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पंडित सुंदर लाल: जान हथेली पर रखकर लिखी अंग्रेजी शोषण की विस्फोटक कहानी

कुछ लोग अपने लिए कुछ पाने की उम्मीद के बिना देश के लिए बड़े काम कर जाते हैं, उनमें पंडित सुंदर लाल भी थे

Surendra Kishore Surendra Kishore Updated On: Sep 26, 2017 11:49 AM IST

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पंडित सुंदर लाल: जान हथेली पर रखकर लिखी अंग्रेजी शोषण की विस्फोटक कहानी

पंडित सुंदर लाल की लिखी चर्चित किताब ‘भारत में अंग्रेजी राज’ पर प्रतिबंध के खिलाफ 1928 में प्रयाग अदालत में सुनवाई चल रही थी. सुंदर लाल के वकील सर तेज नारायण सप्रू ने कहा कि ‘इस किताब में एक लाइन असत्य नहीं है.’ इस पर सरकारी वकील ने यह कहकर लोगों को चौंका दिया कि ‘यह किताब इसीलिए अधिक खतरनाक है.’ अदालत ने प्रतिबंध नहीं हटाया. दरअसल प्रतिबंध के बावजूद वह किताब स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरणा दे रही थी. क्योंकि उसकी प्रतियां चोरी-छिपे बंट रही थीं. हालांकि बाद में राज्यपाल ने 15 नवंबर 1937 को प्रतिबंध हटा लिया.

दरअसल 18 मार्च 1928 को इस किताब के छपने से तीन दिन पहले ही अंग्रेज सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा देने की घोषणा कर दी थी.उसे पता चल गया था कि उसमें शासन के खिलाफ कितनी विस्फोटक सामग्री है. लेखक सुधीर विद्यार्थी ने लिखा है कि ‘सुंदर जी के बाद इतिहास का कोई ऐसा दूसरा विद्वान पैदा नहीं हुआ जो अंग्रेजों के तथाकथित संसदीय अहम पर चोट करता हुआ कोई दूसरी वैसी किताब लिखकर पूरे यूरोप पर पटक देता.’

प्रतिबंध के बावजूद इस किताब की 1700 प्रतियां ग्राहकों तक पहुंचा दी गई थीं. कुछ प्रतियां जब्त भी हुईं. प्रतिबंध हटने के बाद इसकी ग्यारह हजार प्रतियां छपीं. उस जमाने में किसी किताब की इतनी अधिक प्रतियों का छपना एक रिकॉर्ड था. अब तो भारत सरकार का प्रकाशन विभाग भी उसे छापता है और अक्सर नए संस्करण निकलते रहते हैं.

स्वतंत्रता सेनानी पंडित सुंदर लाल ने तीन साल के एकांतवास में यह किताब लिखी थी. इलाहाबाद के क्रांतिकारी बाबू नित्यानंद चटर्जी के घर में यह काम हुआ. उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के खतौनी कसबे के इमलीतल्ला मुहल्ले में 26 सितंबर 1886 को जन्मे सुंदरलाल को सत्ता से कभी मोह नहीं रहा. उनका निधन 9 मई 1981 को हुआ.

उनकी किताब से दो उद्धहरण महत्वपूर्ण हैं.ये उद्धहरण इस देश की विदेशियों द्वारा लूट का इतिहास बताते हैं.

सन 1700 में फ्रांसीसी यात्री बरनियर ने लिखा था कि ‘यह हिन्दोस्तान एक ऐसा अथाह गड्ढा है, जिसमें संसार का अधिकांश सोना और चांदी चारों तरफ से, अनेक रास्तों से आ-आकर जमा होता है और जिससे बाहर निकलने का उसे एक भी रास्ता नहीं मिलता.’ पर सन 1900 में ब्रिटिश पत्रकार और नेता विलियम डिगबी ने लिखा कि ‘ बीसवीं सदी के शुरू में करीब दो करोड़ मनुष्य ब्रिटिश भारत में ऐसे हैं, जिन्हें किसी भी समय पेट भर अन्न नहीं मिल सकता... इस अधःपतन की दूसरी मिसाल इस समय किसी सभ्य और उन्नतिशील देश में कहीं पर भी दिखाई नहीं दे सकती.’

एक समय सोने की चिड़िया रहे इस देश को किस तरह विदेशियों ने भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था, उसी के कारणों का वर्णन पंडित सुंदर लाल ने अपनी किताब में किया है.

1931 में इलाहाबाद में अस्पताल के उद्घाटन में सुंदर लाल दी. फोटो सोर्स- फेसबुक

1931 में इलाहाबाद में अस्पताल के उद्घाटन में सुंदर लाल. फोटो सोर्स- फेसबुक

किस तरह अंग्रेजी शासकों ने फूट डालकर राज किया, उसका एक विवरण सुंदर लाल के शब्दों में, ‘सांप्रदायिक झगड़ों की जड़ में मुख्य चीज अंग्रेज शासकों की फूट डालो और शासन करो की नीति थी. सन 1907 में पंजाब से इसी विषय पर एक छोटी सी किताब उर्दू में प्रकाशित हुई थी जिसका नाम था ‘बंदरबांट’. उसमें अंग्रेज शासकों के ही ये स्पष्ट शब्द उद्धृत किए गए थे कि भारतीय ब्रिटिश शासन की नीति फूट डालो और शासन करो ही होनी चाहिए. दूसरी ओर अनेक ऐसी किताबें देश भर में फैलाई जा रही थीं जिनमें ऐतिहासिक घटनाओं और दोनों धर्मों के सिद्धांतों को तोड़-मरोड़कर दोनों के दिलों में एक दूसरे के प्रति नफरत पैदा करने की कोशिश की गई थी. स्वाधीनता आंदोलन की उन्नति के रास्ते में यही सबसे बड़ी रुकावट थी.’

पंडित सुंदर लाल ने हमेशा सांप्रदायिक सद्भाव का ध्यान रखा और अपनी किताब को हिंदू-मुस्लिम एकता के आदि प्रवर्तक कबीर साहब की पुण्य स्मृति में सादर समर्पित किया. सुंदर लाल ने राजनीति यानी देश सेवा की शुरुआत 1906 में गरम दल से की. उन्होंने छात्रों-युवकों का संगठन तैयार किया और ‘कर्मयोगी’ पत्र का संपादन किया. कर्मयोगी पर सरकार ने रोक लगा दी.

लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने वालों में पंडित सुंदर लाल भी थे

संन्यासी बन कर कुछ दिनों तक पहाड़ पर रहने के बाद सुंदर लाल 1916 में गांधी के प्रभाव में आकर फिर राजनीति में आ गए. इससे पहले होमरूल लीग बनाने वालों में पंडित जी भी थे. फिर उन्होंने ‘भविष्य’ का प्रकाशन शुरू किया.

महात्मा गांधी के कहने पर सुंदर लाल ने झंडा सत्याग्रह का नेतृत्व किया. वे गांधीवाद और क्रांति को एक दूसरे का पूरक मानते थे. उन्होंने आजादी के आंदोलन में अन्य तरह से भी योगदान दिया. वे कर्मयोगी थे.उन्हें कर्मवीर भी कहा गया.

आजादी के दशकों बाद भी पंडित जी जीवित रहे मगर कभी यह खबर नहीं मिली कि वे सत्ता की राजनीति के इर्दगिर्द देखे गए हों. जो कुछ लोग अपने लिए कुछ पाने की उम्मीद के बिना देश के लिए बड़े काम कर जाते हैं, उनमें पंडित सुंदर लाल भी थे.

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