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क्रिकेट अब नहीं रहा 'गुलामों का खेल'

कई मायनों में खास है अफगानिस्तान की यह कामयाबी

Sumit Kumar Dubey Sumit Kumar Dubey | Published On: Jun 23, 2017 03:25 PM IST | Updated On: Jun 23, 2017 04:09 PM IST

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क्रिकेट अब नहीं रहा 'गुलामों का खेल'

आमतौर पर दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन यानी गूगल पर अगर अफगानिस्तान लिखा जाए जो आपको बम धमाकों, हत्याओं, आतंकवादी हमलों और इस मुल्क में शांति के प्रयासों जैसी खबरों के सैकड़ों पन्ने पलक झपकते ही खुल जाएंगे. लेकिन 23 जून की सुबह इससे अलग थी. इस सुबह अगर आप अफगानिस्तान के बार में सर्च करने गए होंगे तो सबसे पहले आपको अफगानिस्तान की क्रिकेट टीम को टेस्ट टीम का दर्जा मिलने की खबर मिली होगी.

कई दशकों से लगातार युद्ध की विभीषिका झेल रहे अफगानिस्तान के लिए यह वाकई बड़ी कामयाबी है. इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल यानी आईसीसी ने आयरलैंड के साथ अफगानिस्तान को भी टेस्ट क्रिकेट टीम का दर्जा देकर अफगान क्रिकेटरों के उस जज्बे पर मोहर लगा दी है जो बीते कई सालों से इंटरनेशनल स्तर पर दिखाई दे रहा ह

अफगानिस्तान में क्रिकेट नहीं है अंग्रेजों की विरासत

इससे पहले 17 साल पहले यानी साल 2000 में आईसीसी बांग्लादेश को टेस्ट टीम का दर्जा दिया था. टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले देशों के क्लब में अफगानिस्तान की एक मायने में बेहद खास है. आईसीसी के पूर्णकालिक सदस्यों यानी टेस्ट खेलने वाले देशों के बीच अब अफगानिस्तान इकलौती ऐसी टीम होगी जिनका मुल्क कभी ब्रिटिश राज के अधीन नहीं रहा.

इंग्लैंड में पैदा हुए खेल क्रिकेट को कई मायनों में औपनिवेशिक दौर का प्रतीक भी माना जाता है. टेस्ट खेलने वाले सभी मुल्क, कभी ना कभी ब्रिटेन के गुलाम रहे हैं. लेकिन अफगानिस्तान अब टेस्ट खेलने वाली ऐसी अकेली टीम होगी जहां का क्रिकेट कभी इंग्लिश खिलाड़ियों की विरासत नहीं रहा. लिहाजा टेस्ट क्रिकेट में अफगानिस्तान की एंट्री इस खेल को सही मायनों में ग्लोबल भी बनाती है.

जंग का साथ-साथ आगे बढ़ी क्रिकेट की दास्तान

अफगानिस्तान में क्रिकेट की कामयाबी की दास्तान सपनों सरीखी है. दरअसल इस मुल्क में क्रिकेट की कहानी उसके आंतरिक झगड़ों से ही जुड़ी हुई है. ज्यों-ज्यों अफगानिस्तान में भीतर के आपसी झगड़े बढ़ते गिए त्यों-त्यों अफगानिस्तान में क्रिकेट भी बढ़ता गया. साल 1979 में अफगानिस्तान पर तत्कालीन सोवियत यूनियन के कब्जे के बाद बड़ी संख्या में अफगान शरणार्थी पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में पहुंचे. पाकिस्तान पर यह आरोप लगता रहता है कि उसने इन शरणार्थियों के जरिए ही तालिबान को पैदा किया. लेकिन पाकिस्तान में इन्हीं शरणार्थियों से बीच, क्रिकेट के खेल ने भी जगह बना ली. हो सकता है कि इनमें से कई हाथों ने एके 47 थाम ली हों, लेकिन कुछ हाथों ने गेंद और बल्ले को भी थामा. हालात थोड़े सामान्य होने के बाद जब ये लोग अपने मुल्क वापस लौटे तो अपने साथ क्रिकेट के इस खेल को भी ले गए.

सोवियत यूनियन के अफगानिस्तान से वापस लौटने के बाद भी मुल्क के हालात नही बदले. जंग होती रही. तालिबान आए और चले गए..लेकिन मुल्क की अवाम के बीच क्रिकेट का खेल अपनी जड़ें मजबूत करता चला गया. अफगानिस्तान में इस खेल की लोकप्रियता आलम यह है कि हर तरह के मनोरंजन के खिलाफ रहने वाले तालिबान भी इस खेल के जादू से अछूते नहीं हैं.

ऐसा नहीं है कि आईसीसी ने अफगानिस्तान को टेस्ट टीम का दर्जा इस मुल्क के हालात को देख कर दिया हो. खेल के मैदान पर अफगान क्रिकेटरों ने ऐसे कई मुकाम हासिल किए हैं जो उन्हें इस दर्जे के काबिल बनाते हैं.

मैदान पर कई बार गाढ़े हैं कामयाबी के झंडे

1995 में अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड के बनने के बाद 2001 में यह टीम आईसीसी की एसोसिएट सदस्य बनी. तब से यह टीम लगातार अच्छा खेल रही है, यहां तक कि टेस्ट टीम के दर्जे वाली जिम्बाब्वे के खिलाफ वनडे क्रिकेट में यह 11-8 से आगे हैं. बांग्लादेश के साथ खेल पांच वनडे मैचों में से अफगानिस्तान ने 2 मुकाबले जीते हैं. अफगानिस्तान के पास राशिद खान जैसे खिलाड़ी भी है जो अपनी फिरकी की दम पर दुनिया के किसी बल्लेबाजी ऑर्डर को मुश्किल में डाल सकते हैं.

अफगान क्रिकेटरों इस कामयाबी गूंज, उनके मुल्क में बम, बंदूकों और तोपों की उन आवाजों से ज्यादा भारी है. अफगानिस्तान की सरकार को भी अपने मुल्क में क्रिकेट की ताकत और संभावनाओं का अहसास है. तभी तो पिछले दिनों अफगान सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए उसके साथ सीरीज खेलने से इनकार कर दिया था. यानी अफगानिस्तान में क्रिकेट अब खेल के साथ साथ कूटनीतिक औजार भी बन चुका है.

ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि टेस्ट टीम का दर्जा मिलने के बाद यह खेल, सालों से आपस में लड़ रहे इस मुल्क को एक होने की वजह जरूर बन जाएगा.

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