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यमुना के गोताखोर: जो यमुना को फिर बना रहे हैं 'छोटी गंगा'

राजू कहते हैं, 'बस इतना ही है कि अपनी तरफ से कोई कमी नहीं करते, जैसे भी बन पड़ता है सफाई करते हैं'

Nidhi Nidhi Updated On: Jul 10, 2017 11:10 AM IST

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यमुना के गोताखोर: जो यमुना को फिर बना रहे हैं 'छोटी गंगा'

याद करिए 'रन' फिल्म में विजय राज के उस आइकॉनिक दृश्य को जिसमें विजय राज कहतें हैं, 'अरे हमे छोटी गंगा बोल के गंदे नाले में कूदा दिया.'

जी हां... उस फिल्म में विजय राज इलाहाबाद से दिल्ली आते हैं. वैसे दिल्ली में ऐसी 'छोटी गंगा' मार्का गंदे नालों की कमी नहीं है. ये सभी गंदे नाले दिल्ली की यमुना नदी में मिलते हैं. हालत ये है कि आप भी कभी यमुना के ऊपर से गुजरते हुए अपनी नाक को रुमाल से ढकते होंगे.

लेकिन इसी दिल्ली में राजू और संजय जैसे कुछ लोग हैं जो अपने हिस्से की यमुना को ‘गंदे नाले’ से ‘छोटी गंगा’ में बदलने की कोशिश में लगे हैं. वो भी किसी सरकारी तमगे और आर्थिक मदद के बिना.

'बाहर से लोग आते हैं, कहते हैं कहां है यमुना? हम नीचे दिखाते हैं तो लोग कहते हैं ये यमुना है ये तो नाला है. अब बताइए दिल्ली की ऐसे नाक कट रही है. इतना सुंदर शहर, दूर-दूर से आकर लोग यहां रहते हैं लेकिन नदी...' ये कहते हुए राजू चुप होकर यमुना की तरफ टकटकी बांधे हुए देखते हैं.

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यमुना में गोता लगाने वाले राजू [तस्वीर: मेघातिथि कबीर]
यमुना के गोताखोर

राजू यमुना के गोताखोर हैं. ये पहचान बताते हुए उन्हें जरा भी तकलीफ नहीं होती, बल्कि उनकी बातों से लगता है कि उन्हें अपने काम पर कहीं ज्यादा गर्व है. निराशा है तो सरकारों के दिए झूठे दिलासे से. राजू और संजय ये दोनों यमुना में गोते लगाकर इसके एक घाट की जितनी हो सके सफाई करने की कोशिश करते हैं. राजू और संजय निज़ामुद्दीन ब्रिज के निचे साईं घाट के आस-पास के इलाके में रहते हैं.

यमुना दिल्ली के वज़ीराबाद बराज से पहले अपने प्राकृतिक बहाव में बहती है. दिल्ली के बहुत सारे नालों का निकास इस नदी में होता है. जिसमें मुख्य रूप से नजफगढ़ का नाला है. यमुना की 40 प्रतिशत गंदगी का श्रेय इस नाले को जाता है.

दिल्ली और इसके आस-पास 22 किलोमीटर लंबाई में यमुना भारत की सबसे अधिक प्रदूषित नदी बन जाती है. इसे लगभग ‘मृत’ नदी घोषित किया जा चुका है.

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ इंजीनियरिंग साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के हिसाब से 'सबसे अच्छी तकनीक का प्रयोग करें तब भी यमुना के प्रदूषित जल को वापस सामान्य इस्तेमाल के लायक नहीं बनाया जा सकता है. पारम्परिक तरीके से तो किसी भी हालत में इसमें घुले टोटल डिसॉल्वड सॉलिड (टीडीएस) को अलग नहीं किया जा सकता है.'

इन्हीं वैज्ञानिक निष्कर्षों से मिलती-जुलती बात राजू भी बताते हैं. राजू लगभग 50 की उम्र के हैं. वो अपने 40 साल के अनुभव को बताते हैं. उन्होंने दिल्ली की बदलती सरकारें देखीं हैं और यमुना की सफाई के नाम पर सरकारों की नाकाम कोशिशों को भी देखा है.

वो कहते हैं, 'पहले ऐसा नहीं था. वो फिर कहते हैं अब किसी को भरोसा नहीं होगा इसे देखकर कि कभी ऐसे किनारे बैठ पानी में हाथ डालते थे तो कई सारी मछलियां कूदती थीं. अब... अब क्या रहेंगी यहां मछलियां अब तो पानी ही जहर बन गया है.'

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[तस्वीर: मेघातिथि कबीर]
पानी अब पानी नहीं जहर बन गया है

राजू बताते हैं, 'कहा जाता था, यहां यमुना के तट पर पूजा-पाठ करने से, डूबकी लगाने से पितरों को मोक्ष मिलता था. लेकिन अब देखिए जरा कोई पानी में डूबकी लगा ले तो उल्टा पाप चढ़ जाए.'

वहीं राजू के साथ काम करने वाले संजय का कहना है, 'बस बचपन यहीं शुरू हुआ है, हमने तो शुरू से ही कचरा देखा यहां लेकिन इतना नहीं जितना आज है. ऐसे झाग नहीं दिखता था पहले. अब हम क्या करें बस सफाई करते हैं. पानी के अंदर से पॉलीथिन हो गया, जो कूड़ा-कचरा हो गया सब निकालते हैं. बस यही कि हम अपने तरफ से पूरी कोशिश करते हैं.' संजय की उम्र लगभग 30 के करीब है.

राजू कहते हैं, हम यहां रहते हैं तो सबकुछ हम ही देखते हैं. धीरे-धीरे हमारे ही आस-पास के लोग भी सफाई करने लगे.'

अब यमुना के ये गोताखोर धीरे-धीरे 10-12 की संख्या में हो गए हैं. यहां नदी में कोई डूब जाए तो उसे बचाना, कोई लाश आ जाए उसे निकालना, कुछ लोग कचरा डालें तो उन्हें रोकते भी हैं.

राजू कहते हैं, 'हम तो किसी को कचरा-वचरा डालते देखते हैं तो टोकते हैं लेकिन कई बार वही लोग हमें डांटकर चले जाते हैं. हम भी क्या करें, बस इतना ही है कि अपनी तरफ से कोई कमी नहीं करते, जैसे भी बन पड़ता है सफाई करते हैं.'

इन्हीं गोते लगानेवालों में से एक मुश्ताक बताते हैं, कई बार कान में, सीने में दर्द होता है, अब केमिकल घुला है पानी में तो शरीर कितना बर्दाश्त करेगा? लेकिन हम जैसे सुबह-सुबह अपने दांत को साफ करते हैं वैसे ही यमुना को साफ करते हैं.

वो कहते हैं, 'हम जबतक दिल्ली में रहेंगे ऐसे ही सफाई करते रहेंगे. हम यहां ध्यान देना छोड़ दें तो कल से लोग यहां गंदा फैलाना शुरू कर देंगे.'

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बाहर के लोग खुश होते हैं तो देखकर अच्छा लगता है

यह सवाल पूछने पर कि आप लोगों को क्या मिलता है इसके बदले में?

राजू हंसते हुए कहते हैं, 'मिलता है.... बस यही मिलता है कि लोग बाहर से आते हैं और यहां देखकर खुश होते हैं. तो हमें भी खुशी मिलती है.' वो कहते हैं, हमारी दूसरों से भी यही अपील है कि लोग कंधे-से-कंधा मिलाकर यमुना जी की सफाई के लिए आगे आएं. और फिर मुस्कुराते हुए कहते हैं, हम तो आम पब्लिक हैं, हमें किसी पार्टी, पॉलिटिक्स से क्या मतलब- हम तो यमुना के गोताखोर हैं.

दिल्ली बेस्ड यमुना को लेकर कैंपेन करनेवाले और डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर मेघातिथि कबीर हैं, जिन्होंने इन यमुना के गोताखोरों के काम पर फिल्म बनाई है. जिससे इनके बारे में लोगों तक जानकारी पहुंची.

यमुना का पहला भाग हिमालय के हिस्से वाला है, इसकी लंबाई यमुनोत्री से हरियाणा के तेजवाला बराज तक लगभग 172 किलोमीटर है. इस विस्तार में यह नदी लगभग प्रदूषण रहित है.

अगले 224 किलोमीटर तक यमुना हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छोटे -छोटे शहरों से गुजरते हुए दिल्ली तक पहुंचती है. इस हिस्से में नदी आंशिक रूप से प्रदूषित है, लेकिन इसके पानी को आराम से खेती-बाड़ी और इसे साफ करके पीने के काम में लाया जा सकता है.

एमिटी यूनिवर्सिटी, एप्लाइड केमिस्ट्री विभाग के आर. एस दुबे बताते हैं, 'जल प्रदूषण का स्तर सामान्य से कई गुणा अधिक है, यह सिंचाई के लिए प्रदूषण नियंत्रण विभाग द्वारा बताए गए स्तर से भी ज्यादा है. इसका मतलब है कि इसके पानी का इस्तेमाल किसी भी मानवीय गतिविधि में नहीं किया जा सकता है.'

नदी के पानी का सबसे आदर्श pH मान 7.4 के आसपास होता है वहीं यमुना के पानी का pH मान अलग-अलग जगहों से इकठ्ठा किए गए नमूनों में 7.5 से 11.8 तक है. जहां BOD स्तर बहुत बढ़ा हुआ है वहीं, DO का स्तर बैक्टीरिया द्वारा ऑक्सीजन उपयोग में लाए जाने के कारण गंभीर रूप से घटा हुआ है.

एक प्रयोग में यह देखा गया कि यमुना का DO शून्य के बराबर है. दिल्ली में बह रही यमुना के पानी की गुणवत्ता ‘मृत’ के स्तर का है, इसका मतलब है कि इस पानी का इस्तेमाल किसी भी घरेलू, औद्योगिक या कृषि के कामों में भी नहीं किया जा सकता है.

जिस तरह यमुना 'यमुना एक्शन प्लान' के नाम पर हजारों करोड़ रुपए बहा दिए गए, 90 से चल रही इस योजना के नाम पर तो तत्कालीन सभी सरकारें कुछ न कुछ काम होता हुआ दिखाती हैं लेकिन अब जो दिखता है वो केवल यमुना में फैला हुआ काला झाग है.

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सफाई के नाम पर कॉस्मेटिक सर्जरी

पूरी तरह से देखा जाए तो यमुना की 'कॉस्मेटिक सर्जरी' हो रही है. ये नदी अब इस हालत में नहीं है कि सरकारें काम के नाम पर, घाट के किनारे आरती करा दे, बैठने की जगह बना दें, (जैसा कि गंगा के साथ हो रहा है) और वो उनके काम की गिनती में आ जाएगा. यमुना की सफाई के नाम पर किया जा रहा दिखावा अब किसी की नजरों से बच तो नहीं सकता है.

उम्मीद और सीखने की जरूरत है तो राजू, संजय, मुश्ताक जैसे लोगों से जो बिना किसी सरकारी मदद के यमुना की सफाई के प्रयास में लगे हैं. और बिना किसी उम्मीद के ऐसे ही कोशिश करते रहना चाहते हैं.

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