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अरुण शौरी: जिनके तथ्यों को कभी अरुण जेटली अकाट्य बताते थे

अपनी कलम से सरकारें गिरा देने वाले पत्रकार और संपादक रहे हैं अरुण शौरी

Avinash Dwivedi Updated On: Nov 02, 2017 10:13 AM IST

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अरुण शौरी: जिनके तथ्यों को कभी अरुण जेटली अकाट्य बताते थे

अपना क्या है इस जीवन में सब तो लिया उधार

सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार

हिंदी के प्रसिद्ध कवि अरुण कमल की ये पंक्तियां उनके नामाराशि प्रखर अर्थशास्त्री, पत्रकार, लेखक और राजनेता अरुण शौरी पर बिल्कुल फिट बैठती हैं. पर अरुण शौरी के बारे में आगे बढ़ने से पहले जरा इस वीडियो को देखें, जिसमें इन दोनों के तीसरे नामाराशि अरुण जेटली कुछ कह रहे हैं-

अरुण जेटली कह रहे हैं-

'अरुण शौरी निश्चित रूप से मौजूदा पीढ़ी के जो पत्रकार हुए हैं, उनमें से प्रमुख हैं. मुझे लगता है कि उनकी सही के लिए लड़ने की जो काबिलियत थी, पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत कम लोग उसके नजदीक पहुंच पाए हैं. अरुण (शौरी) का जो चरित्र है उस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता. दूसरा जो उनका ज्ञान है या उसकी तमाम क्षेत्रों में व्यापकता है वो आम पत्रकारों की तुलना में बहुत अधिक है. वो खूब पढ़ते हैं. वो जब वैचारिक विषय पर भी लिखते हैं तो अपने फैक्ट्स को क्रमबद्ध तरीके से लिखते हैं. उसपर बहुत सारा रिसर्च करते हैं. ये बहुत मुश्किल होता है कि उनके फैक्ट्स में गड़बड़ी पाई जाए या उनके जैसे व्यापक ज्ञानी को गलत तर्क करते पाया जाए.'

अब इन्हीं अरुण जेटली के विचार अरुण शौरी को लेकर ऐसे नहीं रह गए हैं. सत्ता बहुत कुछ बदल देती है. 2016 में दिए एक बयान में अरुण जेटली कह चुके हैं कि एनडीए सरकार में जगह न बना पाने के चलते शौरी कुंठित हैं और ऐसा लगता है कि कुछ लोगों ने केवल अपने फायदे और महत्वाकांक्षाओं के चलते पार्टी बीजेपी का दामन थामा था. जाहिर है अरुण जेटली के बयान में सत्ता के समीकरणों के कई बैलेंस झलक रहे हैं.

इनके बाद भी जब अरुण शौरी तथ्यों को आधार बनाते हुए निवर्तमान सरकार के नोटबंदी के फैसले को 'देश में अब तक की सबसे बड़ी मनीलॉन्ड्रिंग स्कीम' बताते हैं तो अरुण जेटली अपने इस पुराने मित्र के तथ्यों से शायद इत्तेफाक नहीं रखते हैं? अरुण शौरी वर्तमान सरकार को 'इल्हाम और ढाई लोगों की सरकार' बताते हैं तो अरुण जेटली अपने मित्र की तार्किक क्षमता को शायद भूल जाते हैं?

बहरहाल, अपने लेखन और पत्रकारिता से भारत में 20वीं शताब्दी के आखिरी दो दशकों में हलचल मचाने वाले अरुण शौरी इस 2 नवंबर को 76 साल के हो गए हैं. उनका जन्म ब्रिटिश इंडिया में, जालंधर में भारतीय प्रशासनिक अधिकारी एस.डी.शौरी के घर हुआ था. अरुण शौरी की स्कूली शिक्षा दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में हुई. इसके बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन किया. बाद में पीएचडी करने के लिए वो अमेरिका चले गए.

विश्वबैंक की नौकरी छोड़ पत्रकार बने शौरी

पीएचडी पूरी होते ही अरुण शौरी ने विश्व बैंक में अर्थशास्त्री की नौकरी कर ली. यहां उन्होंने दस साल से ज्यादा काम किया. इसी बीच 1972-74 के दौरान वो भारतीय योजना आयोग के सदस्य भी रहे. इसी दौरान उन्होंने पत्रकारीय लेखन की शुरुआत भी की. वो आर्थिक योजनाओं की आलोचना लिखा करते थे. 1975 में इमरजेंसी लगने के बाद अरुण शौरी की मुलाकात इंडियन एक्सप्रेस अखबार समूह के मालिक रामनाथ गोयनका से हुई. अरुण शौरी भी उनके अखबार में लिखने लगे. 'इंडियन एक्सप्रेस' इमरजेंसी के खिलाफ मुखर था और सरकार उसे निशाना बनाती रहती थी.

इंडियन एक्सप्रेस ने इमरजेंसी शुरू होते ही खाली एडिटोरियल छापा था

इंडियन एक्सप्रेस ने इमरजेंसी शुरू होते ही खाली एडिटोरियल छापा था

1976 में अरुण शौरी 'इंडियन सेंटर फॉर सोशल साइंस रिसर्च' (ICSSR) के फेलो बन भारत आ गए. कुछ वक्त बाद रामनाथ गोयनका, जो अरुण शौरी के लेखन से पहले से प्रभावित थे, उन्होंने अरुण शौरी को 'इंडियन एक्सप्रेस' अखबार का एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर बना दिया. बकौल अरुण शौरी, रामनाथ गोयनका का कहते थे कि जो उनको (शौरी को) ठीक लगे वो करें. अखबार के संपादक के रूप में अरुण शौरी ने जिस तरह से काम किया, उनकी छवि एक बुद्धिमान और निडर लेखक-संपादक की बनती गई. पर जनता पार्टी की सरकार जाने और इंदिरा गांधी के सत्ता में वापस आने के बाद अरुण शौरी की पत्रकारिता ही उनकी दुश्मन बन गई. खोजी पत्रकारिता में रुचि रखने वाले अरुण शौरी को उनकी खबरों के चलते एक रोज इंडियन एक्सप्रेस से निकाल दिया गया.

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शुरू हो चुका था संपादक को संपादित करने का दौर

इंडियन एक्सप्रेस से अपनी विदाई के बारे में अरुण शौरी का कहना है, 'मैंने अखबार छोड़ा नहीं था, मुझे निकाला गया था. इंदिरा गांधी सत्ता में लौट आई थीं. इसी दौर में मैंने विवादित 'कुओ तेल सौदे' पर खबर लिखी. ये कुल मिलाकर 50 डॉलर की प्रदत्त पूंजी (शेयर बेचने से जो पैसे मिलते हैं) वाली कंपनी थी. दरअसल ये हांगकांग की एक साइनबोर्ड (दिखावटी) कंपनी थी, जिसे सरकार ने एक बड़ा तेल आयात सौदा किया था. बात खुलने के बाद संसद की पब्लिक एकाउंट कमेटी इस सौदे की जांच कर रही थी. कमेटी ने मामले से जुड़ी एक फाइल की मांग की, जिसपर सरकार ने जवाब दिया कि उस फाइल को ढूंढ़ पाना मुश्किल है. मैंने वो फाइल खोज निकाली और उसपर कुछ खबरें कीं. खबरें दबाई गईं पर अखबार में तो उन्हें जाना ही था.

रामनाथ गोयनका (अखबार के मालिक) पहले से ही बहुत दबाव में थे क्योंकि इमरजेंसी के दमन से अभी अखबार उबरा नहीं था. ऐसे में वो फिर से मुसीबत में नहीं पड़ना चाहते थे. इसलिए एक दिन उन्होंने मुझे निकाले जाने का पत्र लिखा, उसपर हस्ताक्षर किए और तत्कालीन एडिटर इन चीफ बीजी वर्गीज को, अपने (रामनाथ गोयनका के) दिल्ली से चले जाने के बाद मुझे देने के लिए दे दिया. रामनाथ गोयनका के ऊपर उस वक्त कई दबाव थे. बहादुर शाह मार्ग पर बन रही नई इमारत गिराई जा रही थी और उस वक्त विदेशी लेन-देन के मामले में जरा सी हेर-फेर बहुत भारी पड़ जाती थी. ऐसे में मैं एक तोहफे (सरकार के लिए) की तरह था और मुझे शहीद किया ही जाना था. इसलिए केस शुरु होने से तीन दिन पहले मुझे निकाल दिया गया.'

सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं

इसके बाद अरुण शौरी ने 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' ज्वॉइन कर लिया पर मन न लगने पर जल्द ही अपने शैक्षणिक कार्य की ओर लौट आये. बकौल अरुण शौरी रामनाथ गोयनका ने जब ये सुना तो स्वामीनाथन गुरूमूर्ति को उनके पास भेजा. गुरुमूर्ति ने रामनाथ गोयनका से चलकर मिलने की बात की. अरुण शौरी बम्बई गए और रामनाथ गोयनका से मिले. रामनाथ गोयनका ने अरुण शौरी से कहा, 'जीवन में कई गलतियां हो जाती हैं. मेरे से गलती हुई थी... तुम वापस आओ. जो तुम पेपर से करना चाहते हो, मैं वही चाहता हूं कि पेपर वही करे.'

इसके बाद अरुण शौरी ने फिर से इंडियन एक्सप्रेस में काम शुरू कर दिया. फिर अरुण शौरी ने हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल पर एक खबर की, कि कैसे देवीलाल ने एक फर्जी खत तैयार किया था? कथित रूप से यह खत प्रधानमंत्री वीपी सिंह का राष्ट्रपति को लिखा खत बताया जा रहा था. शौरी बताते हैं कि उन्होंने सिद्ध कर दिया कि ये एक फर्जीवाड़ा है और देवीलाल को इस्तीफा देना पड़ा. फिर देवीलाल ने सरकार के खिलाफ व्यापक प्रदर्शन की घोषणा की. अरुण शौरी बताते हैं कि इस योजना की हवा निकालने के लिए वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने की घोषणा की थी. शौरी कहते हैं, मंडल कमीशन की रिपोर्ट एक मर चुकी रिपोर्ट थी, जिसे सालों से किसी ने हाथ नहीं लगाया था.

मंडल प्रकरण के चलते इंडियन एक्सप्रेस से हमेशा के लिए हुई विदाई

अरुण शौरी के संपादक रहते इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने मंडल की जातिगत आरक्षण की सिफारिशों को लागू करने के फैसले के विरोध में लेख लिखे. अरुण शौरी इसके बारे में कहते हैं, 'नौजवान छात्रों ने विरोध में अपनी जान देनी शुरू कर दी थी. ये बहुत बड़ा मुद्दा बन गया था. उस वक्त रामनाथ जी को दिल का दौरा पड़ा था. उनको बिल्कुल भी पता नहीं था कि क्या चल रहा था. लोग ऐसे में अखबार पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहते थे और उन्हें लगता था कि इस काम में दो लोग उनके लिए बाधा बन सकते हैं- एक थे गुरूमूर्ति और दूसरा था मैं. इसी दौरान मुझे एक रात साढ़े दस बजे टेलीप्रिंटर पर पांच पेज का 'मुझे निकाले जाने का' पत्र मिला, जिसमें बताया गया था कि सम्पादकीय असहमतियों के चलते मुझे निकाला जाता है.'

मंडल कमीशन के विरोध में कई छात्र प्रदर्शन हुए

मंडल कमीशन के विरोध में कई छात्र प्रदर्शन हुए

वैसे, इंडियन एक्सप्रेस के कई कर्मचारियों ने मंडल विरोधी स्टैंड लेने पर वाकई अरुण शौरी से असहमति जताई थी और काम बंद कर दिया था. अरुण शौरी ने ऐसे में अखबार का काम न बंद हो, इसके लिए एबीवीपी के छात्रों तक की मदद ली थी. शौरी के उन दिनों के कई साथी मंडल रिपोर्ट के विरोध में अपनाए शौरी के तौर-तरीकों को हिटलरी करार देते हैं. पर आज भी कई लोग शौरी को एक दौर में प्रेस की स्वतंत्रता का अभियान चलाने वाले, भ्रष्टाचार को सामने लाने वाले और नागरिक अधिकारों की रक्षा करने वाले संपादक के रूप में ही याद करते हैं.

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एक पत्रकार के रूप में अरुण शौरी को इमरजेंसी के विरोध, बोफोर्स घोटाले के खुलासे, मंडल कमीशन के विरोध और बाबरी मस्जिद प्रकरण का दोष पूर्ववर्ती सरकारों की तुष्टीकरण की राजनीति पर मढ़ने और वीपी सिंह, चंद्रास्वामी और बीजेपी नेताओं से अपनी नजदीकियों के चलते याद किये जाते हैं. हालांकि अरुण शौरी खुद अक्सर कहते हैं कि मैं खुद को बहुत गहरा इंसान नहीं मानता पर मैं तथ्यों से कभी नहीं भटकता. ध्यान देने योग्य है कि अरुण शौरी पत्रकारिता के लिए 1982 में रैमन मैग्सेसे और 1990 में पद्म भूषण जैसे पुरष्कारों से नवाज़े जा चुके हैं.

राजनीति में अरुण शौरी

मंडल रिपोर्ट के बाद से ही अरुण शौरी के तेवर बदल चुके थे. उन्होंने राम मंदिर आंदोलन का समर्थन किया और बाबरी के ढहाए जाने को स्वाभाविक घटना बताते हुए इसका सारा आरोप पिछली और तत्कालीन केंद्र सरकारों और कोर्ट पर डाल दिया. इस दौर में वो राजनीति में जाने को भी उत्सुक रहते थे. ऐसे में उनको मौका मिला बीजेपी से, जिसके मतलब की बात अरुण शौरी काफी वक्त से कर रहे थे. बीजेपी की ओर से अरुण शौरी को लगातार दो बार (1998-04 और 2004-10) राज्यसभा के लिए उत्तरप्रदेश से चुना जा चुका है.

अपने पहले कार्यकाल में अरुण शौरी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विनिवेश और सूचना प्रसारण मंत्री भी रहे थे. इस दौरान उन्होंने विनिवेश मंत्री के तौर पर मारुती, वीएसएनएल, हिंदुस्तान ज़िंक आदि की बिक्री का नेतृत्व भी किया था. पर प्रखरता से जीने वाले अरुण शौरी ने एक रोज अपने ही पूर्ववर्ती टेलिकॉम मिनिस्टर प्रमोद महाजन पर एक टेलीकॉम कंपनी को गलत ढंग से फायदा पहुंचाने का आरोप लगा दिया. ऐसे में अरुण शौरी की मुखरता से परिचित बीजेपी की जब 2014 में सरकार बनी तो उम्र का हवाला देकर उन्हें साइडलाइऩ कर दिया गया. पर आज भी पसंदीदा भारतीय राजनीतिज्ञों का नाम पूछे जाने पर अरुण शौरी केवल अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लेते हैं.

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हिंदुत्व की पॉलिटिक्स को बौद्धिक आधार प्रदान करने वाले अरुण शौरी भगवान को नहीं मानते. खास बात ये है कि कभी हिंदू भावनाओं को आधार बनाकर बाबरी की जगह राम मंदिर बनाये जाने की बात करने का घोर समर्थन करने वाले अरुण शौरी खुद न ही आत्मा में विश्वास करते हैं और न परमात्मा (ईश्वर) में. उनका कहना है मेरा विश्वास बस अच्छे लोगों में हैं. एक तार्किक इंसान के रूप में उन्हें बुद्धिजीवियों ने स्वीकार किया है पर हिंदुत्व का प्रोपेगेंडा करने का आरोप भी उनपर लगता आया है. पत्रकार वीर सांघवी ने एक बार उनके लेखों को 'उदार की शक्ल में हिंदू दुराग्रह से ग्रस्त' बताया था. समाजविज्ञानी क्रिस्टोफर जैफरलॉट भी उन्हें 'सशस्त्र हिंदू मुद्दों से सहानुभूति रखने वाला लेखक' बता चुके हैं.

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समर्पित पति, बेहतरीन पिता

अभी तक राजनीति तमाम समाजशास्त्रीय मुद्दों और आध्यात्म पर कुल मिलाकर 27 किताबें लिख चुके अरुण शौरी फिलहाल दिल्ली में अपनी पत्नी अनीता और बेटे आदित्य के साथ रहते हैं. अनीता शौरी को पिछले 28 सालों से पार्किंसन नाम की बीमारी है. हाल ही में एक इंटरव्यू में अरुण शौरी ने कहा था कि अनीता को बैठाकर खाना खिलाने में दो लोगों की जरूरत पड़ती है. अरुण शौरी के बेटे आदित्य शौरी को बचपन से ही 'सेरिब्रल पल्सी' नाम की बीमारी है, जिसके चलते वे चलने-फिरने में असमर्थ हैं. दोनों को ही खाना खिलाने, कपड़े बदलने से लेकर घुमाने-फिराने तक की जिम्मेदारी अरुण शौरी खुद ही उठाते हैं.

जिसके चलते वह अक्सर घर पर ही रहना पसंद करते हैं. अरुण शौरी अपने बेटे की बीमारी को लेकर हमेशा बात करते रहे हैं. अरुण शौरी दूसरों को भी ऐसी हीन भावना न रखने की प्रेरणा देते हैं. वाजपेयी सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने ऐसी बीमारियों से लड़ने के लिए कई सरकारी प्रयासों की भी शुरुआत की थी. बेहद सादगी से जीने वाले अरुण शौरी हो सकता है आधी बांह की शर्ट पहने हुए, जेब में पेन और चश्मा रखे दिल्ली में कभी आपके बगल से गुजर जाएं और आप पहचान भी न पाएं. पर लेखक पैट्रिक फ्रेंच के शब्दों में उनकी नुकीली नाक, सर पर ग्रे रंग के बाल (जो देखने में किसी पक्षी के पंख लगते हैं) और घनी भौंहों से ढकी उनकी गंभीर आंखें, जिनमें झपटने की आतुरता दिखती हैं, अरुण शौरी को किसी बाज जैसा लुक देती हैं.

अरुण शौरी होने के मायने क्या हैं?

अर्थशास्त्र, पत्रकारिता, लेखन और राजनीति सभी में अपनी मुखरता और प्रखरता के लिए जाने जाने वाले अरुण शौरी मूल्यों में कितना विश्वास करते हैं, ये जानने के लिए यूट्यूब पर उपलब्ध एक टीवी इंटरव्यू देखना चाहिए, जिसमें पत्रकार रहे राजीव शुक्ला उनसे पूछते हैं कि 'शौरी स्टाइल ऑफ जर्नलिज्म' जिसे कहा जाता है क्या वो सही था?

इस पर शौरी पटलकर सवाल करते हैं, राजीव शुक्ला क्या समझते हैं शौरी स्टाइल क्या था? राजीव शुक्ला जवाब में कहते हैं, 'शौरी स्टाइल ये था कि किसी की खोजबीन करना, किसी के पीछे पड़ जाना, किसी के खिलाफ लिखना, ज्यादातर शौरी स्टाइल ऑफ जर्नलिज्म किसी के खिलाफ लिखना माना जाता है.'

इस पर अरुण शौरी जवाब देते हैं,

'ये पूरी तरह से गलत चित्र खींचना है. अगर मैं किसी भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखता हूं तो दरअसल मैं ईमानदारी के पक्ष में लिख रहा हूं. आप वो क्यों नहीं देखते? आप ये क्यों देखते हो कि खिलाफ (किसी के) लिख रहा है.'

एक दौर में अरुण शौरी के साथी रहे, वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला उनके बारे में कहते हैं, 'उनके (अरुण शौरी के) लक्ष्य हमेशा सही थे, पर उनतक पहुंचने के लिए वो क्या रास्ते चुन रहे हैं, उनकी वो फिक्र नहीं करते थे.'

शायद यही वजह रही कि अरुण शौरी ने गलत रास्ते भी चुने. पर उनके संक्षिप्त पत्रकारीय दौर में ही भारतीय पत्रकारिता ने अपना वो दौर देखा, जिसमें अरुण शौरी की कलम को इतना ताकतवर माना गया कि वो सरकारें बना और गिरा सकती थी तो वहीं एक दौर में उनकी कलम पर प्रोपेगेंडा के हाथों बिक जाने के भी आरोप लगे.

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