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बालू पलवनकर: एक ऐसा अछूत खिलाड़ी, जिसने पूरा खेल बदल दिया

बालू ने प्रथम श्रेणी के 33 मैच खेले और 179 विकेट लिए, 15 के आसपास की औसत से

Shailesh Chaturvedi | Published On: Jul 04, 2017 12:33 PM IST | Updated On: Jul 04, 2017 01:00 PM IST

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बालू पलवनकर: एक ऐसा अछूत खिलाड़ी, जिसने पूरा खेल बदल दिया

वो टीम के बाकी खिलाड़ियों के साथ खाना नहीं खा सकते थे. वो टी ब्रेक में चाय साथ नहीं पी सकते थे. यहां तक कि ड्रिंक्स में उन्हें अपने लिए अलग पानी का इंतजाम करना होता था. डिस्पोजेबल क्रॉकरी उनके लिए थी, जिसमें खाने पानी का इंतजाम होता था. उन्हें इस वजह से कप्तान नहीं बनाया गया, क्योंकि वो ब्राह्मण नहीं थे. उन्हें बल्लेबाजी का मौका इसलिए नहीं मिलता था, क्योंकि वो ब्राह्मण नहीं थे. वो अछूत थे. बालू पलवनकर. यही नाम था उस खिलाड़ी का.

तमाम लोग बालू को भारतीय क्रिकेट का पहला महान खिलाड़ी मानते हैं. लेकिन वो दौर अलग था. पूरी तरह तो नहीं, लेकिन आमिर खान की फिल्म लगान में कचरा का कैरेक्टर उनसे प्रेरित लगता है. लेकिन फिल्म के उस चरित्र से बालू की जिंदगी कहीं बहुत आगे जाती है. हां, वो भारत के पहले मिस्ट्री बॉलर कहे जा सकते हैं.

उनका जन्म 19 मार्च 1876 को धारवाड़ में हुआ था. हालांकि परिवार गोवा के करीब पलवन से आया था. इसीलिए उनका सरनेम पलवनकर हुआ. पूना में पारसी क्लब के लिए उन्हें काम मिला पिच बनाने का. उन्हें महीने के तीन रुपये दिए जाते थे. पिच बनाने के अलावा गेंदबाजी करना भी उनका काम था. बल्लेबाजी ‘एलीट क्लास’ के लिए होती थी. उनके तीन और भाई थे. विट्ठल, शिवराम और गणपत. वो भी क्रिकेट खेला करते थे. विट्ठल तो अपनी टीम के कप्तान भी रहे.

जब बालू ने अपने बेटे से कहा, गेंदबाजी का मतलब मजदूरी

कहा जाता है कि बहुत साल बाद बालू ने अपने बेटे से कहा था कि हजारों घंटे गेंदबाजी करने के बाद भी उन्हें कभी बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला. गेंदबाजी का मतलब मजदूरी. याद कीजिए, कई बार देश के महान ऑलराउंडर कपिल देव कह चुके हैं कि क्रिकेट में गेंदबाज का मतलब मजदूर ही होता है. वही काम बालू करते थे.

बालू बाएं हाथ के ऑर्थोडॉक्स स्पिनर थे. वो पूना क्लब चले गए, जो यूरोपियन के लिए था. सेलरी हो गई चार रुपये महीना. यहीं पर उनकी प्रतिभा को पहचाना गया. जेजी ग्रेग उन्हें हर बार आउट किए जाने पर आठ आना देते थे. इसके लिए वो घंटों नेट्स में गेंदबाजी करते थे. उसके बाद बंबई के हिंदू जिमखाना में उन्हें खिलाने की बात हुई.

क्लब के ज्यादातर मराठी भाषी ब्राह्मण सदस्य इसके खिलाफ थे. आखिर किसी तरह उन्हें टीम में शामिल किया गया. लेकिन खाना-पानी अलग. बंबई में तब चार टीमों का टूर्नामेंट होता था. हिंदू, मुस्लिम, पारसी और ब्रिटिश टीमें. बाद में इसमें पांचवीं टीम भी आ गई. यह वही दौर था, जब महात्मा गांधी छुआछूत के खिलाफ लड़ रहे थे. बालू के लिए भी इसी तरह की लड़ाई जारी थी.

अंबेडकर ने उन्हें दलितों का हीरो बताया

1923 में उन्हें करियर के आखिरी क्रिकेट सत्र में एक मैच में नियमित कप्तान के बीच मैच से हटने की वजह से उन्हें कप्तानी दी गई. क्रिकेट करियर के बाद उनकी बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर से मित्रता हो गई. अंबेडकर ने उन्हें दलितों का हीरो बताया. बालू का रोल इतना बढ़ा कि जब गांधी और अंबेडकर के बीच मतभेद हुए, तो उन्होंने मध्यस्थ की तरह काम किया. हालांकि बाद में उनके और अंबेडकर के बीच भी मतभेद हुए और वे अलग हो गए.

पलवनकर ने चुनाव भी लड़ा. वो 1933 में बॉम्बे म्यूनिसिपैलिटी के चुनाव में खड़े हुए और हार गए. उसके बाद 1937 में बॉम्बे असेंबली के लिए वो कांग्रेस की ओर से अंबेडकर के खिलाफ चुनाव लड़े और हार गए. हालांकि हार का अंतर बहुत ज्यादा नहीं रहा. बालू ने प्रथम श्रेणी के 33 मैच खेले और 179 विकेट लिए, 15 के आसपास की औसत से. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब कॉर्नर ऑफ अ फॉरेन फील्ड में उनके बारे में काफी कुछ लिखा है. उन्हें कुछ बड़े पत्रकारों ने भारत का ‘रोड्स’ बताया है. 4 जुलाई 1955 को उनका निधन हो गया.

आज के दौर में शहरों में रहने वाले लोग बालू पलवंकर के संघर्ष को शायद नहीं समझ पाएंगे. लेकिन छोटे कस्बों, जहां अब भी छुआछूत को माना जाता है, वहां काफी कुछ समझ आएगा. समझ आएगा कि अगर आज के दौर में हालात ऐसे हैं, तो उस वक्त कैसे होंगे. उससे समझा जा सकता है कि कैसे दौर में बालू ने क्रिकेट खेली और उसके बाद राजनीति की. और खास बात यह कि खेल बदलकर रख दिया. उन्होंने क्रिकेट में दलितों के लिए रास्ता खोला. आज के दौर में रामदास अठावले जैसे कुछ राजनेताओं को छोड़ दिया जाए, तो शायद ही कोई किसी क्रिकेटर की जाति पूछता होगा.

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