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संडे स्पेशल: ... जब भारत में विकेटकीपरों को ओपनिंग करने के लिए धकेला जाता रहा

एक कामचलाऊ ओपनर से की थी भारत ने अपने टेस्ट इतिहास की शुरुआत और यह सिलसिला आगे भी जारी रहा

Rajendra Dhodapkar Updated On: Oct 15, 2017 12:29 PM IST

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संडे स्पेशल:   ... जब भारत में विकेटकीपरों को ओपनिंग करने के लिए धकेला जाता रहा

25 जून 1932 को ऐतिहासिक लॉर्ड्स मैदान में कर्नल सी. के. नायडू के नेतृत्व में भारत ने इंग्लैंड के ख़िलाफ अपना पहला टेस्ट मैच खेला. जनार्दन नवले ने इस पहले टेस्ट मैच की पहली गेंद जो संभवत: बिल बोव्ज ने फेंकी थी, उसका सामना किया. जनार्दन नवले बहुत अच्छे विकेटकीपर थे, सर नेविल कार्ड्स उनकी विकेटकीपिंग से बहुत प्रभावित हुए थे और सर जैक हॉब्स ने तो उनकी तुलना महान विकेटकीपर जॉर्ज डकवर्थ और बर्ट ओल्डफील्ड से की थी.

लेकिन भारतीय क्रिकेट में चयन प्रक्रिया हमेशा रहस्यमय रही है, नवले सिर्फ एक टेस्ट मैच और खेल पाए. दूसरा मुद्दा यह है कि नवले कोई ओपनिंग बल्लेबाज नहीं थे, उनकी बल्लेबाजी यूं भी कुछ खास नहीं थी. इसका अर्थ यह है कि भारत ने अपने टेस्ट इतिहास की शुरुआत एक कामचलाऊ ओपनर से की थी और यह सिलसिला आगे भी जारी रहा.

नवले की जगह आए दिलावर हुसैन भी अच्छे विकेटकीपर थे और वह बल्लेबाज भी अच्छे थे. उन्होंने अपने पहले ही टेस्ट मैच की दोनों इनिंग में पचास रन बनाए, वह कुल तीन टेस्ट मैच ही खेले. लेकिन उनका बल्लेबाजी औसत 42 से कुछ ज्यादा है, जो कि उनकी बल्लेबाजी के स्तर का गवाह है.

लेकिन यहां मुद्दा यह है कि इंग्लैंड के ख़िलाफ अपने पहले टेस्ट मैच की पहली इनिंग में उन्हें भी सैयद मुश्ताक अली के साथ ओपनिंग करने भेजा गया. कोलकाता की हरी पिच पर पहले उनके सिर पर विली वोज़ की गेंद लगी और उन्हें रिटायर होना पड़ा. वह फिर लौट कर आए और उनके अंगूठे पर गेंद लगी और उन्हें फिर लौटना पड़ा. यह मैच के दूसरे दिन के आखिरी सत्र में हुआ. तीसरे दिन वह सुबह लौटे और उन्होंने कुल 59 रन बनाए जो भारतीय इनिंग का सर्वोच्च स्कोर था. भारत को फॉलोऑन मिला और दूसरी इनिंग में दिलावर हुसैन सातवें नंबर पर बल्लेबाजी करने आए. उन्होंने इस इनिंग में 57 रन बनाए.

मूलत: ओपनिंग बल्लेबाज नहीं थे कुंदरन और इंजीनियर

ये दोनों ही ऐसे भारतीय विकेटकीपर नहीं हैं जिन्हें ओपनिंग बल्लेबाजी करनी पड़ी है. भारत में ऐसे विकेटकीपरों की तादाद काफी होगी. विकेटकीपरों में बुधी कुंदरन और फारूख इंजीनियर ने भारत के लिए सबसे ज्यादा ओपनिंग की, लेकिन दोनों ही मूलत: ओपनिंग बल्लेबाज नहीं थे. बाद में जब भारत के लिए दूसरे ओपनिंग बल्लेबाज उपलब्ध हो गए तो इंजीनियर निचले क्रम में बल्लेबाजी करने लगे.

विकेटकीपर के लिए ओपनिंग करना कोई अच्छी बात नहीं है. विकेटकीपिंग अपने आप में बहुत थका देने वाला काम है. उसके तुरंत बाद बल्लेबाजी के पैड पहनकर बल्लेबाजी करना आसान नहीं है. इसलिए टेस्ट मैचों में विकेटकीपर आमतौर पर निचले क्रम में बल्लेबाजी करते हैं ताकि उन्हें थोड़ा आराम मिल जाए. सीमित ओवरों की बात अलग है, उसमें विकेटकीपिंग भी सीमित ओवरों तक ही होती है. फिर भारत में विकेटकीपरों को ओपनिंग बल्लेबाजी के लिए क्यों धकेला जाता रहा.

कुछ वक्त पिच पर बिताने के इरादे से भेजा जाता था

इसकी मुख्य वजह यह रही कि भारत में ओपनिंग बल्लेबाज या तो कम रहे या चयनकर्ताओं को उन पर भरोसा नहीं रहा. भारत में चयन में क्षेत्रीय राजनीति भी अक्सर हावी हो जाती थी और यह होता था कि सारे ही बल्लेबाज मध्यक्रम के होते थे या एक ही विशेषज्ञ ओपनिंग बल्लेबाज टीम में होता था. ऐसे में किसी को बलि का बकरा बनाया जाता था, चूंकि किसी विशेषज्ञ बल्लेबाज को बलि का बकरा बनाने में नुकसान होगा, इसलिए विकेटकीपर को इस उम्मीद में ओपनिंग करने भेज दिया जाता था कि वह कुछ वक्त पिच पर बिता कर नई गेंद की चमक कुछ कम कर देगा.

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तेज गेंदबाजी के खिलाफ कमजोरी भी थी वजह

भारत में ओपनिंग करने को बलि का बकरा बनाने जैसा इसलिए माना जाता था, क्योंकि सुनील गावस्कर और मोहिंदर अमरनाथ के दौर के पहले भारतीय बल्लेबाजी को तेज गेंदबाजी के ख़िलाफ कमजोर माना जाता था. चूंकि भारत में तेज गेंदबाज भी कम होते थे और पिचें भी स्पिन गेंदबाजी के अनुकूल ही बनाई जाती थीं इसलिए भारतीय बल्लेबाजों को तेज गेंदबाजी खेलने का अभ्यास भी नहीं होता था. इससे विदेशी मैदानों पर तो भारत का प्रदर्शन खराब होता ही था, विदेशी तेज गेंदबाज भारत में भी भारतीय टीम को हिलाकर रख देते थे.

टीम की राजनीति भी तय करती थी क्रम

अगर विकेटकीपर से काम नहीं चलता था तो जैसा कि दिलीप सरदेसाई ने कहा था कि टीम की राजनीति के मुताबिक जो कमजोर हैसियत का बल्लेबाज होता था उसे ओपनिंग करने भेज दिया जाता था. सरदेसाई को यह शिकायत थी कि टीम के सितारा खिलाड़ी चूंकि बलि का बकरा बनने को तैयार नहीं थे इसलिए यह जिम्मा उनके सिर पर आ जाता था, हालांकि वह ओपनर बल्लेबाज नहीं थे. ओपनर की तरह सरदेसाई का रिकॉर्ड बुरा नहीं है, लेकिन बतौर ओपनर और बतौर मध्यक्रम के बल्लेबाज उनके रिकॉर्ड में बड़ा फर्क है. उनका यह कहना जायज है कि अगर वह सिर्फ मध्यक्रम में ही खेलते तो उनके आंकड़े बहुत अच्छे होते.

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ओपनर बनने से गड़बड़ा गया कइयों का करियर

कई बल्लेबाज हैं जिनका करियर ओपनर बनने से गड़बड़ा गया. अशोक मांकड मुंबई के मध्यक्रम के सबसे मजबूत बल्लेबाज कई वर्षों तक थे, लेकिन उन्हें भारतीय टीम में जगह मिली ओपनिंग बल्लेबाज की तरह. 1969 में ऑस्ट्रेलिया के भारत दौरे पर अपनी दूसरी सीरीज में और वेस्टइंडीज के 1971 के दौरे पर उन्होंने कुछ अच्छे स्कोर भी बनाए, लेकिन जल्दी ही तेज गेंदबाजों ने ऑफ स्टंप के बाहर स्विंग होती गेंदों पर उनकी कमजोरी को भांप लिया और वह असफल होने लगे.

काफी वक्त बाद मध्यक्रम के बल्लेबाज की तरह अशोक मांकड की वापसी हुई, लेकिन उन्हें कायदे के मौके नहीं मिले और वह नाकामयाब होते गए. इसी तरह टेस्ट टीम से बाहर होने के पहले एकनाथ सोलकर भी ओपनिंग कर चुके थे. रवि शास्त्री भी नंबर ग्यारह से नंबर एक तक बल्लेबाजी करने वाले बल्लेबाज बन गए थे. कई बार मध्यक्रम में नाकाम होने के बाद बल्लेबाजों ने ओपनिंग बल्लेबाज की तरह वापसी की कोशिश की, जैसे संजय मांजरेकर ने.

द्रविड़ और लक्ष्मण ने भी बहुत बार की ओपनिंग

एकाध बार बलि का बकरा बनने का श्रेय किसी नए बल्लेबाज को नहीं, बल्कि ऐसे वरिष्ठ बल्लेबाज को मिला जो टीम की खातिर कुर्बानी देने को तैयार था. 2004 के पाकिस्तान दौरे पर जब सौरव गांगुली ने ओपनिंग बल्लेबाज आकाश चोपड़ा को हटाकर युवराज सिंह को लिया तो लोगों ने सोचा कि युवराज शायद ओपन करें, लेकिन ओपनिंग कर वाई गई राहुल द्रविड़ से. हालांकि द्रविड़ ने वीरेंद्र सहवाग के साथ पहले विकेट की साझेदारी का पंकज रॉय और वीनू मांकड का विश्व रिकॉर्ड लगभग तोड़ दिया था, लेकिन ओपनिंग करना उन्हें पसंद नहीं था. हां, और विश्वरिकॉर्ड बनाने वाले वीनू मांकड भी ओपनर नहीं थे. वीवीएस लक्ष्मण ने भी बहुत बार ओपनिंग की, जो उन्हें कतई नापसंद था.

KOLKATA, INDIA - NOVEMBER 14: Indian batsmen Rahul Dravid and VVS Laxman running between the wickets in course of their partnership during the first day of second Test match between India and West Indies at Eden Gardens stadium on November 14, 2011 in Kolkata, India. (Photo by Subhendu Ghosh/Hindustan Times via Getty Images)

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बहुत मुश्किल से मिलती है अच्छी ओपनिंग जोड़ी

ऐसा नहीं है कि यह भारत की ही समस्या है. अच्छी ओपनिंग जोड़ी बहुत मुश्किल से मिलती है, इसलिए दुनिया भर की टीमें कभी न कभी ऐसे प्रयोग करने पर मजबूर हो जाती हैं. वॉरेल और सोबर्स की दिग्विजय टीम में यही एक कमी थी, उन्हें कॉनराड हंट के साथ स्थायी पार्टनर कभी नहीं मिला. अब हम समझ सकते हैं कि विराट कोहली का कितना बड़ा सौभाग्य है कि उन्हें ओपनिंग बल्लेबाज के तौर पर चुनने के लिए बाकायदा विकल्प मिले हुए हैं.

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