S M L

इंटरनेशनल टाइगर-डे: जानते हैं टाइगर भी अमीर और गरीब होते हैं?

ब्रिटिशर्स, राजा-महाराजाओं और शिकारियों द्वारा बाघों का इतना अंधाधुंध शिकार हुआ कि ये भारत में बाघ विलुप्त होने की कगार पर आ खड़े हुए

Subhesh Sharma Updated On: Jul 29, 2017 12:30 PM IST

0
इंटरनेशनल टाइगर-डे: जानते हैं टाइगर भी अमीर और गरीब होते हैं?

19वीं सदी से पहले तक भारत में करीब 10 हजार बाघ हुआ करते थे. लेकिन ब्रिटिश अफसरों, राजा-महाराजाओं और शिकारियों द्वारा बाघों का इतना अंधाधुंध शिकार हुआ कि ये भारत में बाघ विलुप्त होने की कगार पर आ खड़े हुए. बाघों के संरक्षण के लिए दुनिया भर के लोग एक साथ खड़े हुए और इसी के लिए 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर समिट में इंटरनेशनल टाइगर डे की शुरुआत की गई.

भारत में खतरे में पड़ी प्रजातियों के संरक्षण के लिए 1972 में वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट लाया गया. इसके दो साल बाद यानी 1974 में कॉर्बेट नेशनल पार्क के साथ प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत की गई. देश भर में कॉर्बेट समेत 9 टाइगर रिजर्व बनाए गए. लेकिन क्या बाघों के संरक्षण के लिए इतना सब कुछ ही काफी था? जवाब है नहीं.

बाघों के मशहूर संरक्षक एक्टिविस्ट वाल्मीक थापर कहते हैं कि भारत में 1974 में जब प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया गया तब बाघों की आबादी 1800-2200 के करीब थी और आज करीब 43 साल बाद भी इनकी आबादी इतनी ही है. हां थोड़ी बहुत कम ज्यादा हो सकती है. प्रोजेक्ट टाइगर को और मजबूती देने के लिए दिसंबर 2005 में नेशनल टाइगर कनजरवेशन ऑथोरिटी स्थापित की गई.

एनटीसीए और प्रोजेक्ट टाइगर की पोल खोलती है पन्ना और सरिस्का की कहानी

सरकार भले ही बाघों को बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर और एनटीसीए लेकर आई. लेकिन पन्ना और सरिस्का नेशनल पार्क की आपबीती इस पूरे प्रोजेक्ट की पोल खोलती है. 2007 में मध्य प्रदेश के जिस पन्ना टाइगर रिजर्व को पर्यटन मंत्रालय ने देश के बेस्ट मेनटेंड पार्क का अवार्ड दिया, वहां 2009 में एक भी बाघ नहीं बचा.

tiger

ऐसा ही कुछ मामला राजस्थान के अलवर जिले में स्थित सरिस्का टाइगर रिजर्व में देखने को मिला. यहां करीब 16 बाघ थे और 2004 में पार्क में एक भी बाघ नहीं बचा. पार्क से बाघों के गायब होने की खबर जब मीडिया में फैली. खबर को जोर पकड़ते देख मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई. दो महीने तक जांच चली और सामने आया कि बाघों के सुरक्षित घर में ही एक भी बाघ नहीं बचा.

यह भी पढ़ें: मंगलयान पर किए खर्च से ज्यादा होगा दो बाघों को बचाने का फायदा

पन्ना में बांधवगढ़ से टाइगर शिफ्ट किए गए, वहीं सरिस्का में रणथंबोर से बाघों को लाया गया. धीरे-धीरे बाघों की संख्या बढ़ने लगी. लेकिन सवाल ये है कि इस सब के लिए कौन जिम्मेदार है. करोड़ों रुपए के बजट के बावजूद बाघों की सुरक्षा को लेकर सरकार क्यों चिंतित नहीं थी? ये दोनों ही मामले प्रोजेक्ट टाइगर, एनटीसीए, राज्य सरकार, केंद्र सरकार और बाघों को बचाने की मुहिम से जुड़े हर एक व्यक्ति की पोल खोलने के लिए काफी थे.

सब कुछ बुरा नहीं रहा बहुत कुछ अच्छा भी हुआ

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में पिछले कुछ सालों में बाघों के साथ सिर्फ बुरा ही हो रहा है. अगर ऐसा होता तो आज भारत दुनिया भर के जंगलों में बचे 70 फीसदी टाइगर्स का घर नहीं होता. फॉरेस्ट गार्ड्स की कड़ी सुरक्षा के बीच बाघ जंगलों में खूब फल फूल रहे हैं. आज दुनिया भर से लोग बाघों को उनके कुदरती परिवेश में देखने आते हैं. हमारे देश में टाइगर आज किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं है.

उसकी एक झलक का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं. टाइगर भी अपने स्टारडम का खूब मजा लेता है और अपनी मर्जी पर ही दर्शन देता है. अपनी कमाई के लिए भी टाइगर किसी पर निर्भर नहीं है. लोग जंगल सफारी और टाइगर की फोटोग्राफी करने के लिए पानी की तरह पैसा बहाते हैं. सरिस्का, पन्ना और राजा जी जैसे पार्कों में भी आज बाघ खूब फल फूल रहे हैं.

टाइगर्स में भी है एपीएल और बीपीएल

बाघ भी अमीर और गरीब हो सकते हैं. ये बात सुनने में बड़ी बेतुकी सी लगती है. लेकिन अगर इसको ठीक से समझे, तो काफी हद तक ठीक भी लगती है. वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट ए जे अंसारी ने फ़र्स्टपोस्ट से खास बातचीत की.

उन्होंने बताया कि जब उत्तराखंड में भुवन चंद्र खंडूरी की सरकार थी, उस समय ग्लोबल टाइगर डे को लेकर कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस कार्यक्रम में जॉर्ज शैलर, बिट्टू सेहगल समेत कई बड़े कनजरवेशनिस्ट मौजूद थे. इसी दौरान अवार्ड विनिंग सीसीएफ कुमाऊं परमजीत सिंह ने बड़े ही मजेदार अंदाज में गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) और गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) के टाइगर्स के बीच का फर्क बताया था.

उन्होंने कहा था कि रोड के उस पार कॉर्बेट रिजर्व और इस ओर रामनगर डिवीजन. कॉर्बेट के अंदर के टाइगर को सुरक्षा, बजट आदि सारी सुविधाएं मिल रही हैं और रिजर्व के बाहर के टाइगर को नहीं मिल रही.

कॉरिडोर है टाइगर की लाइफ्लाइन

अगर बिना किसी संघर्ष के टाइगर की आबादी बढ़ानी है, तो वाइल्डलाइफ कॉरिडोर्स को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. टेराइ आर्क लैंडस्कैप दुनिया के सबसे बड़े वाइल्डलाइफ कॉरिडोर्स में से एक है. ये नेपाल में चितवन नेशनल पार्क से लेकर भारत में उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क तक फैला है.

वाइट टाइगर

ये कॉरिडोर बेहद अहम है, क्योंकि ये हजारों जानवारों को एक जगह से दूसरी जगह जाने का रास्ता मुहैया कराता है. लेकिन माइनिंग, अवैध निर्माण, राजमार्ग, रेलवे लाइन और नए शहर बसाने के कारण ये रास्ता कई जगह से टूट चुका है. मतलब ये है कि जानवर एक जगह से दूसरी जगह नहीं जा पा रहा है. एक जगह फंस कर रह जाने के कारण जानवर दूसरे जंगलों में नहीं फैल पा रहे हैं.

वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट अंसारी ने कहा, वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर्स बेहद अहम हैं. ये टाइगर्स को माइग्रेट करने का रास्ता देते हैं. करीब 500 साल पहले टेराई आर्क लैंडस्केप एक लाइन में हुआ करता था. लेकिन आज इसकी कनेक्टिविटी काफी कम हो चुकी है. इसे फिर से एक करने को लेकर काम चल रहा है. लेकिन मुश्किलें बहुत हैं. कहीं रेलवे लाइंस बना दी गई हैं, तो कहीं शहर बसा दिए गए हैं.

कॉर्बेट है आबादी का सोर्स

अंसारी ने बताया कि एक थ्योरी ऐसी भी है, जिसमें कॉर्बेट को टाइगर्स की सोर्स पोप्यूलेशन माना गया है. थ्योरी में कहा गया है कि अगर उत्तरी भारत में बाघ पूरी तरह से खत्म भी हो जाते हैं. तो भी कॉर्बेट के जरिए इन्हें दोबारा बसाया जा सकता है. उन्होंने कहा, पिछले 10 सालों में मैंने देखा है कि, जहां रामनगर डिविजन में पहले 8 से 10 बाघ थे. उस रामनगर डिविजन में आज रणथंबौर टाइगर रिजर्व के करीब-करीब बराबर यानी 47 टाइगर्स रह रहे हैं. कॉर्बेट में दो ब्लॉकेज हैं. एक कोटद्वार में है. ये कॉरिडोर खत्म होते-होते सिर्फ 1.5 किलोमीटर का बचा है और दूसरा है कोसी कॉरिडोर. लेकिन ये भी तेजी से सुकड़ता जा रहा है. वहीं कॉर्बट एरिया में सुंदरखाल को टाइगर्स के लिए मुख्य कॉरिडोर माना जाता है. जोकि ब्लॉक है.

क्या मुश्किलें सामने आईं

अंसारी बताते हैं कि कहा जा रहा है कि कॉरिडोर्स की जमीन जो खत्म हो रही है. वो सारी की सारी रेवन्यू लैंड है. 2010 में कॉरि़डोर्स को लेकर मैंने एक प्रयास किया था. मैंने एक गांव को रिलोकेशन के लिए तैयार किया. गांव के लोग भी कॉरिडोर से बाहर जाना चाहते थे. लेकिन हम आज तक राज्य सरकार से मंजूरी लेकर केंद्र तक नहीं पहुंच पाए हैं. अभी कॉर्बेट का 208 टाइगर्स का सेंसस रिजल्ट आया.

tiger

इसमें कहा गया है कि कॉर्बेट में डेंसिटी 16 पहुंच चुकी है, कैरिंग (ढोने की क्षमता) कैपेसिटी कम होती जा रही है. पिछले कुछ सालों के आंकड़ों के मुकाबले ये 9 गुना ज्यादा है. अभी तक हर साल पांच से आठ टाइगर बढ़ने की बात होती थी, लेकिन इस साल सेंसस में 45 टाइगर्स बढ़ा दिए गए हैं. मेरा कहना है कि कॉर्बेट में टाइगर ब्रीड करना तो बंद नहीं करेगा. जो भी टाइगर ब्रीड कर रहे हैं वो बाहर नहीं जा रहे हैं. यानी टाइगर कॉर्बेट से बाहर निकल कर रामनगर डिविजन या दूसरे इलाकों में नहीं जा रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण है कॉरिडोर्स का खत्म होना. रामनगर डिविजन में टाइगर्स के बढ़ने की रफ्तार कम हुई है.

उन्होंने कहा कि अगर टाइगर नहीं जाएगा तो कॉर्बेट में कैरिंग कैपेसिटी बढ़ती जाएगी, वो दिन दूर नहीं जब सारे टाइगर्स आपस में लड़ कर खत्म हो जाएंगे. सरकार को कॉरिडोर्स के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई पॉलिसी लानी चाहिए. सरकार को ध्यान देना होगा कि अगर लोग खुद से कॉरिडोर वाले इलाके को छोड़ कर जाना चाहते हैं तो उन्हें घर मुहैया कराए. जहां कॉरिडोर बनाने की जरूरत है वहां बनाना चाहिए. कॉरिडोर्स नेशनल पार्क्स के आसपास ही सिमट कर रह गए हैं, जबकि टाइगर पार्कों के बाहर निकल रहे हैं.

एनटीसीए बिना दांत और पंजे वाला टाइगर

अंसारी कहते हैं कि मेरा व्यक्तिगत मानना है कि कोई भी बाघ संरक्षण को लेकर शुरू की जाने वाली पहल की शुरूआत लोकसभा के बजट सेशन से शुरू होती है. 5600 करोड़ रुपए और 40 से ज्यादा टाइगर रिजर्व. अभी तक 70 फीसदी टाइगर रिजर्व के कोर एरियाज से गांव शिफ्ट नहीं हुए हैं. इसे देख कर ये माना जा सकता है कि एनटीसीए एक ऐसा टाइगर है, जिसके दांत और पंजे नहीं हैं. बाघों को बचाने के लिए पॉलिटिकल विल चाहिए.

जंगल के बाहरी इलाके से इनसान को हटाना मुश्किल

मध्य प्रदेश के प्रिंसिपल चीफ कनरजवेटर ऑफ फॉरेस्ट (पीसीसीएफ) सी के पाटिल ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में बताया कि बफर एरिया को-एग्जीटेंस वाले एरिया होते हैं. वहां लोगों और जानवरों, दोनों की जरूरतों पर ध्यान देना होता है. लेकिन बफर एरिया को विलेज फ्री, मवेशी फ्री कर पाना इतनी जल्दी संभव नहीं है. लैंड के लिए क्राइसिस मची हुई है.

जब लोग अलर्ट हुए

पाटिल ने कहा, 2004-2006 के बीच देश में बाघों की आबादी तेजी से कम हुई. जिसके बाद लोग अलर्ट हुए, एनटीसीए की फंडिंग की प्रक्रिया भी बदली और बाघों की सुरक्षा के लिए बजट बढ़ाया गया. टाइगर की मॉनीटरिंग के पैटर्न बदले. पग मार्क आईडेंटिफिकेशन की जगह कैमरा टेपिंग आई. जिससे बाघों की पहचान करने में मदद मिली. उनकी सही संख्या का पता लगाने में मदद मिली.

Jim Corbett Forest

जिम कॉर्बेट पार्क का एक दृश्य (फोटो: फेसबुक से साभार)

अंसारी से अलग पाटिल ने हमें बताया कि पिछले 10 सालों में कोर एरिया से लोगों को तेजी से शिफ्ट किया गया है. शिफ्टिंग का पैकेज इम्प्रूव किया गया. पहले शिफ्टिंग के लिए एक परिवार को 1 लाख रुपए दिए जाते थे, जिसे बढ़ाकर 10 लाख कर दिया गया. जिससे लोगों को जंगल से बाहर निकल कर सुख-सुविधाओं के साथ रहना ज्यादा बेहतर लगा. वहीं वाइल्ड लाइफ फिल्ममेकर आसिफ खान का भी मानना है कि पिछले कुछ सालों में कोर एरिया से लोगों को तेजी से शिफ्ट किया गया है और राजा जी इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi