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आईपीएल की फिक्सिंग में बोर्ड हारा अरब रुपए की लड़ाई, लेकिन बेदाग निकले संदिग्ध फिक्सर

2013 के स्पॉट फिक्सिंग केस में अब तक बोर्ड के खजाने से करीब 128 करोड़ रुपए जा चुके हैं

Jasvinder Sidhu Updated On: Aug 19, 2017 09:43 AM IST

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आईपीएल की फिक्सिंग में बोर्ड हारा अरब रुपए की लड़ाई, लेकिन बेदाग निकले संदिग्ध फिक्सर

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की अदालत नंबर दो में बीसीसीआई के सिस्टम में जस्टिस आरएम लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए बनी प्रशासकों की कमेटी की ताजा स्टेट्स रिपोर्ट पर सुनवाई होनी थी. सुनवाई के लिए देश के सबसे महंगे वकीलों से भरे कोर्ट रूम में बीसीसीआई के अधिकारी भी थे. दर्शक दीर्घा में बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राहुल जौहरी के चेहरे पर चिंता देखी जा सकती थी, जो बोर्ड का एक खास काम छोड़ कर सुनवाई के लिए आए थे.

2013 में आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों एस श्रीसंत, अंकित चव्हाण और अजीत चंदीला के कथित रूप के चंद लाख रुपए में मैच बेच देने का आरोप लगा. पुलिस के दावे के साथ दस्तावेज भी थे लेकिन कोर्ट ने सब कुछ खारिज कर दिया.

उस स्पॉट फिक्सिंग की जांच के बाद से चले कई कोर्ट केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और तब से सुनवाई चालू हैं. ऐसे में एक सवाल जहन में आना लाजिमी है. इसलिए फर्स्टपोस्ट ने बीसीसीआई के एक अधिकारी से पूछ लिया.

‘आप तो केस को फॉलो कर रहे हैं. आप  ही अंदाजा लगाइए,’ सवाल करने के साथ ही उस अधिकारी ने काउंटर सवाल कर दिया. लेकिन थोड़ी परीक्षा लेने के बाद एक  अनुमानित फिगर देने को वह राजी हो गए.

बीसीसीआई के लेखे के बारे में जानकारी रखने के वाले इस अधिकारी के अनुसार 2013 के स्पॉट फिक्सिंग केस में अब तक बोर्ड के खजाने से करीब 128 करोड़ रुपए जा चुके हैं.

इसमें से करीब 100 करोड़ से भी अधिक बीसीसीआई के वकीलों की फीस है और बाकी का खर्चा सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त तीन जांच समितियों व अन्य मदों का बिल है.

सुप्रीम कोर्ट ने पहले हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट के रिटायर जज मुकुल मुदगल को इंडियन प्रीमियर लीग और भारतीय क्रिकेट बोर्ड में फैले भ्रष्टाचार का पता लगाने का जिम्मा दिया. उसके सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस  आरएम लोढ़ा को बीसीसीआई की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार व जवाबदेह बनाने के लिए सुझाव देने का काम दिया.

सिफारिशें मिलने के बाद कैग के पूर्व प्रमुख विनोद राय की अध्यक्षता में प्रशासकों की एक कमेटी बनाई गई जिसका काम लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू करवाना है.

साफ है कि अभी तक उन सिफारिशों को लागू करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है और इसे टालने के लिए बोर्ड पैसा फूंक रहा हैं.

बोर्ड के एक सीनियर अधिकारी कहते हैं, ‘आपका सवाल जायज है कि सौ करोड़ लगा कर भी बोर्ड यह लड़ाई लगभग हार चुका है. इस पूरे विवाद में किसी का फायदा हुआ है तो वे हैं बोर्ड के वकील. लेकिन हम क्या कर सकते हैं. हमारे पास आखिरी विकल्प खत्म होने तक कानूनी लड़ाई लड़ने के सिवा कोई चारा नहीं हैं.’

रोचक पहलू है कि इतना पैसा लगाने के बाद भी बोर्ड को लगातार नाकामी देखनी पड़ी है. बोर्ड की ओर से इस केस में देश का हर बड़ा नाम उसकी पैरवी कर चुका है लेकिन मिला क्या?

आईपीएल की दो टीमों पर दो साल का प्रतिबंध लगा, बीसीसीआई का सुरक्षित किला ढह गया, सुप्रीम कोर्ट ने उसे एक पब्लिक बॉडी करार दिया जिसके कारण उस पर सूचना के अधिकार की तलवार भी लटकी है, बोर्ड के अध्यक्ष और सचिव को तड़ीपार कर दिया गया, पाई-पाई के लिए कोर्ट के दरवाजे पर आना पड़ रहा है और अब बोर्ड के हर मठाधीश के बाहर होने का समय करीब है.

इस सबमें एस. श्रीसंत और अन्य को कोर्ट ने क्लीन चिट दे दी है. इस पूरे केस का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि बोर्ड में स्पॉट फिक्सिंग करने के आरोपियों के खिलाफ इतनी महंगी कानूनी लड़ाई के बारे में सोचा तक नहीं.

जिस समय एस. श्रीसंत पर फिक्सिंग के आरोप लगे, वह बोर्ड के करारशुदा खिलाड़ी थे. बोर्ड की ओर से एक एफआईआर इस पूरे केस का रुख पलट सकती थी क्योंकि धोखा बोर्ड के साथ हुआ था जो कि करार के साथ दगाबाजी का केस था. लेकिन किसी महंगे वकील ने यह मामूली सलाह शायद बोर्ड को नहीं दी.

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