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निदा फाज़ली: एक नायाब शायर, जो जीने के बजाय जिंदा रहने में यकीन रखता

रोटी, चटनी, फूंकनी, खुर्री-खाट, कुण्डी कुलमिलाकर मां से जुड़े हर प्रतीक के सहारे निदा ने मां को जिया है

Nazim Naqvi Updated On: Oct 12, 2017 06:27 PM IST

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निदा फाज़ली: एक नायाब शायर, जो जीने के बजाय जिंदा रहने में यकीन रखता

वो मेरा हबीब शायर, फिर सामने आकर बैठ गया. अब वह कुछ पूछता नहीं है, न ही कुछ बताता है, बस जैसे ही हिम्मत करके उनकी आंखों से टकराता हूं, वह मुस्कुरा देती हैं. इन आंखों में विनम्रता है, विनयशीलता है, जो अभी भी पैदा होने के इंतजार में है.

बंद कमरा

छटपटाता सा अंधेरा

और

दीवारों से टकराता हुआ मैं !

मुन्तजिर हूं मुद्दतों से अपनी पैदाईश के दिन का

पनी मां के पेट से

निकला हूं जब से मैं!!

खुद अपने पेट के अंदर पड़ा हूं.

आज अगर निदा फाजली होते तो 78 बरस के होते. एक ऐसा शायर जिसने अपने अपने युग की ज़बान में, अपनी दुनिया से बात की. ये बात सही है कि सबकी पसंद अपनी-अपनी हो सकती है, किसी को कोई पसंद है तो किसी को कोई, लेकिन पसंद से मेरा मतलब वह चीज़ है जिसे आप बार-बार देखें या पलट-पलट कर उसे देखने की लालसा कहीं भीतर जाग उठे. ये समालोचना से परे की बात है. मेरे नजदीक, निदा फाजली हमेशा एक ऐसे ही शायर हैं और रहेंगे.

मुझे मालूम है कि अभी यही कोई पौने दो बरस पहले (8 फरवरी 2016) उन्होंने ‘ज्यों की त्यों रख दीनी चदरिया’ की तरह अपना जिस्म छोड़ा और अपने शब्दों का वह बेशकीमती लबादा ओढ़ लिया है जिसे, पिछले 60-65 वर्षों से वह बुना करते थे.

ये दिल कुटिया है संतों की, यहां राजा-भिखारी क्या,

वो हर दीदार में ज़रदार है, गोटा-किनारी क्या.

निदा फाजली अपने व्यक्तित्व से देखने वाले को भटकाते बहुत हैं, लेकिन आज मैं उनकी एक नहीं चलने दूंगा. ये बात भी सही है कि निदा खुद अपनी कोख से निकलने के लिए जिंदगीभर छटपटाते रहे हैं लेकिन जब उन्हें मां की कोख का खयाल आया तो एक ऐसी कालजयी नज्म रच दी जिसकी मिसाल ढूंढना मुश्किल है. वैसे तो पिता पर लिखी हुई उनकी नज्म, उनका एक और शाहकार है लेकिन उसपर बात फिर कभी.

उर्दू साहित्य के एक बड़े आलोचक प्रोफेसर वारिस अल्वी कहते हैं, ‘निदा फाजली की नज्म ‘मां’ को मैं उर्दू की चंद बेहतरीन नज्मों में शुमार करता हूं. और मेरे नजदीक नज्मों का कोई भी संकलन इसको शामिल किए बगैर मुमकिन ही नहीं है’. हालांकि ‘मां’ विषय पर लिखने वालों ने बेशुमार लिखा है. समकालीन शायर मुनव्वर राना ने तो मां पर इतने शेर कहे हैं कि अलग से एक किताब प्रकाशित कर सकते हैं. इसके बावजूद निदा फाजली की नज्म की चमक कम नहीं हो पाती.

प्रोफेसर अल्वी निदा की नज्म के साथ फिराक गोरखपुरी की नज्म ‘जुगनू’ (जो मां विषय पर ही आधारित है) को, ‘मां’ विषय पर लिखी गई बेहतरीन नज्मों में रखते हैं. फिराक ने मां को नहीं देखा था. निदा फाजली की मां, उन्हें छोड़कर पकिस्तान चली गई थीं. फिराक बेचैन हैं कि कैसे वह अपनी मां को, अपनी दुनिया में ले आएं और उसे अपने खिलौने दिखाएं. निदा फाजली जानते हैं कि विभाजन कुछ इस तरह से हो गया है की वह अपनी जिंदा मां को ‘बस’ याद करने पर मजबूर है.

'मां' क्या होती है? 20 साल के फिराक ये सवाल करते हैं तो करीब उसी उम्र के निदा फाजली उन्हें बताने की कोशिश करते हैं. फिराक जब अपने खयालात को शब्दों के कपडे़ पहनाते हैं तो बरसात, जुगनू, आंसू यानी कुदरत का सहारा लेकर अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हैं. लेकिन जब निदा फाजली उन्हें बताते हैं कि मां क्या होती है? तो अपने आस-पास बिखरी तस्वीरों से उसका चेहरा उकेरते हैं. आइए पहले फिराक साहब की नज्म ‘जुगनू’ का कुछ अंश पढ़ते हैं:

वो बेपनाह घटा वो भरी-भरी बरसात

वो सीन देख के आंखें मिरी भर आती थीं

मिरी हयात ने देखी हैं बीस बरसातें

मेरे जनम के ही दिन मर गई थी मां मेरी

वो मां, की शक्ल भी जिस मां को मैं न देख सका

जो आंख भर के मुझे देख भी सकी न वो मां

मैं वो पिसर हूं जो समझा नहीं कि मां क्या है

मुझे खिलाइयों और दाइयों ने पाला था

वो मुझसे कहती थीं जब घिर के आती थी बरसात

जब आसमान में हर सू घटाएं छाती थीं

बवक्त-ए-शाम जब उड़ते थे हर तरफ जुगनू

दिए दिखाते हैं ये भूली-भटकी रूहों को

मजा भी आता था मुझको कुछ उनकी बातों में

मैं उनकी बातों में रह-रह के खो भी जाता था

पर इसके साथ ही दिल में कसक सी होती थी

ये शाम मुझको बना देती काश एक जुगनू

तो मां की भटकी हुई रूह को दिखाता राह

कहां-कहां मेरी खातिर भटक रही होगी

कभी-कभी तो मेरी हिचकियां से बांध जातीं

कि मां के पास किसी तरह मैं पहुंच जाऊं

और उसको राह दिखाता हुआ मैं घर लाऊं

दिखाऊं अपने खिलौने दिखाऊं अपनी किताब

कहूं कि पढ़ के सुना तो मेरी किताब मुझे

ये बात जबकी है, जब मेरी उम्र ही क्या थी

नजर से गुजरी थीं कुल चार-पांच बरसातें

फ़िराक साहब अपने अहद के एक बड़े शायर हैं. कुदरत (प्रकृति) के साथ हमजोली करते हुए, वह कायनात (सृष्टि) के राज खोलते है. लेकिन अपनी नज्म ‘जुगनू’ में, ‘मां’ को समझने-समझाने में 365 पंक्तियों का सहारा लेते हैं. वहीं निदा फाजली जो गजल के फॉर्मेट में नज्म कहने की कोशिश करते हैं, सिर्फ दस पंक्तियों में, मां का पूरा व्यक्तित्व उतार के रख देते हैं. उनकी नज्म भी मुलाहिजा करें:

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां

याद आती है चौका, बासन, चिमटा, फूंकनी जैसी मां

बांस की खुर्री खाट के ऊपर, हर आहट पर कान धरे

आधी सोयी आधी जागी, थकी दुपहरी जैसी मां

चिड़ियों की चहकार में गूंजे राधा-मोहन अली-अली

मुर्गे की आवाज से खुलती घर की कुण्डी जैसी मां

बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सबमें

दिनभर एक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां

बांट के अपना चेहरा-माथा-आंखें, जाने कहां गयी

फटे पुराने एक एल्बम में, चंचल लड़की जैसी मां

दरअसल निदा फाजली हिंदुस्तानी तहजीब में ‘वाचिकी-परंपरा’ के शायर हैं. वाचिकी के लिए ये बेहद जरूरी है की बात चित्रों के जरिए की जाय. रोटी, चटनी, फूंकनी, खुर्री-खाट, कुण्डी कुलमिलाकर मां से जुड़े हर प्रतीक के सहारे निदा ने मां को जिया है.

निदा फाजली दोहों की सरपरस्ती करते हैं इसीलिए प्रतीकों से दिलचस्पी रखते हैं. मिसाल के तौर पर जब उन्हें दो पीढ़ियों के बीच का फर्क बताना होता है और इसी बहाने कुछ मशविरा देना होता है तो वह ‘दो खिड़कियां’ नज्म गढ़ते हैं:

आमने-सामने दो नई खिड़कियां

जलती सिगरेट की लहराती आवाज में

सुई-डोरे के रंगीन अल्फाज में

मशवरे कर रही हैं कई रोज से

शायद अब

बूढ़े दरवाज़े सर जोड़कर

वक्त की बात को वक्त पर मान लें

बीच की टूटी-फूटी गली छोड़कर

खिड़कियों के इशारे को पहचान लें

निदा फाजली, एक नायाब शायर, जो जीने के बजाय जिंदा रहने में यकीन रखता है. निदा भाई, आपको सालगिरह मुबारक. यूं ही मुस्कुराते रहिए.

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