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खेत-खलिहानों में नहीं, अब डिजिटल दुनिया में ज्यादा छाया है आज़ादी का जज्बा...

भारतीय सेना के सैल्यूट-सेल्फी डिजिटल मुहिम को करोड़ों नागरिकों का समर्थन मिला

Tarun Kumar Updated On: Aug 15, 2017 05:03 PM IST

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खेत-खलिहानों में नहीं, अब डिजिटल दुनिया में ज्यादा छाया है आज़ादी का जज्बा...

15 अगस्त की तारीख! ऐसी तारीख जो हमारी चेतना में सांस लेती असंख्य चाहतों को हकीकत की करवटें लेने की ऊर्जा प्रदान करती रही है. ऐसी तारीख जिसका इतिहास देश के भूगोल को देश-प्रेम की अनगिनत जीवंत छवियों से आबाद कर आज़ाद होने का मतलब और मर्म समझाती रही है.

देश की माटी में बदलाव का हौसला पैदा करने वाली यह तारीख अब जश्ने-आजादी की पुरानी लीक से हटते हुए डिजिटल इजहार की राह पकड़ चुकी है. चौरस खेत-खलिहानों में खूबसूरत बंदनवार के बीच तिरंगा फहराने की पारंपरिक परिपाटी का गवाह बनने की दीवानगी कमजोर पड़ती जा रही है. उसकी जगह सीमाहीन डिजिटल स्पेस में देशप्रेम के इजहार की औपचारिकता ने ले ली है.

ऐसी औपचारिकता जहां पौ फटने से पहले गांधी टोपी और कुर्ता-पायजामा पहनकर ध्वजारोहण स्थल पर पहुंचने के राष्ट्रवादी कर्तव्य की जगह बिस्तरे पर लेटे-लेटे अलसाए मन से सोशल नेटवर्क पर तिरंगा की दो-चार तस्वीरें साझा कर आजादी के जश्न में शरीक होने जाने के आभासी गर्व से भर जाने की त्वरित सुविधा उपलब्ध है. जाहिर है, सूचना क्रांति के इस दौर में आजादी का जज्बा खेत-खलिहानों, स्कूली प्रांगणों के दायरे से निकलकर सीमाहीन डिजिटल स्पेस में कहीं ज्यादा कुलांचे भर रहा है.

independence day celebration

वे भी क्या दिन थे, जब हमारे स्कूलों से निकलीं प्रभात फेरियां गांव की गलियों, खेत-खलिहानों, नुक्कड़ों, चैराहों से गुजरते हुए चरम कुतूहल का नजारा पेश कर यादों में दर्ज हो जातीं. पूरा गांव-मुहल्ला सुराजियों के तीर्थ स्थान जैसा मनभावन दिखता. झक सफेद गांधी टोपी, धोती-कुर्ता में सजे मास्टर साहब आजादी के अनुशासित मार्गदर्षक और कुर्ता पायजामा पहने उल्लसित विद्यार्थी आजादी के नन्हें सिपाही दिखते! तब बाजारू तिरंगा का चलन भी नहीं के बराबर था. अपने हाथों से कागज व कपड़े के तिरंगा बनाने की चुनौती में कितना निश्छल देशप्रेम भरा था.

ध्वजारोहण स्थल को नन्हें सुकुमार हाथों से फूल-पत्तियों और झालरों से सजाने की उस्तादी तब कितनी कल्पनाशील हो जाती. मां-बाबूजी, दादी-दादाजी के सचेत मार्गदर्शन में इस पावन तैयारी का दायरा कितना निस्सीम था. गोबर से लिपे साफ-सुथरे स्कूली प्रांगण में सूरज निकलने से पहले उपस्थिति दर्ज कराने का अनुशासन किस कदर आजादी की रक्षा का फर्ज समझाता था.

महात्मा गांधी जिंदाबाद, चाचा नेहरू अमर रहे, नेताजी सुभाषचंद्र बोस अमर रहें, भगत सिंह जिंदाबाद जैसे इतिहासबोधक नारों से गांव का गगन कितना गुंजायमान हो जाया करता. ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा..... छोड़ो कल की बातें.... नन्हा मुन्ना राही.... जैसे तराने तो आज भी टीवी पर बजते हैं, पर उस दौर में कानफाड़ू लाउडस्पीकर पर ये गाने हमारे रग में कितना जोश भरते थे.

 

हेड मास्टर साहब के प्रेरक लच्छेदार भाषण के बाद प्रसाद ग्रहण की भोली होड़ का क्या कहना! और प्रसाद भी क्या! मुट्ठी भर बूंदी या एकाध लड्डू! फिर भी न अभाव की कसक, न अधूरापन का बोझिल बोध. आज के बच्चों के जेहन में ऐसी भोली तस्वीरों का जखीरा कहां से तैयार होगा, जब उन्हें देश का सिस्टम पहले ही बता देता है कि 15 अगस्त खालिस अवकाश का दिन है.

यह आजादी के जलसों में शरीक होने की तारीख की बजाए ‘देर से बिस्तरे से उठने’ का मौका है. स्कूलों, दफ्तरों में सार्वजनिक अवकाश पहले भी होते थे, आज भी होते हैं. पर, पहले और आज में फर्क है. 15 अगस्त हो या 26 जनवरी, हम पार्कों, मैदानों में मनाए जाने वाले जलसों में प्रतीकात्मक उपस्थिति की बजाए मालों, रेस्तरांओं, बाजारों में तफरीह की योजना पर अमल करते हैं.

A Muslim man waves an Indian flag during a march to celebrate India’s Independence Day in Ahmedabad, India, August 15, 2016. REUTERS/Amit Dave - RTX2KWWX

आजादी के जज्बे को डिजिटल लिबास पहनाने की वजह है सूचना क्रांति की सुविधाओं का हमारी बेसब्र उंगलियों पर उपलब्ध होना. जब हाथ में हाइटेक मोबाइल हो तो ध्वजारोहण स्थलों पर जाकर देश प्रेम के इजहार की भला क्या जरूरत है? पुरानी पीढ़ी हो या नई पीढ़ी, सभी डिजिटल स्पेस में विचरण के आदी हैं. ट्यूटर, फेसबुक, लिंक्डइन, इन्स्टाग्राम, यू-ट्यूब जैसे नेटवर्क और टूल्स उन्हें मेसेज, चैटिंग, अपलोड, डालनलोड, सर्फिंग, शेयरिंग, मेलिंग, एप-शेयरिंग आदि जैसी इंटरेक्टिव सुविधाओं से लैसकर दुनिया के भूगोल को मुट्ठी में समेट लेने की अकूत क्षमता से लैसे करते हैं.

मनचाहे तकनीकी सृजन, संपादन और कतर-ब्योंत की सुविधाएं उन्हें देशभक्ति की अभिव्यक्ति के असीमित आभासी साधन देते हैं. गाल, बाजू, पीठ, सीने पर फोटोशॉप और अन्य हायटेक तकनीकी की मदद से तिरंगा, लाल किले, इंडिया गेट की तस्वीरें उकेरकर डिजिटल स्पेस में साझा करने की कवायद जोर पकड़ रही है. परिवारों, दोस्तों, परिचितों से बने हमारे सोशल नेटवर्क पर देशभक्ति आभासी जज्बे के चरम पर इस कदर पहुंच जाती है कि हम देश के प्रति प्रेम का इजहार करने की बजाए मोबाइल के स्टोरेज से ऐसे फाइल्स और फोटोज को डिलीट करने के झंझट में फंस जाते हैं. मन तब देशप्रेम के डिजिटल इजहार और आदान-प्रदान की पराकाष्ठा पर पहुंचकर एक ऊब में तब्दील हो जाता है.

इस तारीख के डिजिटलीकरण में सरकार और कॉरपोरेट सभी का योगदान है. अगर पीएम मोदी लोगों को 15 अगस्त के अपने भाषण के लिए ट्विटर पर सुझाव मांग रहे हैं, तो उबेर, स्नैपडील, जौमोटो, पेटीएम, यो यो, फ्लिपकार्ट, रिलायंस जैसी कंपनियां भी इस तारीख की डिजिटल ब्रांडिंग में एक दूसरे से होड़ ले रही हैं.

Independence Day eve

डिजिटल स्पेस में देशप्रेम के इस विस्फोट में हिंदी भाषा अंग्रेजी को पटकनी दे रही है. गत साल अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर स्टोरीनामिक्स नामक एक अग्रणी कंसल्टिंग फर्म, जो बिजनेस स्टोरीटेंलिंग के पारंपरिक और डिजिटल मॉडल्स पर काम करती है, ने अपने शोध निष्कर्ष में दिलचस्प तथ्य पेश किया. कंपनी के मुताबिक साल 2016 में हिंदी डिजिटल स्पेस में देशभक्ति का सबसे ज्यादा बोलबाला रहा.

तिरंगा, भारतीय फौज, आतंकवादियों के खिलाफ सेना की कार्रवाई, सर्जिकल स्ट्राइक आदि जैसे विषय छाए रहे. भारतीय सेना के सैल्यूट-सेल्फी डिजिटल मुहिम को तो करोड़ों नागरिकों का समर्थन मिला. यह ट्रेंड आजादी की तारीख पर चरम पर है. जाहिर है, अब देश प्रेम के इजहार के लिए मैदानी परेडों में साझेदारी के बजाए सोशल नेटवर्क की तिंरगा यात्रा में भाग लेना ज्यादा आसान है.

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