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स्मार्टफोन के बाजार की जंग में बीसीसीआई को मालामाल कर रहीं चीनी कंपनियां

रिकॉर्डतोड़ रकम के साथ हुआ चीनी कंपनी से बोर्ड का करार

Sumit Kumar Dubey Sumit Kumar Dubey | Published On: Jun 28, 2017 05:55 PM IST | Updated On: Jun 28, 2017 05:55 PM IST

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स्मार्टफोन के बाजार की जंग में बीसीसीआई को मालामाल कर रहीं चीनी कंपनियां

पूरी दुनिया में चीनियों को बेहद चतुर व्यापारी माना जाता है. और इसकी नजीर अब भारत में भी देखने को मिल रही है. चीनी मोबाइल कंपनी विवो ने खेलों की दुनिया की सबसे बड़ी लीगों में एक बीसीसीआई की आईपीएल की टाइटल स्पॉसरशिप के लिए रिकॉर्ड तोड़ रकम में करार किया है. बोर्ड के साथ हुई पांच साल की इस डील ने आईपीएल को दुनिया की सबसे महंगी टाइटल स्पॉसरशिप डील माना जा रहा है.

अगले पांच साल यानी 2018 से 2022 तक आईपीएल की टाइटल स्पॉसरशिप के लिए विवो  इलैक्ट्रॉनिक्स कॉर्प, बीसीसीआई को 2,199 करोड़ रुपए देगी. यानी हर साल लगभग 440 करोड़ रुपए. यह रकम दुनिया की सबसे बड़ी स्पोर्ट्स लीग यानी इंग्लिश प्रीमियर लीग की टाइटल स्पॉन्सरशिप डील से भी ज्यादा है. ईपीएल को 2013 से 2016 के बीच बार्कलेस ने हर साल 330 करोड़ रुपए दिए थे.

95 करोड़ से 440 करोड़ प्रति वर्ष तक

आईपीएल की इस सबसे महंगी डील ने बीसीसीआई को तो मालामाल कर दिया है. चीनी कंपनी के साथ बोर्ड की यह डील आईपीएल की पिछली सभी टाइटल स्पॉन्सरशिप डील से बहुत आगे हैं. साल 2015 में पेप्सिको ने इस डील को जब बीच में ही छोड़ा था उस वक्त यह करार 100 करोड़ रुपए प्रति वर्ष से भी कम का था. विवो ने उसे बाद बोर्ड से दो साल के लिए करार किया और उसके लिए करीब 95 करोड़ रुपए प्रति वर्ष का भुगतान किया.

अब जबकि विवो ने इस रकम से लगभग पांच गुना ज्यादा का करार किया है तो सवाल उठता है कि आखिर यह चीनी मोबाइल कंपनी ईपीएल में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रही है. आईपीएल में विवो की दिलचस्पी की वजह जानने से पहले आपको एक और आंकड़ा बताते हैं. विवो ने आईपीएल की टाइटल स्पॉसरशिप के लिए जिस प्रतिद्वंदी कंपनी को मात दी है वह भी चीनी मोबाइल कंपनी ही है.

विवो और ओप्पो के बीच थी जंग

दरअसल विवो के अलावा इस करार के लिए एक और चीनी मोबाइल कंपनी ओप्पो मोबाइल्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने भी दावेदारी पेश की थी. ओप्पो ने इस करार के लिए 1430 करोड़ रुपए की बोली लगाई थी. इनके अलावा एक और चीनी मोबाइल कंपनी जियोमी ने भी दावेदारी के दस्तावेज खरीदे थे.

भारतीय क्रिकेट के साथ जुड़ने की होड़ में ओप्पो और विवो के बीच कंपटीशन का यह कोई पहला वाकिया नहीं है. इससे पहले इसी साल टीम इंडिया की ऑफिशियल जर्सी की स्पॉन्सरशिप की जंग भी इन्ही दोनों कंपनियों के बीच हुई थी. स्टार इंडिया ने जब जर्सी की स्पॉन्सरशिप को छोड़ा तो इसे हासिल करने के लिए ओप्पो ने भी बड़ी बोली लगाई थी. ओप्पो ने पांच साल के लिए 1079 करोड़ रुपए की रकम के साथ इस डील को हासिल किया था. वहीं इस बोली में दूसरे नंबर पर विवो ही थी जिसने 768 करोड़ रुपए की बोली लगाई थी.

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यहां सबसे दिलचस्प बात यह है कि एक भारतीय क्रिकेट से जुड़ने की कोशिशों में जुटीं इन दोनों ही कंपनियों की पेरैंट कंपनी एक ही है जिसका नाम है बीबीके इलेक्ट्रॉनिक्स. इन दोनों मोबाइल कंपनियों के अलावा एक और मोबाइल कंपनी वन प्लस भी बीबीके इलैक्ट्रॉनिक्स की ही कंपनी है.

यानी साफ है कि चीन में क्रिकेट के खेल की लोकप्रियता बेहद निचले स्तर पर हो लेकिन भारत में धर्म का दर्जा पा चुके इस खेल के साथ जुड़ने के लिए चीनी मोबाइल कंपनियां कुछ भी कर गुजरने को तैयार है. और इसके पीछे की वजह है भारत में तेजी से बढ़ता स्मार्टफोन का बाजार.

हाल ही में इंटरनेट की 4जी सेवाओं की कीमतों में आई गिरावट के बाद भारत में स्मार्टफोन का मार्केट बहुत तेजी से बढा है. चीनी स्मार्ट फोन की कंपनियां इस मौके को पूरी तरह से भुनाना चाहती हैं.

50 फीसदी भारतीय बाजार पर चीनी स्मार्टफोन का कब्जा

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय स्मार्टफोन के मार्केट में चीनी कंपनियों का कब्जा 50 फीसदी से ज्यादा हो चुका है. जिसमें जियोमी , विवो और ओप्पो से ऊपर है. इस साल के पहले क्वार्टर में भारतीय मार्केट में विवो का 12 फीसदी और ओप्पो का 10 फीसदी ग्राहकों पर कब्जा है.

दो साल पहले आईपीएल की टाइटल स्पॉंसरशिप हासिल करने के बाद विवो के मार्केट में 10.5 फीसदी का इजाफा हुआ. यानी इन चीनी मोबाइल कंपनियों का पता है कि भारत में अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए क्रिकेट का साथ मिलना कितना जरूरी है.

यही वजह है कि बॉर्डर पर भले ही चीन अपने सैनिकों के जरिए भारत को आंखें दिखा रहा हो, भारतीय बाजार पर कब्जा करने के लिए चीनी कंपनियों को बीसीसीआई को भी मालामाल करना पड़ रहा है.

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