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पार्ट 2: वैज्ञानिक सोच की वजह से इस्लाम से दूर होते युवाओं की कहानी

कई मुस्लिम युवा जो पहले धर्म पर सवाल नहीं खड़ा कर पाते थे अब सोशल मीडिया पर उन्होंने अपने जैसी सोच वालों के ग्रुप बनाए हैं

Tufail Ahmad | Published On: Jul 08, 2017 10:03 PM IST | Updated On: Jul 09, 2017 01:23 PM IST

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पार्ट 2: वैज्ञानिक सोच की वजह से इस्लाम से दूर होते युवाओं की कहानी

पार्ट 1 से आगे...

केरल के तिरुवनंतपुरम में रहने वाले आशिक भी मुस्लिम युवाओं के इसी दर्जे में आते हैं. वो बताते हैं कि, 'मैं पढ़ने के लिए मदरसे में जाया करता था. वहां मैने लाइब्रेरी में विज्ञान की किताबें पढ़ीं. मैं अपने अध्यापकों से सवाल करता था:अल्लाह को किसने बनाया? लेकिन टीचर इस सवाल का जवाब नहीं देते थे'.

आशिक बताते हैं कि उनके टीचर कहते थे कि तुम पर शैतान का साया है. आशिक ने मदरसे के अध्यापक से जो सबसे तीखा सवाल पूछा था वो था, 'जब ध्रुवों पर छह महीने के दिन और छह महीने की रात होती है, तो रमजान में कोई अपना रोजा कब खोले?'

मदरसे के अध्यापक को भूगोल आता नहीं था. आशिक बताते हैं कि ये सवाल पूछने पर मदरसे के अध्यापकों ने उन्हें बहुत पीटा था.

आशिक के दोस्त भी उन्हें शैतान की औलाद कहते थे. वो उनके साथ क्रिकेट नही खेलते थे. वो बच्चों में भी अलग-थलग पड़ गए थे. सिर्फ उनकी मां उनसे बात किया करती थीं.

आशिक कहते है कि उन्हें पढ़ाया गया था कि वो गैर मुसलमानों से खाना न लें. जब आशिक ने ऐसी नसीहतों पर सवाल उठाया तो मुस्लिम धर्मगुरुओं ने उन्हें कक्षा से निकाल दिया था.

बाद में आशिक की मां ने उन्हें समझाया कि वो ऐसे सवाल न करें नहीं तो पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाएंगे. मां ने कहा कि वो खामोशी से अपनी पढ़ाई पूरी कर लें.

अगले साल से आशिक ने स्कूल में सवाल पूछने बंद कर दिए. अब 29 बरस के आशिक फेसबुक और व्हाट्सऐप पर ऐसे मुस्लिम युवाओं से जुड़ रहे हैं, जो विज्ञान मे दिलचस्पी रखते हैं. जो अपने मजहब की शिक्षाओं पर सवाल उठाते हैं. वो बुनियादी सवाल उठाते हैं कि हम कहां से आए? धरती कैसे बनी? वगैरह...

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प्रतीकात्मक तस्वीर

कोलकाता के अली मुंतजर का किस्सा भी ऐसा ही है. वो मुस्लिम धर्मगुरुओं के खानदान से आते हैं. उनके दादा और पिता इस्लाम के विद्वान थे. लेकिन अली खुद इस्लाम धर्म नहीं मानते. वो खुद को बागी कहते हैं. वो ईद या किसी और दिन भी नमाज नहीं पढ़ते. रमजान में भी वो खुलेआम खाना खाते हैं. इसके लिए वो एक बार पिटते-पिटते बचे थे.

अली कहते हैं कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए वो खुलकर ऐसा कर पाते हैं. अली बताते हैं कि बचपन से ही उनके जेहन में तमाम सवाल उठते थे. लेकिन उनके पिता के दोस्त जो कि धर्म के जानकार हुआ करते थे, वो भी अली के सवालों के जवाब नहीं दे पाते थे.

अली की खाला (मौसी) को उनके पति ने तीन तलाक दे दिया था. इसके बाद उनकी खाला की जिंदगी, जहन्नुम बन गई. अली कहते हैं कि इस्लामिक आतंकवाद के सबसे बड़े पीड़ित खुद मुसलमान हैं.

बोहरा मुसलमान, शियाओं की एक शाखा हैं. कई बोहरी युवा आज इस्लाम और इस्लामिक परंपराओं से दूर हो रहे हैं. हालांकि उनके लिए ये करना आसान नहीं है. बेंगलुरु के एक बोहरी युवा ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बोहराओं में जात-बदर करने की सख्त परंपरा है.

इससे उनकी जिंदगी और कारोबार पर बेहद बुरा असर पड़ सकता है. लेकिन बोहरा समुदाय के भीतर उनके अगुवा या सैयदना को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं. वो कहते हैं कि संस्कृति के लिहाज से वो बोहरा ज्यादा हैं और मुसलमान कम. लेकिन वो खुद को एक्स-मुस्लिम या पूर्व मुसलमान कहने से कतराते हैं.

वो निजी तौर पर इससे ज्यादा परेशान नहीं होते. लेकिन कहते हैं कि इससे उनके मां-बाप, कारोबार के साझीदार को मुश्किल हो सकती है. इसलिए वो खुलकर ये नहीं कहते कि उन्होंने इस्लाम को छोड़ दिया है.

यूपी के मुरादाबाद के रहने वाले डी. जफर, धार्मिक उन्माद पर रिसर्च कर रहे हैं. उन्होंने अंग्रेजी साहित्य की भी पढ़ाई की है. वो हज पर भी जा चुके हैं. अपने जेहन में उठते सवालों का जवाब तलाशने के लिए जफर ने कुरान के तीन अनुवाद पढ़ डाले.

अब उन्होंने इस्लाम धर्म छोड़ दिया है. स्थानीय मुस्लिम धर्मगुरु उनके सवालों के जवाब नहीं दे पाए थे. जवाब देने के बजाय ये धर्मगुरु उन्हें धमकी देते थे कि अगर उन्होंने लोगों को ये बता दिया कि वो नास्तिक हैं, तो वो जात से बाहर कर दिए जाएंगे. उन्हें शहर छोड़कर जाना होगा. एक बार तो एक स्थानीय मुसलमान उन्हें नास्तिक घोषित करने का इश्तिहार देने वाला था. राजनीतिक बीच-बचाव से जफर को इस मुश्किल से निजात मिली.

इसके बाद जफर ने इस्लाम के बारे में बातें करना बंद कर दिया. उनके पास मैसेज आते थे कि वो इस्लाम नहीं पढ़ा सकते हैं. हां, वो चाहें तो अंग्रेजी साहित्य पढ़ा सकते हैं. जफर कहते हैं कि इस्लामिक धर्मगुरु उन्हें हिंदुओं या काफिरों से दूर रहने को कहते थे. बाद में उन्होंने तब्लीगी जमात की बैठकों में भी शिरकत की. लेकिन विरोधियों ने जफर को ऐसा करने से मना किया.

जफर कहते हैं: कुरान में कहीं भी पांच वक्त नमाज पढ़ने का जिक्र नहीं है. कई मुसलमान तीन वक्त नमाज पढ़ते हैं. नमाज पढ़ने में कोई एकरूपता नहीं है. क्योंकि इस्लाम के 200 फिरकों में नमाज पढ़ने के बीस तरीके चलन में हैं.

सेना से रिटायर हुए मेजर राशिद खान, खानदानी धार्मिक मुसलमान परिवार से आते हैं. उनके घर में हर कोई पांच वक्त की नमाज पढ़ता था और रोजे रखता था. मेजर राशिद बताते हैं कि जब वो कॉलेज पहुंचे तो इस्लाम और कुरान को लेकर कई सवाल जहन में उठे. तब जाकर उन्हें पता चला कि इस बारे में तो उन्हें सवाल पूछने तक की इजाजत नहीं है.

फिर उनकी सोच इस्लाम से दूर होने लगी. वो इस बात पर यकीन नहीं कर पाए कि पैगंबर मोहम्मद के इशारे पर चांद के टुकड़े हो गए थे. या फिर बानू कुरैजा कबीले के 700 यहूदियों के कत्ल की वजह से ऐसा हुआ था, जिसके मुखिया ने मोहम्मद साहब के सामने सरेंडर कर दिया था.

muslim women

प्रतीकात्मक

इसके बाद मेजर राशिद खान ने इस्लाम धर्म छोड़ दिया. उनके पिता ने भी उन्हें फटकार लगाई. बड़े भाइयों ने बात करना तक छोड़ दिया. उन्हें लगता था कि इस्लाम धर्म छोड़ने वाले से उनका ताल्लुक रखना ठीक नहीं.

मेजर राशिद खान ने अपने बच्चों की परवरिश बेहद खुले माहौल में की है. वो कहते हैं, 'जब मेरे बच्चे 8-10 साल के थे तब मैंने उन्हें अल्लाह और भगवान समेत तमाम धर्मों के बारे में बताना शुरू किया. मैंने अपने बच्चों से कहा कि वो किस धर्म का पालन करेंगे, ये तय करने के लिए वो आजाद हैं. मैं उन्हें कभी भी कुछ भी मानने को मजबूर नहीं करूंगा. मैंने अपने बच्चों को कुरान भी पढ़ाया.'

मेजर राशिद कहते हैं कि 3-4 साल के बच्चे मदरसों में जाते हैं. वहां उन्हें इस्लामिक कट्टरपंथ सिखाया-पढ़ाया जाता है. उन्हें दूसरे मजहबों से नफरत करना सिखाया जाता है. वो मानते हैं कि मदरसों पर पाबंदी लगनी चाहिए क्योंकि वो नफरत की तालीम देते हैं. वो काफिरों से दूर रहने की सीख देते हैं. मेजर राशिद के बच्चे बेहद रौशन खयाल हैं.

इस श्रृंखला के बाकी दो लेख पढ़ें:

पार्ट 1: वैज्ञानिक सोच की वजह से इस्लाम से दूर होते युवाओं की कहानी

पार्ट 3: वैज्ञानिक सोच की वजह से इस्लाम से दूर होते युवाओं की कहानी

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