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जन्मदिन विशेष: के कामराज- दो बार पीएम पद ठुकराने वाले किंगमेकर

जिसको प्रधानमंत्री बनवाया उसी ने खत्म की इनकी राजनीति

Sumit Kumar Dubey Sumit Kumar Dubey Updated On: Jul 15, 2017 05:06 PM IST

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जन्मदिन विशेष: के कामराज- दो बार पीएम पद ठुकराने वाले किंगमेकर

भारतीय राजनीति में सत्ता से जुड़े रहने के लिए सिद्धांतों के साथ समझौता करने के तो कई उदाहरण मिल जाएंगे. लेकिन इस देश में एक राजनीतिज्ञ ऐसा भी हुआ था जिसने अपनी पार्टी की कमजोर होती जड़ों को फिर से मजबूत करने के लिए न सिर्फ सत्ता को छोड़ा बल्कि आधी सदी पहले नि:स्वार्थ राजनीति के एक ऐसे उसूल को कायम किया जिसकी नजीर आज भी पेश की जाती है.

भारतीय राजनीति की दशा और दिशा को निर्धारित करने वाले राजनीतिज्ञों में से एक के. कामराज का जन्म 15 जुलाई 1903 को तमिलनाडु के विरुधुनगर के एक छोटे से गांव में हुआ था.

कामराज प्लान ने दी राजनीति को नई दिशा

के. कामराज आजादी के बाद लगातार तीन बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने. साल 1962 में तीसरी बार चुनाव जीतने के बावजूद कामराज को एहसास हुआ कि अब उनकी पार्टी यानी कांग्रेस की जमीन खिसकने लगी है. मुख्यमंत्री बनने के एक साल बाद साल 1963 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी संगठन में रह कर जनता के बीच काम करने का फैसला किया. कामराज ने इसके साथ ही प्रधानमंत्री नेहरू को भी सलाह दी कि वह अपने मंत्रियों से इस्तीफा लेकर उन्हें जनता के बीच भेजें ताकि आम जनता की परेशानियों को समझा जा सके. नेहरू को उनकी सलाह जंच गई. नेहरू सरकार के छह बड़े मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया. और यह योजना कामराज प्लान के नाम से मशहूर हो गई. आज भी मुसीबत के वक्त कई राजनीतिक पार्टियां कामराज प्लान की वकालत करती दिखती हैं.

आम कार्यकर्ता से कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक पहुंचे

एक गरीब परिवार में जन्म लेने वाले के कामराज ने आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी के साथ जुड़ कर तमिलनाडु में जमीनी स्तर पर कांग्रेस पार्टी को खड़ा करने में अहम योगदान दिया था. कामराज प्लान से नेहरू इतने प्रभावित हुए कि उन्हें 1963 में कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया. इसके बाद कामराज ने सत्ता का कभी कोई पद नहीं लिया. साल 1930 में महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के दौरान पहली बार जेल जाने वाले कामराज देश को आजादी मिलने तक कई बार जेल गए और उनके जीवन के करीब आठ साल जेल में ही बीते. साल 1954 में कामराज पहली बार तमिलनाडु या उस वक्त के मद्रास सूबे से मुख्यमंत्री बने.

कामराज ने ही शुरू किया था स्कूलों में मिड डे मील

Kamaraja

कामराज के पिता की जल्दी मौत होने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने का मौका नहीं मिला था. शायद यही वजह थी कि वह शिक्षा की आवश्यकता से अच्छी तरह से वाकिफ थे. कामराज ने तमिलनाडु में बड़ी संख्या में स्कूल खुलवाए. आजाद भारत में पहली बार स्कूलों में मिड डे मील की शुरुआत कामराज ने ही की. छात्रों को मुफ्त यूनिफॉर्म और किताबें देने के साथ-साथ उन्होंने अपने राज्य में 11 वीं कक्षा तक मुफ्त शिक्षा की व्यव्स्था की. कामराज ने सुनिश्चित किया कि तीन मील की दूरी पर कम से कम एक स्कूल होना ही चाहिए. उनके कार्यकाल के दौरान ही मद्रास राज्य में साक्षरता की दर सात फीसदी से 37 फीसदी तक पहुंच गई.

देश के पहले किंगमेकर थे कामराज

कामराज को आजाद भारत के पहले किंगमेकर राजनेता के तौर पर भी जाना जाता है. दो बार प्रधानमंत्री बनने का मौका मिलने के बावजूद उन्होंने यह पद नहीं लिया. साल 1964 में नेहरू की मौत के बाद कांग्रेस पार्टी नेतृत्व के संकट से जूझ रही थी. ऐसे में बतौर कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर पहुंचाया. इसके बाद लालबहादुर शास्त्री की आकस्मिक मौत के बाद जब एक बार फिर से प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली हुई तब भी कामराज के पास उसे हासिल करने का अच्छा मौका था.

अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के डीक्लासिफाइड दस्तावेजों के मुताबिक उस वक्त सीआईए भी यह मान के चल रही थी कि कामराज ही अगले प्रधानमंत्री होंगे. लेकिन कामराज एक बार फिर से सत्ता से दूर ही रहे और उन्होंने इंदिरा गांधी को देश की तीसरी प्रधानमंत्री बनवा दिया.

इंदिरा ने दी कामराज को मात

Kamraj

कामराज और उनके सहयोगियों को कांग्रेस के भीतर ‘सिंडिकेट’ के नाम से जाना जाता था. नेहरू की मौत के बाद ‘सिंडिकेट’की ताकत बहुत बढ़ गई थी. इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस पार्टी में कामराज की पकड़ को कमजोर करने का काम शुरू कर दिया. सिंडिकेट पार्टी चला रहा था और इंदिरा सरकार चला रही थीं. पार्टी और सरकार के बीच मतभेद इस स्तर पर पहुंच गए कि साल 1969 में औपचारिक रूप से पार्टी का विभाजन हो गया. साल 1971 के आम चुनाव में इंदिरा की कांग्रेस को जनादेश मिला और कामराज की राजनीति अवसान की ओर बढ़ गई.

कामराज ने दो अक्टूबर 1963 को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर कामराज प्लान की शुरूआत की थी. जीवन भर महात्मा गांधी के सिखाए आदर्शवाद की राजनीति करने वाले के कामराज गांधी जयंती के ही दिन यानी दो अक्टूबर 1975 को इस दुनिया को छोड़ कर चले गए.

जनसेवा और साफ-सुथरी राजनीति के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले के कामराज को उनकी मौत के एक साल बाद देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

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