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जन्मदिन विशेष: संगीत का नाम 'रोशन' कर गए रोशन लाल

रोशन संगीत की बारीकियों और उसे लेकर अपनी समझ के लिए पूरे फिल्म इंडस्ट्री में मशहूर थे

Shailesh Chaturvedi Updated On: Jul 14, 2017 01:46 PM IST

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जन्मदिन विशेष: संगीत का नाम 'रोशन' कर गए रोशन लाल

1968 की बात है, एक फिल्म का गाना रिकॉर्ड हो रहा था. समस्या यह थी कि संगीतकार ने धुन तो तैयार कर ली थी, लेकिन रिकॉर्डिंग से पहले वो दुनिया से रुखसत हो गए थे. उनकी पत्नी ने स्टूडियो में गाना रिकॉर्ड करने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली. गाने की रिकॉर्डिंग शुरू हुई लेकिन वहां रिकॉर्डिंग के लिए सिर्फ संगीतकार की पत्नी ही नहीं थीं. इंडस्ट्री के लगभग सभी नामी-गिरामी संगीतकार मौजूद थे. वे सब चाहते थे कि गाना बहुत अच्छी तरह रिकॉर्ड हो. वो अपने साथी के आखिरी गीत को किसी भी तरह कमजोर नहीं देखना चाहते थे.

लता मंगेशकर गायिका थीं. वो स्टूडियो में आईं, माइक हाथ में लिया और गाना शुरू किया. हर आंख में आंसू थे. इरा नागरथ जी के भी, जो अपने पति के इस गाने को रिकॉर्ड करा रही थीं. उन संगीतकारों के भी, जो वहां मौजूद थे. लता मंगेशकर की भी आंखें डबडबा उठीं थीं, जो इस गाने को गा रही थीं.

वो गाना, और उसके लिए वहां मौजूद हर संगीतकार इस बात की गवाही दे रहा था कि उन सबके मन में उस संगीतकार के बारे में क्या भाव थे, जो अब इस दुनिया में नहीं थे. फिल्म का नाम था अनोखी रात... गाना था- खुशी-खुशी कर दो विदा, तुम्हारी बेटी राज करेगी... अब आप संगीतकार का नाम समझ ही गए होंगे. रोशन साहब.

नई पीढ़ी रोशन साहब को ऋतिक रोशन के दादा के तौर पर जान सकती है. राकेश और राजेश रोशन के पिता के तौर पर जान सकती है. लेकिन कोई भी संगीत प्रेमी जानता है कि रोशन ने कैसे संगीत की दुनिया रोशन की थी.

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गुरु के साथ भारत घूमे

रोशन जी का जन्म गुजरांवाला में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है. 14 जुलाई 1917 को वो पैदा हुए थे. पूरा नाम था रोशन लाल नागरथ. छोटी उम्र से ही संगीत सीखना शुरू कर दिया था. पहले गुरु थे मनहर बर्वे. गुरु के साथ वो भारत घूमे. लखनऊ के मौरिस कॉलेज ऑफ म्यूजिक में संगीत सीखा. अब यह भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है.

उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब उनके गुरु थे. बाबा अलाउद्दीन खां की सख्ती के तो किस्से भरे पड़े हैं. एक बार उन्होंने रोशन को जलती लकड़ी से मारा था. बाबा ने रोशन से तीन साल राग यमन का अभ्यास कराया. नतीजा देखिए, रोशन साहब के तमाम गाने राग यमन पर आधारित हैं.

उन्होंने सारंगी सम्राट कहे जाने वाले बुंदू खां से सारंगी सीखी. रोशन साहब के गानों में सारंगी का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है. 40 के दशक की शुरुआत में वो आकाशवाणी से जुड़े और करीब दस साल उससे जुड़े रहे. तमाम रेडियो कार्यक्रमों के लिए उन्होंने संगीत तैयार किया. 1948 में वो बंबई आ गए. संगीतकार ही बनना चाहते थे. यहां वो ख्वाजा खुर्शीद अनवर के सहायक बन गए, जो फिल्म सिंगार में संगीत दे रहे थे.

रोशन साहब की पत्नी का भी जिक्र जरूरी है, जो खुद बहुत अच्छी गायिका थीं. शायद तभी वो रोशन साहब के आखिरी गाने के साथ न्याय कर पाईं, जो उन्होंने ही रिकॉर्ड करवाया था. इरा मोइत्रा बंगाली गायिका थीं और आकाशवाणी के लिए काम करती थीं. रोशन भी आकाशवाणी से जुड़े थे. यहीं दोनों की मुलाकात हुई. दोनों ने साथ जीवन जीने का फैसला किया.

रोशन ने करियर के शुरुआती दौर में काफी संघर्ष किया. इन दिनों में वो केदार शर्मा से मिले, जो नेकी और बदी नाम से फिल्म बना रहे थे. इसके संगीतकार थे स्नेहल भटकर. केदार साहब को रोशन ने बड़ा प्रभावित किया. केदार शर्मा ने स्नेहल जी से बात की और कहा कि मैं रोशन को लेना चाहता हूं. फिर रोशन ने इस फिल्म का संगीत दिया. दुर्भाग्य से फिल्म नहीं चली. इसके बावजूद केदार शर्मा ने उन्हें फिल्म दी बावरे नैन. इस फिल्म के गाने-खयालों में किसी के इस तरह आया नहीं करते.. औरसुन बैरी बलम सच बोल रे... बेहद लोकप्रिय हुए.

शम्मी कपूर के बड़े फैन

रोशन साहब की दो खासियत ऐसी थीं, जो उनके करीबियों को हमेशा याद रहती हैं. पहली, वो शम्मी कपूर के बहुत बड़े फैन थे. इस कदर कि उन्होंने शम्मी कपूर की फिल्म जंगली 28 बार देखी थी. उसी टेलर से, वैसे ही कपड़े सिलाते थे जैसे शम्मी कपूर के थे. दूसरी खासियत उनके अनुशासन प्रेम से जुड़ी है. उनके घर में डिनर का टाइम पक्का था. ठीक रात नौ बजे. अगर कोई पांच मिनट देर से पहुंचता, तो उसे डिनर टेबल पर बैठने की इजाजत नहीं दी जाती थी.

Shammi Kapoor

व्यक्तिगत जिंदगी की खासियतों के अलावा रोशन साहब के गानों की भी अपनी खासियत थी. वो लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत का मिश्रण बहुत अच्छी तरह करते थे. कव्वाली भी उनकी पहचान बनी. निगाहें मिलाने को जी चाहता है.. न खंजर उठेगा न तलवार तुमसे या फिल्म बरसात की रात की कव्वाली- ना तो कारवां की तराश है... हर कव्वाली ने अपनी छाप छोड़ी.

राग यमन उन्हें बहुत पसंद था. उनके तमाम गाने इस राग पर आधारित हैं. बांसुरी और सारंगी का उन्होंने बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया. 60 के दशक में उन्होंने तमाम हिट फिल्में दीं. उन्हें दिल की बीमारी थी. करीब 20 साल वो इस बीमारी के साथ जिए. लेकिन 16 नवंबर 1967 को पड़ा दिल का दौरा वो नहीं झेल पाए. उनका निधन हो गया. उनके बेटे राजेश रोशन संगीतकार के तौर पर उनकी विरासत को आगे बढाने की कोशिश कर रहे हैं.

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