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जन्मदिन विशेष: जब प्रधानमंत्री ने 'भारत' कुमार को खुद कहा देशभक्ति फिल्म बनाने को

मनोज कुमार को उनके योगदान के लिए सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान, दादा साहब फाल्के अवार्ड से सम्मानित किया गया है

Satya Vyas Updated On: Jul 24, 2017 11:41 AM IST

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जन्मदिन विशेष: जब प्रधानमंत्री ने 'भारत' कुमार को खुद कहा देशभक्ति फिल्म बनाने को

बंटवारे के दर्द में हिंदी सिनेमा के कलाकारों का भी अपना एक हिस्सा है. लगभग हर कलाकार जो उस दौर से गुजरा है, उसकी अपनी अलग कहानी है जो किसी से जुदा नहीं है. वही बिछोह, वही टीस, वही दर्द लिए लोगों ने सरहदें पार कीं मगर फिर भी रिफ्यूजी कैंपों में बसर करते हुए भी सपनों और हौसलों को नहीं छोड़ा.

मनोज कुमार एक ऐसा ही नाम हैं. मनोज कुमार - हिंदी देशभक्ति फिल्मों का पर्याय. मनोज कुमार एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार हैं. मनोज कुमार - नायक, लेखक, गीतकार, निर्देशक और निर्माता.

अविभाजित भारत के अबोटाबाद प्रांत में 24 जुलाई, 1937 के दिन हरिकिशन गिरि गोस्वामी का जन्म एक पढ़े-लिखे गोसाईं परिवार में हुआ था. जिसने बाद में दिलीप कुमार की फिल्म शबनम के नायक के नाम से प्रभावित होकर अपना नाम ‘मनोज कुमार’ रखा.

मनोज की यादों में दिल्ली का किंग्सवे कैंप और हडसन लेन आज भी जीवंत हैं, जहां उनका बचपन गुजरा. दिल्ली में उन्होंने अपने दो महीने के भाई को मरते देखा. डॉक्टरों पर हाथ उठाए और फिर तमाम उम्र किसी पर हाथ नहीं उठाने की कसम खा ली. दिल्ली, जहां उन्होंने प्रेम किया. दिल्ली, जहां उन्होंने फिल्में देखते हुए हीरो बनने के सपने पाले. दिल्ली, जिन्हें उन्होंने अपने सपनों को पूरा करने के लिए छोड़ दिया.

मनोज कुमार मुंबई आ गए और संघर्षों का दौर शुरू हो गया. फिल्म स्टूडियो के चक्कर काटना, बार-बार इनकार, लानत-मलामत आदि सभी दौर से वो गुजरे. 1957 में पहली फिल्म मिली – ‘फैशन’ जिसके एक सीन में 19 साल के मनोज कुमार ने 90 साल के बुजुर्ग भिखारी का किरदार निभाया. मगर मनोज कुमार का औपचारिक प्रवेश ‘मीना कुमारी’ की फिल्म सहारा से हुआ. यह फिल्म मनोज के रिश्तेदार और तब के नामचीन फिल्मी लेखक लेखराज भाखरी द्वारा लिखी गई थी. इस फिल्म में मनोज कुमार ने छोटी मगर असरदार भूमिका निभाई.

इसके बाद भी मनोज का फिल्मों में संघर्ष जारी रहा. विजय भट्ट ने उन्हें देखा और परखा. उनकी फिल्म हरियाली और रास्ता आई. फिल्म चली भी मगर तब भी मनोज कुमार को छिटपुट फिल्में ही मिलती रहीं. उन्हीं दिनों राज खोसला की नजर मनोज कुमार पर गई. राज साहब अपनी फिल्म वो कौन थी के लिए ऐसे ही किसी चेहरे की तलाश में थे और लेखराज साब से पहचान के कारण मनोज को भी जानते थे. फिल्म आई और मील का पत्थर साबित हुई. इसके बाद मनोज कुमार ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.

साठ का दशक मनोज कुमार के नाम रहा. उन्होंने ‘पत्थर के सनम’, ‘दो बदन’, 'वो कौन थी', 'गृहस्थी', 'गुमनाम' जैसी लगातार हिट फिल्में दीं. वह उस दौर के सभ्य नायक के किरदार में पसंद किए जाने लगे. 1965 में आई फिल्म शहीद में मनोज की अदाकारी के चर्चे फिल्मी गलियारों से लेकर लोगों की जुबान तक खूब हुए. कहा गया कि दूसरा कोई अदाकार इस भूमिका को इस दर्जे खूबसूरती से नहीं निभा सकता था.

आलम यह रहा कि साल 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद देश का मनोबल बढ़ाने के लिए खुद प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने उन्हें ‘जय जवान जय किसान’ के नारे को सार्थक करती हुई एक फिल्म बनाने को कहा. हिंदू कॉलेज के पढ़े और शिक्षित पारिवारिक बैकग्राउंड के मनोज के लिए इतना बहुत था.

‘विशाल पिक्चर्स’ की नींव पड़ी. अभिनेता मनोज कुमार ने लेखक, निर्देशक और अभिनेता की तीनों जिम्मेदारियां संभालते हुए फिल्म उपकार बनाई. उपकार साल 1967 की सर्वाधिक सफल फिल्मों में से रही. मनोज को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला.

सत्तर के दशक में मनोज कुमार मुख्य रूप से अपने बैनर की फिल्मों में ही व्यस्त रहे. 'रोटी कपड़ा और मकान', 'दस नंबरी', 'सन्यासी', 'बेईमान', 'पूरब और पश्चिम' जैसी फिल्में की. 'बेईमान' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ नायक का जबकि, 'रोटी कपड़ा और मकान' के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का अवार्ड दिया गया.

मनोज कुमार उन कलाकारों में से रहे जिन्हें पता था कि उन्हें कब बाहर होना है. वह कहते हैं कि उन्हें अधिक फिल्में बनाने का लालच नहीं रहा बल्कि मुद्दों की फिल्में बनाने की रुचि थी. उनकी बनाई फिल्में चाहे उपकार हो, शोर हो, रोटी कपड़ा और मकान हो, या फिर क्रांति. सभी अपने वक्त को उजागर करती उद्देश्यपरक फिल्में रहीं.

नब्बे के दशक में मनोज ने अपनी आखिरी फिल्म मैदान ए जंग की. इस फिल्म में भी वो मजदूरों के हक के लिए लड़ते दिखे. इसके बाद पीठ दर्द और बढ़ती उम्र के कारण मनोज कुमार किसी दूसरी फिल्म में नहीं दिखे.

साल 1992 में भारत सरकार ने मनोज कुमार को उनकी सेवाओं के लिए पद्म श्री दिया. इसके अलावा 2016 में उन्हें सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान, दादा साहब फाल्के अवार्ड से भी सम्मानित किया गया. 80 साल की उम्र में मनोज कुमार पीठ दर्द से परेशान जरूर रहते हैं मगर वह खुद को इंडस्ट्री से आउट नहीं मानते. उनका यह जज्बा बना रहे. वह शतायु हों यही कामना है.

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