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कुछ यूं मना था नेहरू के शहर इलाहाबाद में सुबह-ए-आज़ादी का जश्न

86 वर्षीय रिटायर्ड प्रोफेसर ओपी मालवीय बताते हैं ऐसा लग रहा था जैसे शहर में कोई चमत्कार हो गया हो

Ankit Pathak Updated On: Aug 15, 2017 11:30 AM IST

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कुछ यूं मना था नेहरू के शहर इलाहाबाद में सुबह-ए-आज़ादी का जश्न

गंगा और यमुना ने एक-दूसरे से मिलने के लिए जो शहर चुना वह इलाहाबाद ही है. यह वह शहर है जहां कभी सुर-असुर संग्राम में अमृत की बूंदें गिरी थीं. यह शहर सालाना लगने वाले माघ मेले का भी है, जहां कभी राजा हर्षवर्द्धन आया करते थे. शहर के महत्व को देखते हुए ही अकबर ने यहां किला बनवाया था और बाग़ी शहजादे सलीम ने इसे अपना मुख्यालय. इस शहर की विरासत और तहजीब को आप यहां रहकर ही भांप सकते हैं. आइए एक शहर- इलाहाबाद के जरिए ‘सुबह-ए-आजादी’ की दास्तान को पढ़ा जाए.

शहर इलाहाबाद और सुबह-ए-आजादी

लगभग दो सौ सालों की गुलामी झेलने वाले हमारे देश हिंदुस्तान के शहर इलाहाबाद ने 15 अगस्त 1947 की सुबह वैसे ही नहीं देखी जैसे पिछले दो सौ सालों से देखा करती थी. यकीनन उस सुबह के सूरज ने लोगों की जिंदगी में ज्यादा रोशनी की थी.

लोगों की जिंदगियों में ब्रिटिश सत्ता की काली साया लंबे समय से छाई थी, यह वह दिन था जब लोगों ने खुली हवा में सांसें ली थी. उस दिन सांसें भी गहरी आईं थीं. यूं तो हर साल होली, दिवाली, ईद, दशहरा आता था लेकिन आजादी का ये त्योहार निराला था. क्या जाति, क्या मजहब, क्या बूढ़े, क्या बच्चे, क्या महिलाएं, सभी की जिंदगी गुलजार हुई थी.

anand bhawan

आनंंद भवन

पंद्रह साल का नौजवान जिसने इस दिन उपवास रखा

पंद्रह साल के इलाहाबादी नौजवान ओम प्रकाश मालवीय के लिए यह दिन वैसा नहीं था जैसा करोड़ों हिंदुस्तानियों के लिए रहा. ओम प्रकाश ने जब सुबह साढ़े छह बजे अमृत बाजार पत्रिका (जो पहले बांग्ला भाषा में प्रकाशित होता था, लेकिन वर्नाकुलर प्रेस एक्ट से बचने के लिए इसने अपनी भाषा अंग्रेजी कर ली) की वह हेडलाइन पढ़ी, जो उन्हें आज तक याद है कि- ‘ड्रीम ऑफ यूनाइटेड इंडिया शैटर्ड’ यानी अखंड भारत का सपना चूर-चूर हो गया.

इस हेडलाइन ने उन्हें धक्का पहुंचाया. जब उन्हें यह पता चला कि गांधीजी ने स्वयं को आज़ादी के उत्सव से अलग रखा है और उपवास पर हैं, पूरा देश सांप्रदायिकता की आग में झुलस रहा है, उसी समय ओम प्रकाश ने भी यह निर्णय लिया कि वह भी उपवास पर रहेंगे. उनकी भावना उस वक्त सामान्य भावना से भिन्न थी. एक पंद्रह वर्षीय इलाहाबादी नौजवान के लिए यह कदम चुनौतीपूर्ण था.

स्कूल के उत्सव और पी.डी. टंडन पार्क की सभा ने बदला निर्णय

ओम प्रकाश मालवीय उस समय केसरवानी इंटर कॉलेज में नौवीं के छात्र थे. अपनी जागरूकता और सरोकारों के चलते वे अध्यापकों के चहेते छात्र थे. उन्हें आजादी के अवसर पर स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल किया गया. सभी ने एक गीत गाया जिसके बोल थे- ‘वीरों ने छाती खोल दी, जब चल रही थी गोलियां’. यह गीत हिंदी की कवयित्री विद्यावती कोकिल ने लिखा था. गीत की पृष्ठभूमि ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की थी जब लाल पद्मधर और भाई रमेश को गोली लगी थी.

शाम पांच बजे बस अड्डे के पास पी. डी. टंडन पार्क में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया था. अभी तक उपवास पर रहे ओम प्रकाश ने भी उस जनसभा में भागीदारी की. उनके अनुसार पार्क में तिल रखने की भी जगह नहीं थी और मंच पर पंडित विश्वंभर नाथ पाण्डेय (‘विश्ववाणी’ नामक पत्रिका के संपादक जिन्हें बाद में उड़ीसा का गवर्नर भी बनाया गया) का ओजस्वी भाषण चल रहा था. वे आजादी की लड़ाई में इलाहाबाद के योगदान पर और आजादी के महत्त्व पर भाषण दे रहे थे.

उनके भाषण के बाद एक जुलूस पी. डी. टंडन पार्क से घंटाघर चौक की तरफ आया, उस जुलूस में बजते ढोल नगाड़ों, नाचते झूमते लोगों को देखकर बाल मन ओम प्रकाश भी झूमने लगे थे. वे बताते हैं कि ऐसा लग रहा था जैसे शहर में कोई चमत्कार हो गया हो. शाम सात बजते-बजते जब ओम प्रकाश अतरसुइया स्थित अपने घर पहुंचे तो उन्हें जोरों की भूख लग आई थी. सुबह से रखा उपवास शाम सात बजे उनकी मां ने यह कहते हुए तुड़वाया कि ‘बेटा! तुमने अब तक जितना दुःख व्यक्त किया वह पर्याप्त है, अपनी ऊर्जा को बचाकर रखो, यह आगे भी काम आएगी’.

सत्तर साल बाद आजादी का दिन और इलाहाबाद

आज जब ओम प्रकाश मालवीय अपनी जिंदगी के छियासी बसंत पूरे कर चुके हैं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सन बानबे में अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं, तब वे सत्तर सालों की इस आजादी को याद करते हुए कहते हैं- ‘इस देश की सरकारों ने आज़ादी के साथ जो किया है वह किसी से छिपा नहीं है. अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी के साथ जातिवाद और सांप्रदायिकता की समस्याएं आज भी बनी हुई हैं’. तमाम निराशाओं के बाद भी वे कहते हैं कि ‘जनता में उनका अटूट विश्वास है’. इस देश की जनता अपनी आजादी को कभी बेकार नहीं होने देगी.

पिता मोतीलाल नेहरू के साथ जवाहर लाल नेहरू

पिता मोतीलाल नेहरू के साथ जवाहर लाल नेहरू

शहर इलाहाबाद से उनकी उम्मीदें और भी हैं. वे कहते हैं कि इस देश को दिशा देने वाले लोग इस शहर से आजादी के पहले भी पैदा होते रहे हैं और बाद में भी. ‘आनंद भवन’ और ‘जवाहरलाल नेहरू’ को करीब से देखने जानने वालों में प्रोफ़ेसर ओम प्रकाश मालवीय शामिल रहे हैं, इसलिए आजादी की इस सत्तरवीं वर्षगांठ पर उनकी उम्मीदें अपने देश और अपने शहर दोनों से हैं, कि इसके नागरिक और नेता सभी आजादी को अधिक से अधिक चरितार्थ करें.

ब्रिटिश गुलामी की तारीखें यहीं लिखी गई

अगस्त महीने का वह बारहवां दिन था. आज के दो सौ बावन साल पहले वर्ष 1765 में शहर इलाहाबाद ही गवाह बना था जब बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार कंपनी को दे दिए गए थे. जिसका विस्तार धीरे-धीरे पूरे हिंदुस्तान में होता गया. पचास लाख रुपए में बिककर इस शहर ने जो जिल्लत झेली थी वह दशकों तक महसूस की जाती रही. तभी तो आजादी की लड़ाई में अपने जान की बाजी लगाने वाले वीरों ने इस शहर में जन्म लिया.

1857 revolt in india

प्रतीकात्मक तस्वीर

आजादी की पहली लड़ाई और शहर इलाहाबाद

पहले बैरकपुर छावनी और फिर मेरठ से उठी क्रांति की आंधी ने जल्द ही इलाहाबाद को भी अपने आगोश में ले लिया. वह जून (1857) के पहले सप्ताह की तपती धूप थी जब मौलवी लियाकत अली ने, जो उस समय कौशाम्बी के एक मदरसे में पढ़ाते थे, विद्रोह की कमान अपने हाथ में ली. छह जून से लेकर बारह जून तक इस शहर ने स्वयं को ब्रिटिश बेड़ियों से आजाद घोषित कर दिया था. उसके बाद जनरल नील के आततायी और दमनकारी मंसूबों के गवाह इस शहर के पत्ते-पत्ते बने.

और जब पेड़ों ने आंसू बहाए थे

शहर के सुलेम सराय से लेकर कंपनी बाग तक नीम, इमली और आम के ऐसे कोई पेड़ नहीं रहे होंगे जिनकी डालों पर हिंदुस्तान से प्यार करने वाले हजारों लोगों ने कुर्बानियां न दी हों. जिन पेड़ों को सींच-सींचकर इलाहाबाद के हजारों लोगों ने बड़ा किया था, जिन नीम के पेड़ों के तेल लगाए और खाए थे, जिन इमली और आम के पेड़ों के फल चखे थे, उन्हीं पेड़ों पर वे एक दिन अपनी अंतिम सांस तक लटका दिए जायेंगे, ऐसा कायनात ने भी नहीं सोचा होगा, लेकिन यह शहर इसका गवाह बना था.

खुद नेहरू ने इस दमन की वीभत्सता के बारे में ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा है कि ‘जनरल नील मेरे शहर में बेउम्र, स्त्री- पुरुष का लिहाज किए बगैर लोगों का क़त्ल करवा रहे थे’. यह थी आजादी की पहली लड़ाई जो शहर इलाहाबाद ने लड़ी थी. इसी शहर ने नेहरू को वह ताकत दी थी जिससे वह लिख सके,‘मनुष्य को इस तरह रहना चाहिए कि मरते वक्त वह यह कह सके- मैंने अपनी सारी ताकत, अपनी सारी जिंदगी दुनिया के सबसे बड़े आदर्श- मानव जाति की आजादी के लिए न्योछावर कर दी’.

नब्बे साल का इंतजार और इलाहाबाद

वर्ष 1857 से लेकर 1947 तक नब्बे साल का इंतजार इलाहाबाद के आजादी के दीवानों ने ऐसा किया था जैसे दो प्रेमी एक-दूसरे के मिलने का करते हैं. महारानी विक्टोरिया का पैगाम भी इसी शहर के मिंटो पार्क में पढ़ा गया था. सर सैय्यद अहमद खां से मोतीलाल नेहरू ने जो मकान लिया था जिसे आज हम ‘आनंद भवन’ के नाम से जानते हैं, वहां आजादी की लड़ाई की रणनीति बनती थी. कांग्रेस ने अपनी सालाना बैठकों के लिए इस शहर को तीन बार चुना था. यही वह शहर है जहां चंद्रशेखर आज़ाद अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते हमेशा के लिए आजादी हो गए, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के सामने उन्होंने घुटने नहीं टेके.

Azad

यहीं पर असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन की नींव रखी गई थी. यह शहर ब्रिटिश सत्ता के सामने न झुकने वालों का रहा. इसी शहर में एक शायर हुए ‘अकबर इलाहाबादी’, जो लिखते हैं ‘कौम से दूरी सही हासिल जब ऑनर हो गया, तन की क्या परवाह, आदमी जब ‘सर’ हो गया’. यह इस शहर के लोगों का ज़मीर था जो कभी किसी के सामने झुका नहीं, और झुकने वालों पर तंज कसने में पीछे भी नहीं हटा.

हिंदुस्तानियों के दिमाग को गुलाम बनाने वाली अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था पर आघात करते हुए अकबर इलाहाबादी लिखते हैं- ‘तालीम जो दी जाती है हमें वह क्या है, फ़क़त बाज़ारी है, जो अक्ल सिखाई जाती है वह क्या है, फ़क़त सरकारी है’.

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