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किस गाने की बात सुनकर फूल गए थे मन्ना डे के हाथ-पांव

आसान नहीं थी मन्ना डे के लिए फिल्मी गायकी के सफर की शुरुआत

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Sep 24, 2017 04:42 PM IST

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किस गाने की बात सुनकर फूल गए थे मन्ना डे के हाथ-पांव

1956 की बात है. फिल्म निर्देशक राजा नवाथे एक फिल्म बना रहे थे- बसंत बहार. इससे पहले उन्होंने राज कपूर के साथ 'आह' फिल्म का निर्देशन किया था. रजा नवाथे राज कपूर के सहायक हुआ करते थे. उन्होंने आग, बरसात और अवारा जैसी फिल्मों में राज कपूर के असिस्टेंट के तौर पर काम किया था. 1956 में जब वो बसंत बहार बना रहे थे तो उस फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन को तैयार करना था.

फिल्म की पटकथा के हिसाब से नायक को एक संगीत प्रतियोगिता में हिस्सा लेना था. जिसमें जीतने वाले कलाकार को शाही गायक की उपाधि मिलनी थी. फिल्म के गीत शैलेंद्र और हसरत जयपुरी ने लिखे थे. इस मौके के लिए जिस गाने को तैयार किया गया था उसके बोल थे- केतकी गुलाब जूही. शंकर जयकिशन ने इस गाने को शास्त्रीय राग बसंत पर कंपोज किया था. आप पहले इस गाने को सुनिए फिर इसके पीछे की बड़ी ही दिलचस्प कहानी आपको सुनाते हैं.

हुआ यूं कि इस गाने को पंडित भीमसेन जोशी गा रहे थे. उनके साथ गाने के लिए एक और गायक की जरूरत थी. संगीतकार शंकर जयकिशन ने इसके लिए मन्ना डे से संपर्क किया. मन्ना डे उस समय फिल्मी दुनिया में जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. जब उन्हें पता चला कि इस गाने में उनके साथ पंडित भीमसेन जी को गाना है तो मन्ना डे के हाथ पांव फूल गए. उन्होंने इस गाने को गाने से साफ मना कर दिया.

मन्ना डे स्वयं कह चुके हैं, 'ऐसी मूर्धन्य हस्ती से तुलना कराकर अप्रिय बनने और बड़े श्रम से गायक के रूप में अर्जित की गई प्रतिष्ठा के धूल में मिल जाने के विचार मात्र से मैं कांप गया था.' मन्ना डे ने घर वापस लौटकर जब ये बात अपनी पत्नी को बताई तो उन्होंने पति के फैसले का विरोध कर दिया. आम तौर पर मन्ना डे को उनकी पत्नी का हमेशा बहुत साथ मिलता था लेकिन उन्होंने इस फैसले का विरोध कर दिया.

मन्ना डे की पत्नी ने कहा कि वो इस गाने को जरूर गाएं. जब मन्ना डे ने अपने मन का डर अपनी पत्नी को बताया तो उन्होंने समझाया कि अव्वल तो वो शास्त्रीय संगीत में कमजोर नहीं हैं दूसरे फिल्म की पटकथा के हिसाब से अंत में नायक को ही इस प्रतियोगिता में जीतना है और नायक वाला हिस्सा मन्ना डे गा रहे हैं इसलिए हारने का कोई सवाल ही नहीं है. मन्ना डे की पत्नी जिद पर अड़ गईं कि उन्हें वो गाना गाना ही पड़ेगा. अंत में मन्ना डे ने इस दबाव में आकर गाने के लिए हामी भर दी. गाने की रिकॉर्डिंग के बाद स्वयं पंडित भीमसेन जोशी ने मन्ना डे की पीठ थपथपाते हुए पूछा कि उन्होंने शास्त्रीय संगीत को अपना व्यवसाय क्यों नहीं बनाया.

दरअसल, मन्ना डे के इस डर के पीछे की कहानी भी आपको बताते हैं. जिस मन्ना डे के एक से एक बढ़कर नगमों को हम सभी ने सुना और सराहा है वो बहुत बाद की बात है. एक बेहतरीन कलाकार होने के बाद भी शुरुआती समय में उन्हें फिल्मी संगीत की दुनिया में बहुत संघर्ष करना पड़ा था. यहां तक कि एक फिल्म निर्माता ने मन्ना डे के सामने ही संगीत निर्देशक को डांटते हुए कहा था कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि तुम मेरी फिल्म में मन्ना डे से गाना गवाने की सोचो भी, इसके बाद एक गायक का नाम लेते हुए उन्होंने कहाकि मेरी फिल्म के गाने सिर्फ वही गायक गाएगा.

उनकी इस बात पर जवाब देते हुए संगीत निर्देशक ने कहा कि जिस गायक का नाम आप ले रहे हैं वो गायक अच्छा है लेकिन इस फिल्म के गाने शास्त्रीय संगीत पर आधारित हैं जिनके साथ मन्ना डे बेहतर गा सकते हैं. इस तर्क को सुनकर फिल्म निर्माता और नाराज हो गए और उन्होंने संगीत निर्देशक को धमकी देते हुए कहा कि जो मैं कहता हूं वैसा ही करो वरना मुझे तुम्हें भी फिल्म से हटाने में कोई संकोच नहीं होगा. मन्ना डे कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में कभी इस तरह का अपमान नहीं सहा था.

खैर, चलिए राग बसंत पर वापस लौटते हैं. राग बसंत पर आधारित आपको एक और कंपोजीशन सुनाते हैं. इसे गाया है जानी-मानी कलाकार मल्लिका पुखराज की बेटी ताहिरा सईद ने.

राग बसंत के शास्त्रीय पक्ष पर बात करते हैं. राग बसंत की उत्पत्ति पूर्वी थाट से मानी जाती है. इसमें दोनों 'म' और 'रे' 'ध' कोमल प्रयोग किए जाते हैं. आरोह में 'र' और 'प' नहीं लगाया जाता है. इस राग की जाति औडव संपूर्ण है. राग बसंत का वादी स्वर 'स' और संवादी स्वर 'प' है. इस राग को गाने-बजाने का समय रात का आखिरी प्रहर होता है. आरोह- सा ग, म ध रे, सां नी सां

अवरोह रे नी ध प, म ग म S ग, म ध ग म ग, रे सा

पकड़- म ध रे सा, नी ध प, म ग म S ग

इस राग को लेकर कुछ अलग विचार भी हैं. कुछ लोग इसमें इस्तेमाल होने वाले 'म' को तीव्र भी लगाते हैं. राग की जाति को लेकर कुछ लोगों ने इसे संपूर्ण जाति का राग भी माना है. इस राग को परंपरागत तरीके से भले ही रात के आखिरी पहर में गाया जाता है लेकिन बसंत के मौसम में ये राग कभी भी गाया बजाया जा सकता है. इस राग की बारीकियों को समझने के लिए एनसीईआरटी का ये वीडियो देखिए.

इस कॉलम में हम हमेशा एक राग की कहानी से आपको परिचित कराते हैं. राग पर आधारित किसी फिल्म गाने की कहानी सुनाते हैं. उस राग पर आधारित फिल्मी और गैर फिल्मी गाने की जानकारी देते हैं और उसके शास्त्रीय पक्ष के बारे में बताते हैं. तो आज राग बसंत पर आधारित शास्त्रीय गायन में आज आपको शास्त्रीय संगीत के पुरोधा उस्ताद अब्दुल करीम खान साहब का और ग्वालियर घराने की जानी मानी गायिका मीता पंडित का राग बसंत सुनाते हैं.

राग बसंत की कहानी को गायकी के इस अंदाज के साथ खत्म करते हैं. अगले हफ्ते एक और नए राग और राग की कहानी से साथ हाजिर होंगे.

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