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यूरी गगारिन ने कहा 'पोयखेली' और इस तरह इंसान ने अंतरिक्ष में भरी पहली उड़ान

12 अप्रैल को इंटरनेशनल ह्यूमन स्पेस फ्लाइट डे के रूप में मनाया जाता है

Nidhi Nidhi | Published On: Apr 12, 2017 11:49 AM IST | Updated On: Apr 12, 2017 12:22 PM IST

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यूरी गगारिन ने कहा 'पोयखेली' और इस तरह इंसान ने अंतरिक्ष में भरी पहली उड़ान

12 अप्रैल 1961 को सुबह 9 बजकर 7 मिनट पर एक अंतरिक्ष यान वोस्तक-1 सोवियत अंतरिक्ष केंद्र से उड़ा और 1 घंटे 48 मिनट तक पृथ्वी की कक्षा में उड़ान भरकर 10 बजकर 55 मिनट पर वापस लौट आया. सारी दुनिया दिल थाम कर इस यात्रा का इंतजार कर रही थी.

इस उड़ान की खासियत थी कि पहली बार अंतरिक्ष का सफर रहे एक विमान में एक इंसान भी था. सोवियत कॉस्मोनॉट यूरी गगारिन ने इस उड़ान के जरिए अंतरिक्ष में जाने वाले पहले इंसान के रूप में अपना नाम दर्ज करा लिया.

गगारिन इस उड़ान के बाद पहले अंतरिक्ष यात्री के तौर प्रसिद्ध हो गए. उन्हें इस यात्रा के बाद दुनिया भर से बुलावे मिलने लगे और नवंबर 1961 में यूरी गगारिन ने भारत के चार शहरों – दिल्ली, लखनऊ, मुंबई और कोलकाता की यात्रा की थी.

यूरी की इस उड़ान को याद करते हुए हर 12 अप्रैल को इंटरनेशनल ह्यूमन स्पेस फ्लाइट डे और रूसी कॉस्मोनॉटिक्स डे के रूप में मनाया जाता है. आज के दिन ही पहली बार मनुष्य ने पृथ्वी के गुरुत्व क्षेत्र से बाहर अंतरिक्ष में कदम रखा.

एयरफोर्स में पायलट थे गगारिन

युरी गागरिन का जन्म 9 मार्च 1934 को पश्चिमी मॉस्को में एक छोटे से गांव क्लुशिनो में हुआ. तब रूस सोवियत संघ का हिस्सा था. यूरी चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर थे. उनके पिता एलेक्सी एवोंविच गगारिन बढ़ई का काम किया करते थे और मां अन्ना टिमोफेय्ना  गागरिन दूध की डेयरी में काम करती थी.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गागरिन सिर्फ 7 साल के ही थे कि साल 1941 में नाजियो ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया. जैसे-तैसे स्कूल में युरी गागरिन की पढ़ाई शुरू हुई. उन्हें गणित और भौतिकी में दिलचस्पी थी. यहीं के एक फ्लाइंग क्लब में भी उन्होंने दाखिला ले लिया और जल्द ही हवाई जहाज उड़ाना सीख गए. फिर 1955 में उन्होंने पहली बार अकेले हवाई जहाज उड़ाया.

उड़ान के प्रति रुझान बढ़ने के कारण उन्होंने सोवियत एयरफोर्स की नौकरी कर ली. उड़ान की सटीक कुशलता देख अधिकारियों ने उन्हें आरेनबर्ग एविएशन स्कूल में भेज दिया. यहां वो मिग विमान उड़ाना सीख गए.

मेहनत ने पहुंचाया ऊंचाइयों पर 

नौकरी के दौरान वर्ष 1957 में ही उन्होंने उच्च श्रेणी से ग्रेजुएशन उत्त्तीर्ण किया. अब वो फाइटर पायलट बन गए. लेकिन उनका सपना अन्तरिक्ष में उड़ान भरना था. जब सोवियत सरकार ने अंतरिक्ष में जाने के लिए आवेदन मांगे तो 3000 आवेदन आए, जिनमें गागरिन भी एक थे.

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इनमे से 200 लोगों को ट्रेनिंग के लिए चुना गया. जब ट्रेनिंग शुरू हुई तो एक एक कर सब लोग बाहर हो गए और सबसे योग्य अंतरिक्ष यात्री के रूप में गगारिन बचे रहे. उनका छोटा कद भी उनके लिए मददगार रहा, क्योंकि वोस्तक-1 का कैप्सूल लगभग उन्हीं के आकार जितना था.

तो फिर तय दिन 12 अप्रैल 1961 को गगारिन ने एक संक्षिप्त भाषण में इस कार्य को देश के लिए गौरव और जिम्मेदारी बताया.

'हम दूर चले' के साथ पूरा किया विश्व का सपना 

सुबह 9 बजकर 7 मिनट पर बैकानूर से उनका अंतरिक्षयान उड़ा और वो बोले 'पोयखेली (हम दूर चले).' अंतरिक्ष में गगारिन ने पृथ्वी का एक पूरा चक्कर लगाया. इस समय वोस्तक प्रथम की गति 28.260 किमी प्रति घंटा थी. इसके बाद सुबह 10 बजकर 55 मिनट पर उनका यान पृथ्वी पर लौट आया. पूरी उड़ाना 1 घंटे 48 मिनट की थी जबकि पृथ्वी का चक्कर काटने में उन्हें 89 मिनट लगे.

अंतरिक्ष में जाने का सपना आदमी हमेशा से देखता रहा है. 1903 में विल्बर और ओरविल राइट द्वारा पहली उड़ान के बाद से इंसानी प्रतिभा का अगला लक्ष्य अंतरिक्ष तक उड़ना ही था.करीब 57 साल बाद सन 1961 में जब यूरी गगारिन ने इस सपने को पूरा किया.

शीतयुद्ध में बड़ी जीत थी गगारिन का उड़ान

60 के दशक की शुरुआत के साथ शीतयुद्ध अपने चरम पर था. अमेरिका और सोवियत संघ एक-दूसरो को पछाड़ने में लगे थे. इसमें एक अहम मोर्चा था- अंतरिक्ष.

दोनों देश अंतरिक्ष में जाने वाले पहले देश और फिर अंतरिक्ष में पहला इंसान भेजने के लिए होड़ में थे. जब यूरी गगारिन ने उड़ान भरी तो अमेरिकी एस्ट्रोनॉट एलन शैपर्ड भी पहले अंतरिक्ष उड़ान के लिए तैयार बैठे थे. नासा ने उनकी उड़ान कुछ परीक्षणों के लिए रोकी थी और इसी दौरान गगारिन की उड़ान की खबर आ गई. एलन शैपर्ड को जीवनभर इसका मलाल रहा.

सोवियत संघ ने गगारिन को अंतरिक्ष में भेजकर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की. इस तरह वह स्पेस रेस में अमेरिका से आगे निकल गया. बाद में उसने पहली महिला यात्री को भी अंतरिक्ष में भेजा. 'स्पेस वार' में सोवियत संघ की यह बढ़त अमेरिका के चांद तक पहुंचने तक कायम रही.

 

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