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सुब्रत पॉल: भारतीय फुटबॉल का महान सितारा

सुब्रत पाल हैं कि मेरा काम खेल में 100 प्रतिशत प्रदर्शन देना है…

FP Staff Updated On: Nov 18, 2016 07:26 PM IST

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सुब्रत पॉल: भारतीय फुटबॉल का महान सितारा

बीते एक दशक में भारतीय फुटबॉल के फलक पर कई कोच और खिलाड़ी आए और चले गए. लेकिन एक नाम फुटबॉल टीम में हमेशा दिखाई देता रहा. स्पाइडर मैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर सूब्रत पॉल भारतीय फुटबॉल के अभी तक के महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं.

हाल में ही उन्हें आधिकारिक तौर पर मेहनत का परिणाम अर्जुन पुरस्कार के रूप में मिला. लेकिन पॉल की सादगी देखिए कि वे सिर्फ इस बात के लिए कृतज्ञ थे कि वह अपने पैशन को प्रोफेशन बना सके.

‘मैं अपने जीवन में पुरस्कारों के लिए कभी नहीं खेला. मैं फुटबॉल से प्यार करता हूं. खेलना मुझे खुशी देता है. अगर आपका शौक ही पेश बन जाए तो इससे बड़ी खुशी की कोई बात नहीं हो सकती. मैं ईश्रर का शुक्रगुजार हूं कि यह कर पाया.’ यह बातें सुब्रत ने अर्जुन पुरस्कार लेने के बाद कहीं. अर्जुन पुरस्कार पाने वाले वे 24वें फुटबॉलर हैं.

मेरा काम गोल रोकना है 

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प्यूर्तो रिको के साथ मुंबई में हुए दोस्ताना मैच के पहले भी उन्होंने कहा ‘मेरा काम खेलना है. कोच जब भी मुझे मैदान में भेजता है तो मेरा काम विपक्षी टीम को गोल करने से रोकना होता है. जब तक मैं खेलूंगा, अपना काम करता रहूंगा.’

‘पुरस्कार देर से मिलने का मुझे कोई शिकवा नहीं है. मुझसे पहले बहुत से ऐसे महान खिलाड़ी हुए हैं जिन्हें यह सम्मान नहीं मिला. मैं उन 24 भाग्यशाली फुटबॉल खिलाड़ियों में से हूं, जिन्हें यह सम्मान मिला. मैं इसके लिए ईश्वर और अपने मां-बाप का शुक्रगुजार हूं.’ यह बातें उन्होंने अपने चिर-परिचित शालीन अंदाज में कहीं.

साल 2004 में मोहन बागान के साथ करियर की शुरुआत करने वाले पॉल भारत की राष्ट्रीय टीम में 64 बार खेल चुके हैं. हालांकि पॉल के शानदार करियर के शुरुआती दौर में ही उन्हें तगड़ा झटका लगा था. 2004 में फेडरेशन कप के दौरान सुब्रत पॉल स्ट्राइकर डेंपो क्रिस्टियानो जूनियर से भिड़ गए थे जिससे ब्राजीलियन स्ट्राइकर डेंपो की मौत हो गई थी.   

दुखद रूप से उस समय बाइचुंग भूटिया समेत कई लोगों सुब्रत को डेंपो की मौत का दोषी माना था. साथ ही ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन ने उन्हें स्सपेंड कर दिया था. हालांकि बाद में उन्हें इन आरोपों से मुक्त कर दिया. मामले में मैच अधिकारियों की लापरवाही को इसकी वजह माना गया था.

इस घटना से सदमे में आए पॉल को सीजन के आखिरी में मोहन बागान की टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. उनका करियर तब तक ढलान पर रहा जब तक कि बॉब हटन ने उन पर भरोसा नहीं दिखाया. बॉब ने पॉल को अनुभवशाली गोलकीपर संदीप नंदी की जगह मौका दिया था. बॉब साल 2007 से 2011 तक भारत के कोच थे. उसके बाद पॉल ने भारत को तीन नेहरू कप, एक एएफसी कप और एक एसएएफएफ कप दिलवाने में मदद की.

एक दशक से पहली पसंद 

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अब तेजी से 2016 में आते हैं. भारतीय टीम में गोलकीपर के तौर पर तकरीबन एक दशक से पॉल पहली पसंद हैं. पॉल ने एक बेहतरीन खिलाड़ी के तौर पर अपनी विरासत बना ली है. हालांकि अब फिर टीम उनके स्थान पर दावेदारी होने लगी है. उन्हें गुरप्रीत सिंह संधू के लिए अपनी जगह छोड़नी होगी. गुरप्रीत भारत के इकलौते खिलाड़ी हैं जिन्होंने यूरोपियन लीग में खेला है.

लेकिन पॉल इस चुनौती को भी उन्हीं चुनौतियों की तरह लेते हैं जो जीवन ने उनकी तरफ बढ़ाई. वे कहते हैं ‘ चुनौतियां तो पहले भी थीं और आज भी हैं. हम इन चुनौतियों के साथ पैदा होते हैं. हम इस दुनिया में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जाएंगे. मुझसे पहले भी कुछ खिलाड़ी थे जो पहली पसंद थे और मेरे बाद भी ऐसे खिलाड़ी आएंगे जो पहली पसंद होंगे. कोई भी किसी जगह पर स्थाई तौर पर नहीं है. ’

पॉल ने यह भी कहा था ‘अगर कोच को लगता है कि गुरप्रीत को खेलना चाहिए. तो यह उनका अधिकार है. मुझे कोच में पूरा भरोसा है. मैं यूरोप में खेलने के लिए गुरप्रीत की प्रशंसा करता हूं. लेकिन कोच मुझे जब भी मौका देंगे, मैं अपना सौ प्रतिशत दूंगा. यह जरूरी नहीं कि मैं हर मैच खेलूं.’

पॉल के पूरे करियर में सिर्फ भारतीय फुटबॉल की बेहतरी सबसे महत्वपूर्ण मसला रही है. चाहे मैदान हो या उसके बाहर. वे कहते हैं अगर भारतीय फुटबॉल को कोई जरूरत होगी तो सुब्रत पॉल वहां जरूर होगा.

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