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टीम इंडिया के खर्चीले ड्रेसिंग रूम में क्या है एक ‘गुजराती बनिए’ का काम

चेतेश्वर पुजारा की धीमी बल्लेबाजी से भी टीम इंडिया को फायदा

Jasvinder Sidhu Updated On: Jul 27, 2017 02:22 PM IST

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टीम इंडिया के खर्चीले ड्रेसिंग रूम में क्या है एक ‘गुजराती बनिए’ का काम

कहा जाता है कि जिंदगी के किसी भी मुकाम में कामयाबी का रास्ता इसी बात से तय होता है कि कोई अपने श्रेष्ठ प्रदर्शन को एक और कदम आगे कैसे ले जाता है. जिन लोगों को अंदाजा नहीं है कि ऐसे कैसे किया जा सकता है, वे चेतेश्वर पुजारा की बल्लेबाजी से सीख सकते हैं.

तड़क-भड़क और अमीर खिलाड़ियों से भरे ड्रेसिंग रूम में पुजारा एक ऐसे बनिए की तरह हैं जो हर मैच में एक-एक रन जोड़ कर सौ तक पहुंचने के हामी हैं. और सौ रन होने के बाद वह 150 को अपनी मंजिल की तरह देखने लगते हैं. वहां पहुंचने के बाद उन्हें दोहरा शतक दिखाई देने लगता है.

अक्तूबर 2010 में बंगलुरु में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहला टेस्ट खेलने के बाद से पुजारा गॉल टेस्ट मैच की 153 की पारी को मिला कर 12 शतक बना चुके हैं. इनमें से तीन में वह 150 से ऊपर रन बना कर आउट हुए और और तीन में स्कोर बोर्ड पर उनके नाम के आगे 200 का स्कोर था.

पुजारा ऐसे खिलाड़ी है जो मौके को भुनाने में अपना सब कुछ झोंक देते हैं. 2014 में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर नाकामी के बाद तकनीक पर सवाल उठने शुरू हो गए थे. आठ टेस्ट मैच की 16 पारियों में उनके सिर्फ 423 रन थे. लगा कि उनका कैरियर खत्म हो गया है.

लेकिन एक साल बाद श्रीलंका के दौरे पर ही कोलंबो में बतौर ओपनर उतरे पुजारा पहली पारी में दूसरे छोर पर विकेट गिरने के सिलसिले के बावजूद खुद को संभालने में कामयाब रहे. एक समय भारतीय टीम के टॉप-5 बैट्समैन 119 के स्कोर पर ड़्रेसिंगरूम में बैठे थे. लेकिन पुजारा बेहद मुश्किल पिच पर 289 गेंदों की लंबी पारी खेल कर 145 रन बना गए. टीम ने पहली पारी 312 पर खत्म की और जब मैच खत्म हुआ तो जीत का जश्न भारतीय ड्रेसिंग रूम में था.

गॉल में भी जब वह अभिनव मुंकुद के आउट होने के बाद आठवें ओवर में बल्लेबाजी करने आए तो शिखर धवन श्रीलंकाई गेंदबाजों को मैदान के हर कोने में दौड़ा रहे थे. उन्होंने मेजबानों को गेंदबाजी को साधारण कर दिया था. लेकिन पुजारा को इससे कोई मतलब नहीं था और वह कदम-दर-कदम और हालात के अनुसार सही फैसला लेने वाले समझदार इन्सान की तरह अपनी बल्लेबाजी कर गए.

गॉल में एक शॉट को छोड़कर वह पूरी पारी में बेहद नियंत्रण में थे और उन्होंने बॉलर्स के लिए कोई भी गुंजाइश नहीं छोड़ी. मई में इस लेखक को दिए इंटरव्यू में पुजारा ने कहा था, “लंबी पारियां खेलना मेरी बचपन की आदत है. स्कूल के दिनों से मैं देर तक पिच पर खेलने की कोशिश करता आया हूं. पचास रन पार करने के बाद मेरी कोशिश सौ तक पहुंचने की होती है और फिर मैं सोचता हूं कि मैं 50 रन और बना सकता हूं. मेरे जहन में यही रहता है कि मैं अपनी इस पारी को और बड़ा कैसे करूं.”

पुजारा के बारे में बात उनके कैरियर के पहले मैच के बिना खत्म नहीं हो सकती. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ नंबर पांच पर बल्लेबाजी करने आए पुजारा को मिचेल जॉनसन के 4 रन पर पगबाधा कर दिया. दूसरी पारी में उनसे सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ से ऊपर नंबर दो पर खेलने के लिए कहा गया. पुजारा ने वह चैलेंज स्वीकार किया और 72 रन की पारी खेल गए.

यही पुजारा की नियंत्रित और संतुलित बल्लेबाजी का सार है. वैसे भी वह गुजरात के आते हैं जहां के लोगों के बारे में कहा जाता है कि वे कंजूस होते हैं. लेकिन यहां पुजारा की एक-एक रन की कंजूसी टीम इंडिया के काम आ रही है. ऐसे में लगता नहीं कि उन्हें कंजूस या बनिया कहने पर किसी को ऐतराज होगा.

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