S M L

वाह आम: 'आम' के साथ जुड़कर कत्ल जैसा शब्द भी 'मीठा' हो जाता है

उर्दू साहित्य में आम को लेकर कई बड़े शायरों ने शेर कहे हैं

Nazim Naqvi Updated On: Jul 15, 2017 12:45 PM IST

0
वाह आम: 'आम' के साथ जुड़कर कत्ल जैसा शब्द भी 'मीठा' हो जाता है

कुहुक-कुहुक कर कोयल ने पहुंचाया सबको ये पैगाम

फिर आया है मीठा मौसम, जश्न से होगा कत्ल-ए-आम

यकीनन ऊपरवाले ने कायनात में जो कुछ पैदा किया है, वो सब का सब बेशकीमती है, लेकिन इन अनगिनत बेशकीमती चीजों में आम का फल बेजोड़ है. एक ऐसा फल जिसके साथ ‘कत्ल’ जैसा शब्द भी जुड़कर मीठा हो जाता है.

कहते हैं कि दुनिया में आम की करीब डेढ़ हजार किस्में हैं और हम हिंदुस्तानियों के लिए तो ये फख्र की बात है कि इनमें से कोई हजार किस्में हमारी जमीन ने दुनिया को बख्शी हैं. अब हजार किस्में हैं तो इसी एक आम के हवाले से, हजारों रसीले किस्से भी हमारे पास हैं. इतने किस्से कि पूरी एक किताब आम के नाम की जा सकती है.

हमारी तो बात ही क्या. आम तो हमारा राष्ट्रीय फल है. हम इसे फलों का राजा कहते हैं. हमारी विविधता में एकता का प्रतीक है आम. कहीं ये रसाल हैं, कहीं समर-बहिश्त, कहीं किशनभोग, किसी के लिए ये हरदिल-अजीज है तो कोई इसे मिठुआ कहकर पुकारता है. हमारी संस्कृति में आम्रवृक्ष यानी आम के पेड़ का जिक्र एक ऐसे पेड़ के रूप में किया गया है जो सदा-हरा रहता है. पूजा, विवाह और जन्म की खुशी में आम के पत्तों का होना एक जरूरी रस्म है.

कालिदास ने अपनी रचना ‘मेघदूतम’ में इसका इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया है. वो पर्वत को आम्रकूट, आम की बौरों को मदन-बाण और फल को प्रेम की परिपक्वता का प्रतीक मानते हैं. ‘आम के आम, गुठलियों के दाम’ कहावत दरअसल इसी बात से निकली है कि आम के पेड़ की हर चीज उपयोग की है. आम कि मेडिसिनल वैल्यू यानी औषधीय गुणों के सन्दर्भ ‘चरक-संहिता’ में भी मौजूद हैं.

शायरी में भी इस फल की बराबरी कोई दूसरा फल नहीं कर पाया. आम के शैदाई, ग़ालिब का वो मशहूर किस्सा कि जब उनके एक दोस्त ने देखा कि एक गधे ने आम के छिलकों को सूंघ कर मुंह फेर लिया तो उसने तपाक से कहा, 'मिर्ज़ा देखिए, गधे भी आम नहीं खाते', ग़ालिब ने आम खाते ही खाते जवाब दिया, 'बरखुरदार, गधे ही आम नहीं खाते.'

Mango Garden1

उर्दू शायरी के शुरुआती दौर में अमीर खुसरो, जो अपनी शायरी में पहेलियां बुनने के माहिर थे, आम पर भी एक पहेली बुनते हैं.

बरसा बरस वो देस में आवे

मुंह से मुंह लगा रस पीयावे

व खातिर में खर्चे दाम

ऐ सखी साजन, न सखी आम

नज्मों के एक बेहद सफल शायर ‘अख्तर शीरानी’ अपनी एक नज़्म में परदेसी होने का दर्द झेल रहे हैं और वतन की एक-एक चीज़ याद करते हुए आम का जिक्र भी ले आते हैं.

ओ देस से आने वाले बता

क्या आम के ऊंचे पेड़ों पर

अब भी वो पपीहे बोलते हैं

शाखों के हरीरी पर्दों में

नग्मों के खजाने घोलते हैं

सावन के रसीले गीतों से

तालाब में अमरस घोलते हैं

ओ देस से आने वाले बता

अकबर इलाहाबादी भी आम के मौसम में कोई और बात नहीं करना चाहते.

नामः (खत) न कोई यार को पैगाम भेजिए,

इस फस्ल में जो भेजिए, बस आम भेजिए

मशहूर शायर मुनव्वर राना के यहां भी आम पर बहुत ही रसीले दो शेर मिलते हैं.

इंसान के हाथों की बनायी नहीं खाते

हम आम के मौसम में मिठाई नहीं खाते

और –

अल्लाह जनता है मोहब्बत हमीं ने की

ग़ालिब के बाद आमों की इज्जत हमीं ने की

भारत में रामायण-महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों में भी आम का जिक्र मिल जाता है. इस बात का भी जिक्र मिलता है कि सन् 327 ईसा पूर्व में सिकंदर के सैनिकों ने सिधु घाटी में आम के पेड़ देखे थे. ह्वेनसांग ने भी आम का जिक्र किया है. इब्न बतूता ने तो कच्चे आम का अचार बनाने का तरीका अपने बयानों में दर्ज किया है. मुगल बादशाहों को भी आम बहुत अजीज था. कहा जाता है कि बादशाह अकबर ने दरभंगा में एक लाख आम के पेड़ों का बाग लगवाया था.

जवाहरलाल नेहरू और फिराक़ गोरखपुरी के बेहतरीन दोस्त और उर्दू के हरदिल अजीज शायर ‘जोश मलीहाबादी’ ने हिंदुस्तान छोड़ते वक्त एक बहुत दर्द भरी नज्म लिखी थी जिसमें ‘आमों की राजधानी, मलीहाबाद का जिक्र कुछ इस तरह किया था.

आम के बागों में जब बरसात होगी पुरखरोश

मेरी फुरकत में लहू रोएगी, चश्मे मय फरोश

रस की बूदें जब उड़ा देंगी गुलिस्तानों के होश

कुंज-ए-रंगी में पुकारेंगी हवांए ‘जोश जोश’

सुन के मेरा नाम मौसम गमजदा हो जाएगा

एक महशर सा गुलिस्तां में बपा हो जाएगा

ए मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा.

एक शायर जो मधुमेह यानी शुगर की बीमारी से जूझ रहे हैं लेकिन आम का नशा छोड़ने को तैयार नहीं हैं.

हमको शूगर है एक अरसे से / फिर भी हम हैं कि आम खाते हैं

और शायर प्रबुद्ध सौरभ की ये उलझन भी कम दिल्चास्म नहीं.

वक्त पर निकले थे और अब तक पहुंच जाते भी हम

बीच में लेकिन मुआ आमों का मौसम पड़ गया

शायर कैफी आज़मी भी आम के उतने ही शौकीन थे जितने कि ग़ालिब या आप. उनकी एक नज़्म में आम के मौसम की खुशबू महसूस कीजिये.

मस्त घटा मंडलाई हुई है

बाग़ पे मस्ती छाई हुई है

झूम रही हैं आम कि शाखें

नींद सी जैसे आई हुई है

RTR24UG7 (1)

तो ये है शायरी में छाया हुआ आमों का नशा. हमें उम्मीद है कि शायरों का आम-नामा पढ़कर आपको काफी मज़ा आया होगा, वैसे अभी आमों का मौसम गुज़रा नहीं है इसलिए आप इन्हें खाकर भी मजा ले सकते हैं.

चलते-चलते अनवर जलालपुरी का ये शेर मुलाहिजा कीजिए और हमें इजाजत दीजिए कि हमें भी आम खाने हैं.

सोच रहा हूं घर आंगन में एक लगाऊं आम का पेड़

खट्टा खट्टा, मीठा मीठा यानी तेरे नाम का पेड़

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi