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पुण्यतिथि विशेष: जब दारा सिंह की फिल्म पर इंदिरा सरकार ने लगाई थी रोक

फिल्म रोक के करीब डेढ़ साल बाद होशियारपुर में रिलीज हुई थी

Puneet Saini Puneet Saini | Published On: Jul 12, 2017 04:09 PM IST | Updated On: Jul 13, 2017 04:43 PM IST

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पुण्यतिथि विशेष: जब दारा सिंह की फिल्म पर इंदिरा सरकार ने लगाई थी रोक

रामायण के हनुमान का नाम लेते ही हमें गठे हुए शरीर का 6 फुट 2 इंच लंबा अभिनेता दिखाई देता है. दारा सिंह का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. दारा सिंह को नाम, शोहरत एक अभिनेता के तौर पर नहीं मिली थी. लेकिन उन्होंने पहलवानी, एक्टिंग जो भी किया पूरी शिद्दत से किया.

19 नवंबर 1928 को जन्मे दारा सिंह ने बॉलीवुड में अभिनेता और पंजाबी फिल्म में प्रोड्यूसर के तौर पर भी बहुत ख्याति हासिल की.

आज दारा सिंह को दुनिया को अलविदा कहे 5 साल हो गए हैं. पहलवानी हो, फिल्में हो या फिर राजनीति हो जिस भी काम को दारा सिंह ने किया, पूरी शिद्दत से किया.

पहलवानी की बात करें तो अपने पूरी जीवन में दारा सिंह ने एक भी फाइट नहीं हारी. वहीं एक्टिंग में उन्होंने संगदिल (1952), शेर दिल (1965), तूफान (1969), दुल्हन हम ले जाएंगे (2000), कर्मा (1986) और जब वी मेट (2007) जैसी हिट फिल्मों में काम किया.

पंजाब के धर्मुचक गांव में जन्मे दारा सिहं का पूरा नाम दारा सिंह रंधावा था. दारा सिंह का शरीर शुरू से ही मजबूत कद काठी का था. 53 इंच सीने वाले दारा सिंह ने बड़े-बड़े पहलवानों को धूल चटाई.

कर्ज के बोझ और सरकार के आक्रोश तले दारा सिंह की पहली फिल्म

1974-75 में दारा सिंह ने 'राज करेगा खालसा' प्रोजेक्ट लॉन्च किया था. इसमें राजेश खन्ना, नीतू सिंह, नवीन निसकोल और योगिता बाली थे. इससे पहले की प्रोजेक्ट पूरा होता 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी. दारा सिंह इस फिल्म के लेखक और निर्माता थे. अपने पहले ही प्रोजेक्ट में दारा सिंह को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा. सरकार ने फिल्म के रिलीज पर रोक लगा दी.

आखिरकार 1976 में फिल्म को सेंसर बोर्ड ने हरी झंडी दे दी. फिल्म रिलीज हुई और पहले ही दिन सारे शो हाऊसफुल रहे. पंजाबी भाषी होने के चलते फिल्म को पंजाब में बहुत पसंद किया गया.

'राज करेगा खालसा' अपने समय की सबसे महंगी पंजाबी फिल्म थी. जो एक हिंदू लड़के की कहानी थी. जिसमें वो अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ सिख धर्म को अपनाता है.

रिलीज के दो दिन बाद पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने फिल्म देखने की इच्छा जताई. राज करेगा खालसा देखने के बाद सिंह ने दारा सिंह से फिल्म में कुछ बदलाव करने के लिए कहा. जिसमें कुछ डायलॉग खासकर ‘वो सरकार जिसमें करप्शन है, उसे हमें एक पल नहीं रखना चाहते.’ दारा सिंह ने 'सरकार' शब्द की जगह 'राज' कर दिया. मुख्यमंत्री ने फिल्म में बहुत सारे बदलाव की मांग की. जब दारा ने कहा ‘यह हम कैसे कर सकते हैं, इतने बदलाव के बाद तो पूरी फिल्म दोबारा शूट करनी पड़ेगी. जो कि बहुत महंगा होगा’. इसके बाद जवाब आया ठीक है फिल्म का नाम बदल दो.

इस विवाद के बाद एक नए विवाद से दारा सिंह का सामना हुआ. यह विवाद था बुद्धा दल का. इसमें उन्होंने दारा सिंह के रोल पर विरोध जताया था. उन्होंने तो यहां तक कह दिया अगर फिल्म नहीं रुकी. तो पूरे देश में दंगे होंगे. सबसे अचंभे वाली बात यह थी कि जब बुद्धा दल के प्रमुख संता सिंह से जब पूछा गया ‘क्या आपने यह फिल्म देखी है?’ तो उन्होंने दो टूक कहा नहीं. मतलब साफ हो चुका था पंजाब में सत्तारूढ़ सरकार के कहने पर यह सब हो रहा था.

सरकार ने दारा सिंह को समन भेजने के दो दिन के भीतर फिल्म ऑफ स्क्रीन कर दी. पंजाब में अकालियों ने दारा सिंह को छोटे शहरों में नाम बदलकर फिल्म रिलीज करने की सलाह दी. करीब डेढ़ साल बाद फिल्म ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’ के नाम से होशियारपुर में रिलीज हुई.

संता ने विरोध किया तो दारा सिंह ने उनसे एक बार फिल्म देखने की गुजारिश की. संता सिंह ने फिल्म देखी और सबके सामने खुलकर दारा सिंह की तारीफ करते हुए 'हम गलत थे, फिल्म में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है.'

किंग कॉन्ग को धूल चटाई

नवंबर 1962 में रांची के अब्दुल बारी पार्क में हुई फाइट को आज तक कोई नहीं भूला पाया. इस फाइट में दारा सिंह ने दुनिया के जाने-माने पहलवान किंग कॉन्ग को हराया था. ऑस्ट्रेलिया के किंग कॉन्ग ने दारा सिंह को कुश्ती लड़ने की चुनौती दी थी.

मुकाबले में 200 केजी के किंग कॉन्ग के सामने दारा सिंह बच्चे लग रहे थे, बावजूद इसके वे किंग कॉन्ग पर भारी पड़े. उन्होंने किंग कॉन्ग को तीन बार पटखनी दी. एक बार तो उन्होंने छह फीट लंबे किंग कॉन्ग को उठाकर ट्विस्ट करते हुए एरिना से नीचे गिरा दिया था. इसके बाद साल 1962 में फिल्म 'किंग कॉन्ग' रिलीज हुई. इस फिल्म में दारा सिंह ने एक्टिंग भी की थी.

वर्ल्ड चैंपियन दारा सिंह

दारा सिंह का रेसलिंग करने के स्टाइल को पहलवानी कहते है. यह तरकीब करीब 1,000 साल पुरानी है. फाइट के कारण दारा सिंह कई एशियाई देश घूमे. 1947 में सिंह सिंगापुर गए. जहां उन्हें चैंपियन ऑफ मलेशिया का खिताब मिला. यहां उन्होंने तरलोक सिंह को हराया था.

1954 सिर्फ 26 साल की उम्र में दारा सिंह नेशनल रेसलिंग चैंपियन बन गए. अपने शानदार रेसलिंग तकनीक के चलते उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में काफी लोकप्रियता हासिल हुई. 29 मई 1968 को दारा सिंह लोउ थेसज को हराकर वर्ल्ड चैंपियन बने थे. दारा सिंह रुस्तम-ए-हिंद और रुस्त-ए-पंजाब जैसे कई अवॉर्ड मिले.

1983 में दिल्ली के टूर्नामेंट में देश के महान रेसलर ने पहलवानी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. टूर्नामेंट का शुभारंभ राजीव गांधी ने किया था और विजेता का टाइटल तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने दिया था.

दारा सिंह के दो पत्नियों से 6 बच्चे हैं. मीडिया रिपोर्ट में तो यह भी कहा गया था कि वो नाबालिग होते हुए ही पिता बन गए थे. 17 साल की उम्र में दारा सिंह पहले बच्चे के पिता बने थे.

दारा सिंह ऐसे पहले स्पोर्ट्सपर्सन थे जो राज्यसभा में पहुंचे. उनका कार्यकाल 2003 से 2009 तक का रहा. इन सभी उपलब्धियों से साबित होता है कि भविष्य दारा सिंह की उपलब्धियों का कर्जदार रहेगा. एक ऐसी शख्सियत जो रील और रीयल लाईफ में हीरो रहे.

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