में दोनों की मुलाकात हुई जो उम्र भर की दोस्ती में बदल गई. पहले बात मिलर की .

मिलर के बारे जितना लिखा गया है उतना शायद ही किसी क्रिकेटर के बारे में लिखा गया होगा. इसकी वजह यह है कि वे अत्यंत प्रतिभाशाली क्रिकेटर होने के साथ बहुत आकर्षक और विवादास्पद इंसान भी थे.

वे किसी भी रनअप से गेंद फेंक सकते थे.

 मिलर बला के शानदार व्यक्तित्व के धनी थे.  स्टाइलिश, लंबे, खूबसूरत, हवा में उड़ते घने काले बालों वाले मिलर क्रिकेटप्रेमियों के चहेते थे. वे बहुत खतरनाक तेज गेंदबाज थे और ऐसे धुआंधार बल्लेबाज थे कि आज के टी-20 के दौर के बल्लेबाज उनसे सीख सकते हैं.

उनकी एक खूबी यह थी कि कि वे किसी भी रनअप से गेंद फेंक सकते थे. जैसे लेन हटन ने उनके बारे में कहा था कि वे टेस्ट मैच की पहली गेंद धीमी लेग ब्रेक फेंक सकते थे, तूफानी यॉर्कर या बांउसर फेंक सकते थे .

कभी वे पंद्रह कदम के रन अप से धीमी गेंद फेंकते ते कभी सिर्फ पांच कदम के रनअप से तेज यॉर्कर मार देते. उनकी प्रतिभा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1948 में ब्रैडमैन की अजेय टीम के इंग्लैंड दौरे में बल्लेबाजी के औसत में  ब्रैडमैन के बाद वे दूसरे नंबर पर थे और गेंदबाजी के औसत में रे लिंडवाल के बाद दूसरे नंबर पर थे 

लेकिन कप्तान  ब्रैडमैन से उनकी कभी नहीं पटी क्योंकि दोनों का खेल और जिंदगी के प्रति नजरिया बिल्कुल अलग था. ब्रैडमैन गंभीर पेशेवर खिलाड़ी थे, जो सिर्फ जीतने के लिए खेलते थे जिनके खेल में भावनाओं की कोई जगह नहीं थी . मिलर मस्त और मूडी आदमी थे जिनके लिए सिर्फ जीतना मायने नहीं रखता था. मिलर के अंदाज से जुड़े इतने किस्से मिलते हैं कि शुमार मुश्किल है. यहां इक्का दुक्का किस्सों का जिक्र काफी होगा. कुछ और किस्से आगे कभी अन्य प्रसंगों में आएँगे.

जब कप्तान डॉन ब्रैडमेन की बात मानना से किया इनकार

एक बहुत खराब पिच पर मैच हो रहा था, मिलर के सामने थे महान अंग्रेज बल्लेबाज बिल एड्रिच. एड्रिच महायुद्ध में अंग्रेज वायुसेना में रहे थे और उन्हें वीरता का सर्वोच्च मेडल भी मिला था ( मिलर भी वायुसेना में पायलट रहे थे ) मिलर की एक-दो गेंदें एड्रिच के सिर के बहुत करीब से गुजर गईं.

मिलर ने अपनी रफ्तार कम कर दी. ब्रैडमैन मिलर के पास आकर बोले- मुझे लगता है तेज गेंद ज्यादा कारगर होगी. मिलर ने कहा- वह युद्ध से जिंदा बच कर आया है, मैं क्रिकेट की गेंद से उसकी हत्या नहीं कर सकता और गेंद ब्रैडमैन के सामने फेंक दी.

अजेय दौरे के एक मैच में जब ऑस्ट्रेलिया ने सात सौ से ज्यादा रन बनाए तो मिलर पहली गेंद पर आउट होकर लौट आए. उन्हें अगर चुनौती नहीं महसूस होती थी या उनका दिल नहीं मानता तो वे नहीं खेलते थे वरना यह भी हुआ कि जरूरत पड़ने पर उन्होंने 75 गेंदों पर शतक बना लिया या 16 रन देकर सात विकेट ले लिए. जाहिर है ब्रैडमैन उन्हें पसंद नहीं करते थे.

इसका एक खामियाजा उन्हें यह भुगतना पड़ा कि वे कभी ऑस्ट्रेलिया के कप्तान नहीं बन पाए , क्योंकि ब्रैडमैन लंबे वक्त तक चयनकर्ता रहे. रिची बैनो के मुताबिक वे ऐसे महानतम कप्तान थे जो ऑस्ट्रेलिया का नेतृत्व नहीं कर पाए.

उनकी प्रेमिकाओं में इंग्लैंड की राजकुमारी मार्गरेट भी थी

मिलर ने भरपूर जिंदगी जी. उनकी शराबखोरी और महिलाओं से उनके संबंधों के कई किस्से मशहूर हैं.कहते हैं कि उनकी प्रेमिकाओं में इंग्लैंड की राजकुमारी मार्गरेट भी थी.  घुडदौड के भी वे शौकीन थे लेकिन वे सिर्फ़ अय्याश नहीं थे. वे बहुत नफीस, सुसंस्कृत और पढ़े-लिखे इंसान थे. वे बहुत अच्छे लेखक थे और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के ऐसे प्रेमी थे कि युद्ध के दौरान जर्मनी पर हवाई हमला करने गए तो उन्होंने अपने हवाई जहाजज से बॉन शहर के ऊपर से चक्कर लगा आए क्योंकि वह महान शास्त्रीय संगीतकार बीथोवन का शहर था ।

दरअसल युद्ध ने मिलर और उनके जैसे कई नौजवानों का जिंदगी के प्रति दृष्टिकोण बदल दिया. मिलर ने युद्ध में कई  मौतें देखीं और खुद मौत से कई बार बाल बाल बचे.  जीवन की नश्वरता और अनिश्चितता का ऐसा असर उन पर हुआ कि वे जिंदगी को अपनी शर्तों पर बेपरवाह अंदाज में जीते रहे ,बकौल क्रिकेट लेखक जॉन अर्लोट " जैसे जिंदगी छूटी जा रही हो .' क्रिकेट भी उनके लिए हार जीत के परे आनंद और रोमांच का जरिया था.

एक बार उन्हें किसी ने  खेल में तनाव के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा  'कैसा तनाव? क्रिकेट में कोई तनाव नहीं होता है. तनाव तो वह होता है जब आपके पीछे मैसरश्मिट्ज ( जर्मन लड़ाकू हवाई जहाज़ ) लगे हों.' अक्सर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद उन्हें स्वार्थी और गैरजिम्मेदार भी बना देती थी. महिलाओं से उनके संबंधों को लेकर उनकी काफी आलोचना भी हुई.  खासकर जब पचास साल के वैवाहिक जीवन के बाद उन्होंने अपनी बीमार पत्नी को छोड़ दिया तो उनके कई प्रशंसकों के भी दिल टूट गए. 

तमाम विवादों के बावजूद वे कई पीढ़ियों के हीरो बने रहे.  उनके जैसी लोकप्रियता कम ही खिलाड़ियों को मिलती है. महायुद्ध से आहत समाज को उम्मीद और खुशी देने, क्रिकेट को फिर लोकप्रिय बनाने और खिलाड़ियों की कई पीढ़ियों को प्रेरित करने वाले मिलर को हमेशा याद किया जाएगा. जब इस दौर में जब खिलाड़ी बक़ौल एक लेखक " जीत केलिए प्रोग्राम्ड रोबोट " में बदल गए थे तब मिलर जैसे खिलाड़ियों को याद करना और भी जरूरी है.

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