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संडे स्पेशल: क्यों खो गया कैरिबियन कैलिप्सो का जादू

वेस्टइंडीज का कमजोर होना क्रिकेट का बहुत बड़ा नुकसान है

Rajendra Dhodapkar Updated On: May 28, 2017 10:17 AM IST

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संडे स्पेशल: क्यों खो गया कैरिबियन कैलिप्सो का जादू

क्रिकेट में पिछले दिनों जो सबसे बुरी बात हुई है वह वेस्टइंडीज़ और पाकिस्तान के क्रिकेट का पतन है. क्रिकेट वैसे ही कम देश खेलते हैं. उसमें भी दो देशों में खेल की दुर्दशा हो जाए, तो इससे बुरा क्या हो सकता है. ये दोनों टीमें जितना अनोखा और अपने अंदाज का क्रिकेट खेलती थीं, उसकी कमी खलती है. पाकिस्तान में तो शायद अब भी प्रतिभा की कमी नहीं है. लेकिन वहां क्रिकेट की नहीं, सारे देश की व्यवस्था ऐसी बरबाद हो गई है कि प्रतिभा को निखारने और उसे जरूरी सहारा देने वाला तंत्र ही नहीं है. क्रिकेट प्रशासन बहुत अच्छा वेस्टइंडीज़ में भी नहीं है. लेकिन अब ऐसा लगता है कि जिन छोटों छोटे द्वीपों से असाधारण क्रिकेटर बड़ी तादाद में निकलते थे, वहां क्रिकेट में प्रतिभाओं का सूखा पड़ गया है.

वॉरेल की कप्तानी से शुरू हुआ दबदबा

वेस्टइंडीज़ का दबदबा लगभग सन 1960 में सर फ्रैंक वॉरेल के कप्तान बनने के साथ शुरू हुआ. वॉरेल वेस्टइंडीज के पहले काले कप्तान थे, इसके पहले वेस्टइंडीज़ मे सिर्फ गोरे ही कप्तान होते थे. वॉरेल को कप्तान बनाने के लिए वेस्टइंडीज़ द्वीप समूहों में बहुत बड़ा आंदोलन हुआ था. वॉरेल सन 1961 के आस्ट्रेलिया दौरे पर पहली बार कप्तान बनाए गए. यह दौरा क्रिकेट इतिहास के पहले ‘टाई’ टेस्ट के लिए याद किया जाता है. और इस बात के लिए भी कि वॉरेल ने विभिन्न द्वीपों और देशों से आए प्रतिभाशाली खिलाडियों को एक साथ एक टीम की तरह खेलना सिखाया.

इसके साथ लगभग तीस साल तक चलने वाले वेस्टइंडीज़ के राज की शुरुआत हुई. वॉरेल और उनकी टीम मैदान में और मैदान के बाहर अपने व्यवहार से इतनी लोकप्रिय हुई कि जब वे लोग दौरा पूरा करने के बाद लौटे तो मेलबर्न में लाखों लोग उन्हें विदाई  देने के लिए सड़कों पर निकल आए. किसी क्रिकेट टीम को पराए देश में ऐसी विदाई कभी नहीं मिली.

उपनिवेशवादियों का तर्क होता है कि जिन लोगों को उन्होंने गुलाम बनाया है, वे खुद अपना नेतृत्व करने के काबिल नहीं हैं. इसी वजह से वे नेतृत्व करने और राज करने के लिए ‘मजबूर’ हैं. वेस्टइंडीज़ द्वीप समूहों को आजादी साठ के दशक में मिली. उससे कुछ वक्त पहले एक काले खिलाड़ी को कप्तान बनाने का यह आंदोलन एक मायने में अपनी आजादी और बराबरी के लिए किए जा रहे संघर्ष का एक बडा पड़ाव था.

वेस्टइंडीज के लिए क्रिकेट महज खेल नहीं था

यह स्वाभाविक भी था कि क्रिकेट टीम की कप्तानी वेस्टइंडीज़ के लोगों के लिए इतना बड़ा मुद्दा था. क्रिकेट वेस्टइंडीज़ में उन दिनों एक खेल भर नहीं था. वह उनकी पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक था. काले लोग क्रिकेट को अपनी बराबरी की कसौटी मानते थे. हम कहते हैं कि भारत में क्रिकेट एक धर्म की तरह है. लेकिन यह धर्म वैसा ही है जैसे लाउडस्पीकर लगा कर जागरण करने, गाहेबगाहे सड़कों पर शोभायात्रा निकालने और संपत्ति का प्रदर्शन करने को आजकल धार्मिकता मान लिया गया है.

गयाना के एक लेखक ने लिखा है कि कैसे बचपन में उसके साथी रोहन कन्हाई की तस्वीरों को अखबारों से काट कर देवी देवताओं की तस्वीरों के बीच में चिपका देते थे. बीसवीं शताब्दी की शुरुआत से गोरों के सिखाए हुए इस खेल में जो कुछ उनसे सीखा है, उसमें महारत हासिल करने के बाद उनसे आगे बढ़ जाना कायम करना वेस्टइंडीज़ के काले लोगों की पहचान और आत्मविश्वास का प्रतीक था. इसीलिए वेस्टइंडीज के खिलाड़ी अपनी स्वाभाविक प्रतिभा और अलग पहचान के साथ क्रिकेट की बारीकियों और तकनीक के भी उस्ताद होते थे. इस विषय पर  सीएलआर जेम्स ने अद्भुत लेखन किया है,

इसीलिए इंग्लैंड के साथ वेस्टइंडीज़ का रिश्ता काफी जटिल रहा. शुरुआती दशकों में वे महान अंग्रेज खिलाड़ियों से प्रभावित भी हुए. लेकिन उनसे आगे निकलने की इच्छा भी उनके मन में रही. जब वे उनसे आगे निकल गए तो फिर उन्हें हराना वेस्टइंडीज़ के खिलाड़ियों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया. जिन लोगों को क्लाइव लॉयड और विवियन रिचर्ड्स की कप्तानी का दौर याद है, उन्हें यह भी याद होगा कि वेस्टइंडीज़ की दुनिया रौंदने वाली टीम के विशेष रूप से शिकार अंग्रेज हुए.

वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज वैसे तो सभी के लिए कहर थे लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ उनकी रफ्तार थोड़ी और बढ़ जाती थी. वेस्टइंडीज़ ने उस दौर में अंग्रेजों को इस कदर रौंदा कि इंग्लिश क्रिकेट को संभलने में लगभग दो दशक लग गए. विवियन रिचर्ड्स खासतौर पर राजनैतिक रूप से सजग और काले लोगों के अधिकारों के प्रवक्ता थे.

21st August 1963: Frank Worrell (1924 - 1967), captain of the West Indies cricket team pictured overseeing the final touches to his Madame Tussaud's waxwork figure. (Photo by Ron Case/Keystone/Getty Images)

मैडम तुसाद म्यूजियम में फ्रैंक वॉरेल.

जो शुरुआत सर फ्रैंक वॉरेल के नेतृत्व में हुई, उसे रफ़्तार अगले एक दशक में हुई राजनैतिक आज़ादी ने दी. लेकिन सन अस्सी आते आते एक ऐसी पीढ़ी द्वीप समूहों में जवान होने लगी जिसके पास गुलामी की कोई यादें नहीं थी. इस वजह से युवाओं का ग्रेट ब्रिटेन के साथ भी कोई विशेष रिश्ता नहीं रहा. स्वाभाविक रूप उनका जुड़ाव पड़ोस में संयुक्त राज्य अमेरिका से ज्यादा हो गया. सांस्कृतिक रूप से भी वह अमेरिका के ज़्यादा करीब थे. ऐसे में क्रिकेट से भी उसका जुड़ाव वैसा नहीं रहा जैसा पिछली पीढ़ियों का था.

क्रिकेट में अगला दौर भारतीय उपमहाद्वीप का था. यह अच्छी बात है. वेस्टइंडीज़ द्वीप समूहों को आजादी मिली. यह भी बहुत अच्छा हुआ. लेकिन इससे क्रिकेट का नुकसान हो गया.

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