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संडे स्पेशल: क्रिकेट के दिलचस्प बने रहने के लिए जरूरी है स्पिन गेंदबाजी

इस साल सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले पहले दस गेंदबाजों की लिस्ट में सात स्पिनर है

Rajendra Dhodapkar Updated On: Oct 01, 2017 04:47 PM IST

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संडे स्पेशल: क्रिकेट के दिलचस्प बने रहने के लिए जरूरी है स्पिन गेंदबाजी

वर्ष 2017 में सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले पहले दस गेंदबाजों की लिस्ट में सात स्पिनर हैं. यह दिलचस्प इसलिए है कि कुछ ही वर्ष पहले यह मान लिया गया था कि क्रिकेट में स्पिन गेंदबाजी का अवसान निकट है. इसकी वजह यह थी कि पहले एकदिवसीय क्रिकेट और उसके बाद टी-ट्वंटी के आने से बल्लेबाजी ज्यादा आक्रामक हो गई थी. इसके अलावा बल्ले ऐसे  बनने लगे कि मिसहिट भी सीमा के पार छह रन देने लगीं.

अस्सी के दशक में कई प्रतिभाशाली स्पिनर इस बदलाव के दौर में बदलने की कोशिश में अपनी गेंदबाजी की धार गंवा बैठे. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से स्पिनरों ने वापसी की और आज दुनिया में सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले तीन गेंदबाज स्पिनर हैं, जिनका करियर लगभग साथ-साथ चला हैशेन वॉर्नमुथैया मुरलीधरन और अनिल कुंबले. यूं ही नहीं शेन वॉर्न के आगमन को सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट में तीस साल की सबसे स्वागतयोग्य घटना कहा था. स्पिन गेंदबाजी का बने रहना क्रिकेट के दिलचस्प बने रहने के लिए जरूरी है क्योंकि वह ताकत से ज़्यादा हुनर और दिमागी दांवपेच का खेल है.

आज के बल्लेबाज स्पिन खेलने में माहिर नहीं

यह बात नए सिरे से फिर याद आने की दो वजहें हैं. भारत ऑस्ट्रेलिया की एकदिवसीय सीरीज और इंडिया रेड-ब्लू के बीच दलीप ट्रॉफी फाइनल. दोनों ने एक बात साबित की. इन दिनों बल्लेबाज को गेंद की गति से उतना खतरा नहीं महसूस होता जितना उसके हवा  में या टिप्पा खाने के बाद हरकत से है यानी स्पिन या स्विंग से है. इस बात की चर्चा कुछ क्रिकेट के जानकार मित्रों से होती रही है कि आजकल के बल्लेबाज स्विंग या स्पिन गेंदबाजी खेलने में उतने माहिर नहीं हैं जितने पुराने बल्लेबाज हुआ करते थे. यह भी एक वजह है कि स्पिन गेंदबाज ज्यादा कामयाब हो रहे हैं. जहां तक स्विंग गेंदबाजी का सवाल है पिछले दिनों कई मैच हुए हैं जिनमें गेंदबाज़ को शुरू में थोड़ी सहायता पिच से मिली और सामने वाले बल्लेबाज ढहते चले गए. भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच पहला वनडे इसकी मिसाल है.

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तेज गेंदबाजी पर सख्त नियमों से भी फर्क पड़ा

इसकी क्या वजहें हो सकती हैं. पहली वजह तो यह है कि हैलमेट और बाकी तरह तरह के कवच-कुंडल आने के बाद तेज गेंदबाजों का आतंक वैसा नहीं रह गया है. अब पिच बनाने में भी ऐसी सावधानी बरती जाती है कि सचमुच खतरनाक किस्म की पिच नहीं बनतीं, जैसी 1976 में सबाइना पार्क की विकेट थी जिस पर माइकल होल्डिंग ने चार भारतीय बल्लेबाजों को अस्पताल पहुंचा दिया था और कप्तान बिशन सिंह बेदी ने निचले क्रम के खिलाड़ियों के जख्मी होने से डर से दूसरी पारी 76 रन पर छह विकेट गिरने के बाद घोषित कर दी थी. बाउंसर्स की संख्या पर नियंत्रण और खतरनाक गेंदबाजी के बारे में सख्त नियमों से भी फर्क पड़ा है.

अब देखने को नहीं मिलते रक्षात्मक शॉट

लेकिन इसी के साथ स्विंग गेंदबाजी के खिलाफ कमजोरी भी बढ़ी है. इसकी एक वजह तो यह है कि पिचें बल्लेबाजों के ज्यादा अनुकूल हो जाने से बल्लेबाजों को मुश्किल परिस्थितियों में खेलने का अभ्यास नहीं रहता. दूसरेबल्लेबाजों की मानसिकता भी बदली है. सीमित ओवरों के खेल की वजह से टेस्ट क्रिकेट में भी तेजी से रन बनाने की मानसिकता बढ़ी है. इससे होता यह है कि बल्लेबाज हर गेंद को धकेलने की कोशिश करता है. क्रिकेट की तकनीक यह कहती है कि रक्षात्मक शॉट ऐसा हो कि गेंद गीले स्पंज की तरह  बल्ले के सामने गिर जाए. अगर गेंद मूव हो रही हैचाहे स्पिन या स्विंग या सीमशुद्ध रक्षात्मक शॉट ही बाहरी किनारा लगने से बचाव का तरीका है. सर डोनाल्ड ब्रैडमैन कहते थे कि "डेड डिफेंसिव" बल्ले से बाहरी किनारा लगकर कैच उठना नामुमकिन है. ऐसा रक्षात्मक खेल अब देखने में नहीं आता.

वॉर्नर ने दिखाई थी मजबूत बुनियाद

बहुत से बल्लेबाज हैं जो चाहे तो मजबूती से बचाव कर सकते हैंलेकिन जब तक उन्हें यह समझ में आता है तब तक किला ढह चुका होता है. पिछले दिनों बांग्लादेश के खिलाफ दूसरे टेस्ट मैच में डेविड वॉर्नर ने स्पिन के खिलाफ जो शतक लगाया उससे समझ में आता है कि उनकी बुनियाद कितनी मजबूत है. धुआंधार बल्लेबाजी के लिए मशहूर वॉर्नर ने एकदम सुनील गावस्कर की शैली में यह इनिंग खेली थी.

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ठोस तकनीक है बचाव का सबसे अच्छा तरीका  

साद बिन जंग ने कुछ साल पहले इस मुद्दे पर एक बहुत अच्छा लेख लिखा था. साद बिन जंग बहुत प्रतिभाशाली क्रिकेटर थे जो हैदराबाद और हरियाणा से रणजी ट्रॉफ़ी खेले थे. कुछ वजहों से वह बहुत ज्यादा नहीं खेले और उनका प्रदर्शन भी उतना अच्छा नहीं रहालेकिन उनके समकालीन क्रिकेटर उन्हें काफी आला दर्जे का खिलाड़ी मानते थे. इन दिनों वह कभी-कभार क्रिकेट पर लिखते हैं और बहुत अच्छा लिखते हैं. उनका कहना चूंकि आजकल खिलाड़ी शुरू से ही हेलमेट पहनकर खेलते हैं इसलिए उनकी रक्षात्मक तकनीक खराब हो जाती है. बचाव का सबसे अच्छा तरीका अच्छी तकनीक है  और खिलाड़ी शुरू से ही अगर अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो तो वह तकनीक के प्रति लापरवाह हो जाता है, खासकर बैकफुट पर उसका खेल खराब हो जाता है.

जिन दिनों हेलमेट नहीं होते थेपिच कवर नहीं की जाती थीं और तेज गेंदबाजी पर नियंत्रण भी कम थे तब बल्लेबाज अच्छी तकनीक से ही अपनी रक्षा कर सकते थे. जंग ने इस बात को विस्तार से लिखा है जिसे मूल में  पढ़ा जाना चाहिए. उनका दूसरा तर्क यह है कि भारी बल्लों की वजह से बल्लेबाज गेंद की हरकत के मुताबिक आख़िरी मौके पर बल्ले को एडजस्ट नहीं कर पातेइसकी वजह से भी वे स्विंग या स्पिन से मात खा जाते हैं. उन्होंने राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण का उदाहरण दिया जो उनके मुताबिक स्विंग या स्पिन के खिलाफ बेहतरीन बल्लेबाज थे. जंग कहते हैं कि दोनों ही किशोरावस्था में बिना हेलमेट के खेलते थे और दोनों ही हल्के बल्ले इस्तेमाल करते थे.

इस मायने में स्पिन और स्विंग आक्रमण पर आधारित भारतीय टीम की रणनीति सिर्फ़ घरेलू परिस्थितियों का फ़ायदा उठाने तक सीमित  नहीं है, बल्कि शायद भारत की कामयाबी का बड़ा कारण समकालीन बल्लेबाजों की यह कमजोरी भी है. हालांकि इस बात की असली जांच विदेशी दौरों पर ही होगी, लेकिन लगता है कि क्रिकेट के भविष्य में गेंदबाज का असली अस्त्र अब गेंद का घुमाव ही होगा.

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