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पशु-पक्षियों के बर्ताव के बारे में आप जो जानते हैं, वो कितना सही है?

मछलियां गूंगी नहीं होती हैं. वो भी कई जीव-जंतुओं के जैसे तरह-तरह की आवाजें निकालती हैं. लेकिन हम मछलियों की आवाज सुन पाने में असमर्थ हैं

Maneka Gandhi Updated On: Oct 30, 2017 04:58 PM IST

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पशु-पक्षियों के बर्ताव के बारे में आप जो जानते हैं, वो कितना सही है?

मिथक: पक्षियों के चूजों (बच्चों) को अगर इंसान छू ले तो, चूजों की मां उन्हें त्याग देती है.

सच्चाई: ज्यादातर पक्षियों में गंध ग्रंथियां विकसित नहीं होतीं, यानी उनमें गंध को समझने या महसूस करने की काबिलियत नहीं होती है. ऐसे में वे इंसानी गंध को भी नहीं पहचान पाते हैं. लेकिन अगर आप घोंसले में बैठे चूजे को छू लें, और पक्षी (चूजों की मां) हमें ऐसा करते देख ले, तो वो इंसानी दखल से डर कर चूजों को बेसहारा छोड़कर चला जाता है.

मिथक: मछलियों का शारीरिक विकास उस टैंक या तालाब के आकार के मुताबिक होता है जिसमें वो रहती हैं. लिहाजा हम एक टैंक में जितनी चाहें उतनी मछलियां पाल सकते हैं.

सच्चाई: मछलियों के शारीरिक विकास का टैंक, तालाब या अक्वेरियम के आकार से कुछ भी लेना देना नहीं है. दरअसल मछलियों का आकार उनके अनुवांशिक गुणों से तय होता है. इसलिए टैंक का आकार छोटा होने पर मछलियां परेशान होकर खतरनाक हरकतें करने लगती हैं, वहीं ज्यादातर मछलियां बीमार पड़ जाती हैं.

मिथक: रैटल स्नैक हमला करने से पहले झुनझुने जैसी आवाज पैदा करते हैं.

सच्चाई: रैटल स्नैक हमला करने या काटने से पहले चेतावनी नहीं देते. वो झुनझुने जैसी आवाज तभी पैदा करते हैं, जब वे डरे हुए होते हैं. झुनझुने की आवाज के जरिए वो सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं

मिथक: शिकारी से डरकर शुतुरमुर्ग अपना सिर रेत या मिट्टी में छुपा लेते हैं.

सच्चाई: ज्यादातर जीव-जंतुओं की तरह शुतुरमुर्ग का जीवन भी ऑक्सीजन पर निर्भर है. वो भी हमारी तरह ही सांस लेते हैं. अगर वो शिकारी से डरकर अपना सिर रेत में छुपा लेंगे, तो सांस नहीं ले पाएंगे और मर जाएंगे. दरअसल शुतुरमुर्ग रेत या मिट्टी में छोटे-छोटे गड्ढे खोदकर, उनमें अपने अंडे छुपा देते हैं. लेकिन कुछ घंटों के अंतराल पर वो अपने अंडों को देखने आते रहते हैं. ऐसा करने से उनके अंडों को निषेचन के लिए जरूरी सूरज की गर्माहट तो मिलती ही है, साथ ही वो इस बात से भी आश्वस्त हो जाते हैं कि उनके अंडे सुरक्षित हैं. लेकिन दूर से देखने पर ऐसा लगता है कि शुतुरमुर्ग अपना सिर रेत या मिट्टी में छुपा रहे हैं.

कुंडली मार कर बैठा सांप डरा हुआ होता है 

A previously captured 13-foot Burmese python is held for the press to view before U.S. Senator Bill Nelson (D-FL) took part in a state-sponsored snake hunt, in the Everglades, Florida January 17, 2013. Python Challenge 2013 is a month-long event sponsored by the Florida Fish and Wildlife Conservation Commission offering prizes of $1,500 for the most pythons captured and $1,000 for the longest python. REUTERS/Joe Skipper (UNITED STATES - Tags: SOCIETY ENVIRONMENT ANIMALS)

मिथक: सांप उसी वक्त काट सकते हैं जब वो कुंडली मारे बैठे होते हैं.

सच्चाई: कुंडली मारना सांपों की आक्रामक मुद्रा नहीं है, बल्कि कुंडली मारकर तो वो अपना बचाव करते हैं. दरअसल सांपों का शरीर लंबा होता है, लिहाजा आसपास खतरा होने पर वो अपने शरीर को सिकोड़कर कुंडली मार लेते हैं, ताकि हमलावर से अपने शरीर को बचा सकें. सच तो ये है कि सांप किसी भी मुद्रा या अवस्था में काट सकते हैं, बल्कि कुंडली मार लेने पर उनके लिए काट पाना थोड़ा मुश्किल जरूर हो जाता है.

मिथक: सांपों की त्वचा चिपचिपी और घिनौनी होती है.

सच्चाई: सांपों की त्वचा काफी सूखी लेकिन बेहद संवेदनशील होती है. सांपों को छूने में जरा सी लापरवाही बरतने पर उन्हें गंभीर चोट लग सकती है.

मिथक: सांप जोड़े में घूमते-फिरते हैं, यानी नर और मादा हमेशा साथ रहते हैं.

सच्चाई: सांप दूसरे कई जीव-जंतुओं की तरह जोड़ा नहीं बनाते. नर और मादा सांप सिर्फ मिलन और प्रजनन की ऋतु में ही एक साथ नजर आते हैं. इससे स्पष्ट हो जाता है कि सांप जोड़े में नहीं घूमते-फिरते हैं.

मिथक: चमगादड़ों को कुछ दिखाई नहीं देता, यानी वो अंधे होते हैं.

सच्चाई: चमगादड़ों की आंखें काफी छोटी होती हैं, लेकिन वो पूरी तरह से काम करती हैं. रात को उड़ते वक्त चमगादड़ सोनार तकनीक (ध्वनि संचरण) का इस्तेमाल करते हैं. चमगादड़ों में सुनने और सूंघने की अद्भुत क्षमता होती है.

मिथक: बीवर मछलियां खाते हैं.

सच्चाई: बीवर एक छोटा सा जीव होता है, जो पानी के अंदर अपना घर बनाता है. लेकिन बीवर मछलियां नहीं खाते, बल्कि उनका खाना तो पेड़-पौधे होते हैं.

लाल रंग देखकर नहीं भड़कता है बैल या सांड 

Spanish bullfighter Cayetano Rivera fails to perform a pass to a bull during a "Corrida Goyesca" bullfight in Ronda

मिथक: बैल और सांड लाल रंग देखकर भड़क जाते हैं.

सच्चाई: बैल और सांड कलर ब्लाइंड होते हैं. यानी वो रंगों में फर्क नहीं कर पाते. बैल और सांड तभी बिदकते हैं जब उन्हें किसी की हरकत अपने लिए खतरा लगती है. बुलफाइटर्स (बैलों और सांडों से लड़ने वाले) उन्हें मारने के लिए तलवार, भाले और छुरियों का इस्तेमाल करते हैं. इस दौरान सभी बुलफाइटर्स लाल रंग का लबादा पहने रहते हैं, ताकि खून के धब्बे छुप सकें.

मिथक: ऊंट अपने कूबड़ में पानी इकट्ठा करके रखते हैं.

सच्चाई: ऊंट का कूबड़ चर्बी से बना होता है. ऊंटों के शरीर में अंडाकार लाल रुधिर कणिकाएं पाई जाती हैं, जो पानी को धीरे-धीरे ग्रहण करने और धीरे-धीरे ही त्यागने की सुविधा प्रदान करती हैं.

मिथक: हाथियों की त्वचा काफी मोटी होती है.

सच्चाई: हाथियों की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है. छोटी सी मक्खी या पतंगा भी अगर हाथी के शरीर पर बैठ जाए, तो उसे फौरन पता चल जाता है. संवेदनशील होने की वजह से हाथियों की त्वचा सनबर्न का शिकार होती रहती है, यानी सूरज की गर्मी से बहुत जल्द झुलस जाती है. लिहाजा सनबर्न से बचने के लिए हाथी अक्सर मिट्टी और कीचड़ में नहाते दिखाई देते हैं. वहीं हथिनियां हमेशा इस बात का ख्याल रखती हैं कि उनके बच्चे (नन्हे हाथी) छांव में रहें.

मिथक: मेढ़क और टोड्स को छूने से हमारे शरीर में गांठ या मस्सा बन जाता है.

सच्चाई: हमारे शरीर में गांठ या मस्सा बनने से मेढ़क या टोड्स का कोई लेना-देना नहीं है. दरअसल मानव शरीर में गांठ या मस्से तो एक विशेष वायरस (विषाणु) की वजह से बनते हैं.

मिथक: मुर्गा-मुर्गियों के दांत नहीं होते हैं.

सच्चाई: मुर्गा-मुर्गियों के दांत न होने की बात सिर्फ एक भ्रांति है. सच्चाई तो ये हैं कि उनके दांत होते हैं.

मिथक: मगरमच्छ जब दुखी होने का नाटक करते हैं, तब वे रोते हैं और आंसू बहाते हैं.

सच्चाई: मगरमच्छ अपने खाने को चबा नहीं पाते हैं. इसलिए वो अपने भोजन के पहले छोटे-छोटे टुकड़े कर लेते हैं और फिर उन्हें निगल जाते हैं. मगरमच्छ की आंखों को नम रखने वाली ग्रंथियां उसके गले के नजदीक स्थित होती हैं, इसलिए मगरमच्छ जब कुछ खा रहा होता है, तब उसके आंसू निकलने लगते हैं. उस वक्त लोगों को लगता है कि मगरमच्छ रो रहा है और आंसू बहा रहा है.

गिरगिट अपना रंग अपने मूड पर बदलती है 

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मिथक: गोल्डफिश की याददाश्त बहुत कमजोर होती है.

सच्चाई: गोल्डफिश समेत कई और तरह की मछलियां बहुत तेज दिमाग की होती हैं. उनके अंदर न सिर्फ अलग-अलग ध्वनियों को समझने की क्षमता होती है, बल्कि वो इंसानी चेहरों को भी बखूबी पहचानती हैं. इसके अलावा उन्हें अपने खाने का वक्त भी अच्छी तरह से याद होता है. किसी चीज से चोटिल होने पर वो उस चीज से हमेशा के लिए सचेत हो जाती हैं.

मिथक: जूं साफ बालों की बजाए गंदे बालों में बसेरा बनाते हैं.

सच्चाई: जूं को सिर्फ बसेरा बनाने से मतलब है. उन्हें साफ, गंदे या तेल लगे बालों से कोई फर्क नहीं पड़ता. जूं को रहने और प्रजनन के लिए बाल काफी माफिक लगते हैं, लिहाजा वो बालों में ही बसेरा बनाते हैं.

मिथक: गिरगिट पर्यावरण के अनुरूप होने के लिए रंग बदलते हैं. शिकारी से बचने के लिए भी वो वातावरण के मुताबिक अपना रंग बदल लेते हैं.

सच्चाई: गिरगिट का रंग उसकी मनोदशा पर निर्भर करता है, यानी वो मौजूदा मिजाज के मुताबिक अपने रंग को बदलते हैं.

मिथक: सांप संगीत सुनकर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, यानी संगीत सुनकर वे नाचने-झूमने लगते हैं.

सच्चाई: सभी सांप बहरे होते हैं, यानी वो कुछ भी सुन नहीं सकते. संपेरा जब उनके सामने बीन बजाता है, तो सांप बीन को लकड़ी का डंडा समझकर डर जाते हैं. सांप को लगता है कि डंडे से उन्हें चोट पहुंच सकती है, लिहाजा उससे बचने के लिए वो इधर-उधर हिलने-डुलने लगते हैं. सांप की इस प्रतिक्रिया को लोग उसका नाचना या झूमना समझते हैं.

कार को नहीं निगल सकती है व्लू व्हेल 

मिथक: ब्लू व्हेल मछली एक पूरी कार को निगल सकती है.

सच्चाई: ब्लू व्हेल से लोग बेवजह डरते हैं. ब्लू व्हेल एक बड़े आकार के संतरे से ज्यादा विशाल चीज नहीं निगल सकती है.

मिथक: चूहों को पनीर बेहद पसंद है.

सच्चाई: चूहों को पनीर की बजाए सभी तरह की मिठाई ज्यादा पसंद आती है. पनीर वाली भ्रांति शायद कार्टून फिल्मों के जरिए फैली. ऐसी ही कुछ भ्रांतियां और हैं, जैसे खरगोश को गाजर और हाथी को मूंगफली बहुत पसंद है. जबकि ये दोनों बातें भी सच नहीं हैं.

मिथक: गेंडों के सींग उनकी नाक पर होते हैं.

सच्चाई: ये बात पूरी तरह से गलत है. गेंडे का सींग उसी प्रोटीन से बना होता है, जिससे कि उसके बाल बने होते हैं. लिहाजा हम कह सकते हैं कि गेंडे का सींग उसके उलझे हुए बालों का एक ठोस गुच्छा है.

मिथक: ज्यादा शोरगुल सुनकर हाथी बिदक कर भागने लगते हैं.

सच्चाई: हाथियों पर शोरगुल का खास असर नहीं पड़ता. शोरगुल होने पर भी वो शांत रहते हैं और आराम से वहां से चले जाते हैं.

मिथक: मछलियां गूंगी होती हैं, यानी वो किसी तरह की ध्वनि नहीं निकाल पातीं.

सच्चाई: मछलियां गूंगी नहीं होती हैं. वो भी कई जीव-जंतुओं के जैसे तरह-तरह की आवाजें निकालती हैं. लेकिन हम मछलियों की आवाज सुन पाने में असमर्थ हैं.

मिथक: शार्क को कैंसर (कर्क रोग) नहीं होता है.

सच्चाई: शार्क मछलियों को भी कैंसर रोग होता है. शार्क को कैंसर न होने की भ्रांति एक दवा कंपनी की फैलाई हुई है. उस कंपनी ने शार्क की हड्डियों को कैंसर रोधी बताकर प्रचार किया था. और उपचार के नाम पर शार्क की हड्डियों से अपना धंधा चमकाया था.

मिथक: केंचुए को अगर दो हिस्सों में काट दिया जाए, तो वो मरता नहीं बल्कि दो अलग-अलग केंचुओं में तब्दील हो जाता है.

सच्चाई: केंचुए को दो हिस्सों में काट देने से वो मर जाता है. दो अलग-अलग केंचुओं में तब्दील होने की बात सरासर एक भ्रांति है.

घरेलू मक्खी 30 दिनों तक जिंदा रहती है 

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मिथक: घरेलू मक्खियों का जीवन सिर्फ एक दिन ही होता है.

सच्चाई: घरेलू मक्खियों की जिंदगी 20-30 दिन तक की होती है.

मिथक: फ्लेमिंगो पक्षी एक टांग पर इसलिए खड़ा रहता है, ताकि ठंडे पानी में अपने शरीर की गर्मी को संरक्षित रख सके.

सच्चाई: फ्लेमिंगो अपनी एक टांग पर इसलिए खड़ा रहता है कि इससे उसे आराम मिलता है. ऐसा करने से फ्लेमिंगो की मांसपेशियों पर ज्यादा जोर नहीं पड़ता है. हालांकि इंसान के लिए एक पैर पर खड़े रहना बहुत थकाऊ और उबाऊ काम है.

मिथक: शार्क के मुंह में दांतों की अंतहीन पंक्तियां होती हैं.

सच्चाई: शार्क के मुंह में एक वक्त में दांतों की सिर्फ एक ही पंक्ति होती है. शार्क के सभी दांत मुलायम ऊतकों (टिशूज) के जरिए जबड़ों से जुड़े होते हैं, जिन्हें उसकी त्वचा ढंके रहती है. दांतों के घिसने पर या उनमें टूट-फूट होने पर वो अपने आप झड़कर गिर जाते हैं. लेकिन 24 घंटों के भीतर ही उनकी जगह दांतों की नई पंक्ति उभर आती है.

मिथक: खटमल गद्दों और बिस्तर में सुराख कर देते हैं, और मांद बनाकर वहां रहने लगते हैं, बाद में वे उड़ जाते हैं.

सच्चाई: खटमल उड़ नहीं सकते, वो सिर्फ अपने पैरों के बल पर चलते हैं.

मिथक: सभी तरह की मकड़ियां जाल बुनती हैं.

सच्चाई: शिकारी मकड़ियां जैसे वुल्फ स्पाइडर्स, जंपिंग स्पाइडर्स और ट्रैपडोर स्पाइडर्स अपने शिकार का पीछा करती हैं, वो दूसरी मकड़ियों की तरह जाल बुनकर शिकार के फंसने का इंतजार नहीं करती हैं. हां, लेकिन ये बात सच है कि सभी मकड़ियों के पास जाल बनाने की क्षमता होती है, उनके पास भी जो शिकार पकड़ने के लिए जाल का इस्तेमाल नहीं करती हैं.

मिथक: कॉकरोच (तिलचट्टे) अमर और अनिवाशी होते हैं, वो परमाणु युद्ध में भी जिंदा बच सकते हैं.

सच्चाई: अमेरिकन एंटोमॉलोजिस्ट मैग्जीन के मुताबिक, 20000 रेड (परमाणु विकिरण नापने की इकाई) के संपर्क में आने पर अमेरिकन कॉकरोच मर जाते हैं. जबकि उनसे उलट फलों पर मंडराने वाली मक्खियां 64000 रेड विकिरण में भी जिंदा रहीं. वहीं लेसर ग्रेन बोरर (अनाज का कीड़ा) तो 180,000 रेड विकिरण झेलकर भी जिंदा रहता है. कॉकरोच (तिलचट्टे) के अमर होने की भ्रांति के पीछे शायद वातावरण में उसके अनुकूलन की खासियत है. वो हर माहौल में खुद को ढाल लेते हैं और सब कुछ खाते-पीते हैं.

मकड़ी के काटने से नहीं होती है इंसानों की मौत 

मिथक: दीमक और सफेद चींटियों में कोई फर्क नहीं होता, दोनों जीव समान हैं.

सच्चाई: दीमक और चींटियां समान जीव नहीं हैं. दोनों का संबंध अलग-अलग कीट समूहों से है. दीमक और चींटियों की शारीरिक रचना भी अलग-अलग होती है. चींटियों की आंखें होती हैं, जबकि दीमकों की आंखें नहीं होतीं हैं. चींटियों के सिर पर एंटीना होता है, वहीं दीमकों का शरीर मनकों की तरह नजर आने वाले कई खंडों से बना होता है. चींटियों के कमर होती है, लेकिन दीमकों के कमर नहीं होती है.

चींटियों का पेट स्पष्ट नजर आता है, जो उनके शरीर के निचले हिस्से के बिल्कुल आखिर में होता है. दीमकों का पेट अस्पष्ट होता है, उसकी कोई निश्चित जगह नहीं होती. सभी श्रमिक चींटियां मादा होती हैं, जबकि दीमकों में नर और मादा दोनों ही श्रमिक का काम करते हैं.

सभी चींटियां मुर्दाखोर और कूड़ाखोर होती हैं. विभिन्न प्रजातियों की चींटियां अपनी पसंद का अलग-अलग तरह का खाना तलाश करने निकलती हैं. चींटियों की कई प्रजातियां नम या सड़ी-गली लकड़ियों में रहती हैं, लेकिन वो उन लकड़ियों को खाती नहीं हैं.

वहीं दीमक पेड़-पौधों के ऊतकों के विशेषज्ञ होते हैं, वे लकड़ी और घास खाते हैं. दीमकों की कुछ प्रजातियां अपने खाने-पीने और रहन-सहन की अलग आदतों के चलते मुसीबत भी पैदा कर देती हैं. इस तरह के दीमक इमारतों और पेड़ों पर डेरा डालकर उन्हें बुरी तरह नुकसान पहुंचा सकते हैं. चींटियों का संबंध फाॅर्मिसिदाए फेमली से है, वहीं दीमक कई अलग-अलग फेमिलीज से संबंध रखते हैं.

मिथक: मकड़ी के काटने से इंसान की मौत हो सकती है.

सच्चाई: मकड़ियों में ऐसा जहर नहीं होता है, जिससे किसी इंसान को कोई नुकसान पहुंच सके. आमतौर पर घरों में पाई जाने वाली मकड़ियां तो हमारे लिए बहुत फायदेमंद होती हैं, क्योंकि वो कीट-पतंगों को खाकर उनकी आबादी पर लगाम लगाए रखती हैं.

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