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असली आजादी तो तब मिलेगी जब किसी पर कोई दबाव न हो

भारत की आजादी के सत्तर साल पूरे होने पर भी जनवादी नीतियों में कमी पा रहे हैं इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा

Lalbahadur Verma Updated On: Aug 14, 2017 05:37 PM IST

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असली आजादी तो तब मिलेगी जब किसी पर कोई दबाव न हो

पिछले कई वर्षों से जब भी आज़ादी का दिन आता है तो मन में बहुत सी पुरानी यादें उमड़ने घुमड़ने लगती हैं, कि आज़ादी! क्या, क्यों, और कैसे? आजादी के प्रति अपना सरोकार हम आपको बताएं इसके पहले आजादी से मेरा पहला सरोकार उन्नीस सौ सैतालिस में कैसे बना? उसको याद करेंगे. अगस्त 1947 में मैं तकरीबन दस साल का था और चौथी कक्षा में पढ़ता था.

15 अगस्त का दिन आया तो उसके स्वागत की तैयारियों में मुझे भी शामिल किया गया था. दिन भर तरह तरह के कार्यक्रम हुए, जुलूस निकले, चारों तरफ लोग बेहद खुश नजर आ रहे थे. इसकी कुछ धुंधली सी स्मृति है लेकिन ख़ास स्मृति है शाम की, जब सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ. तब एक कोरस में स्कूल की तरफ से मैं भी शामिल था.

हम लोगों ने उस वक्त जो गाना गाया, वह मन में बसा हुआ है और इसीलिए मैंने यह बात उठाई, हमारे गाने के बोल थे- ‘मेरी माता के सिर पर ताज रहे, ये हिन्द मेरा आज़ाद रहे’. अब यह गीत उस वक्त मेरे लिए ख़ास महत्व रखता नहीं था, लेकिन जब आज़ादी समझ आई तो यह बात मन को कुरेदने लगी कि ‘माता के सिर पर ताज क्यों रहे? और सारा निज़ाम ताज के विरुद्ध है, और हमने आजादी पाई किसी दूसरे के सिर पे से ताज हटाकर भारतमाता के सिर पे रखने के लिए.

बात धीरे-धीरे समझ आई कि हिंदुस्तान तो ‘ताजोतख्त’ का ही देश है, और जितना भी जनतंत्र आ जाय, यहां राजा ही राज करेगा. भारतमाता आज भी मुकुट लगाकर ही दिखाई देती हैं. यहां तक कि हर आदमी के मन में ‘मुकुट’ पहनने की इच्छा रहती है कि शादी में ही सही एक बार वो ‘ताज’ पहन ले, दुल्हे ‘राजा’ बन जाय.

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तो आज़ादी से जुड़ा हुआ ये ख़याल बाद में कुछ गहरी चिंता से जुड़ा कि आज़ादी को क्या हमने केवल स्वाधीनता के अर्थ में देखा? और ज्यादातर इसे स्वाधीनता की लड़ाई कहते भी हैं, इस अर्थ में कि भारत पराधीन था, अंग्रेजों का राज ख़त्म हो  गया और भारत स्वाधीन हो गया.

लेकिन मुझे जो बात आज तक परेशान करती है वह यही कि क्या किसी ऐसे देश को स्वाधीन कहा जा सकता है जिसके नागरिक पराधीन हों?, जहां आज़ादी आए केवल राजधानी में, लोगों के घरों तक न पहुंचे.

यही सरोकार था जब हमने बाद में इतिहास पढ़ना शुरू किया, पहले विद्यार्थी और बाद में शिक्षक भी हो गया, तो आज़ादी का ये भारतीय स्वरूप इसीलिए ज्यादा परेशान करने लगा क्योंकि भारत में तो एक ‘मुक्ति’ की कामना रही है. हमारे पुरुषार्थों में भी ‘धर्म’, ‘अर्थ’, ‘काम’, एवं ‘मोक्ष’ की बात की जाती है.

इस तरह ‘मोक्ष’ को तो और भी बड़ी बात होना चाहिए था, जिसके लिए मानव की मुक्ति को एक आधार होना चाहिए था, लेकिन बात समझ आई यही कि यहां पर मोक्ष भी ‘वैयक्तिक’ है, क्योंकि समाज की कोई चिंता इसमें शामिल नहीं है.

जिस ‘आज़ादी’ की बात दुनिया में होती है वह ‘वैयक्तिक’ के साथ-साथ ‘सामाजिक’ भी है. इसका अर्थ ख़ास तौर मुझे तब समझ में आया जब मैं अपने प्रिय देश और अपनी दूसरी जन्मभूमि ‘फ्रांस’ गया. वहां की ‘क्रान्ति’ का ठीक से अध्ययन किया तो बात समझ में आई कि ‘फ्रांस तो पराधीन नहीं था, अपने ही देश में लोग आज़ाद नहीं थे, फिर भी उन्होंने सामंतवाद से अपने आज़ादी की लड़ाई लड़ी.

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14 जुलाई को अपना आज़ादी का दिन मनाया. उसने तीन आदर्श प्रस्तुत किए जो आज तक दुनिया के सर्वोच्च आदर्श हैं- ‘स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व’. यह फ्रांस की ‘क्रांति’ में चरितार्थ नहीं हुआ, बाद में समाजवादी, जनवादी क्रांतियां हुईं लेकिन ये कहीं भी चरितार्थ नहीं हुआ. इसलिए मुझे लगता है कि वास्तव में ‘आज़ादी’ अभी कहीं फलीभूत हुई ही नहीं. और जब भी पंद्रह अगस्त आता है तो ये सवाल नाचने लगता है मन में.

इसी सवाल को ध्यान में रखकर, फ्रांस से लौटने पर जब मैं एक एक्टिविस्ट टीचर बना, और लगा कि टीचर को एक्टिविस्ट भी होना चाहिए, अच्छा टीचर वही है. तो मैंने ‘भंगिमा’ नामक एक पत्रिका निकाली और उसे अपने देश की एक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सेमिनार’ की तरह शुरू करने का इरादा किया, ‘भंगिमा’ का पहला अंक जो निकला उसकी थीम ही मैंने ‘आज़ादी: क्या, क्यों, कैसे?’ रखी. उसमें मैंने लोगों के मत छापे. मैंने देखा कि आज़ादी की अवधारणा ही लोगों की भिन्न भिन्न है, इतनी अस्पष्ट है कि आखिर इस देश में आज़ादी चरितार्थ कैसे हो?

मुझे याद है कि जब आज़ादी की ‘गोल्डन जुबली’ मनाई जा रही थी तो मैं इलाहाबाद में था. मैंने एक सर्वे किया था. उसमें मैंने सफाईकर्मी से लेकर प्रोफ़ेसर तक से उनकी ‘आज़ादी’ को लेकर धारणा पर बात की थी. इससे यह पता चला था कि सन सैतालिस में आज़ादी की धारणा ही सबकी अलग-अलग थी.

मेरे घर में काम करने वाले सफाईकर्मी ने कहा था कि ‘बाबू! जैसे सैतालिस में जीते थे वैसे अब भी जी रहे हैं’. उन्हीं के साथी एक दूसरे सफाईकर्मी ने कहा कि ‘जिस दिन हम एक होटल गए, लोगों के साथ बैठकर चाय पी और पैसा देकर वापस आए, उस दिन लगा कि हम आज़ाद हैं’. यानि आज़ादी का लोगों के जीवन में अलग-अलग महत्व था.

आज़ादी का मतलब ऐसा नहीं है कि हमारे शासक भी एक ही लगाते हों. सभी अलग-अलग अर्थ लगाते हैं. विभिन्न अर्थों में आखिर कौन सी आज़ादी हिंदुस्तान में चरितार्थ हो रही है?, तो ऐसी स्थिति में यह बात जेरेबहस है मेरे ख़याल से, कि इस देश की ‘आज़ादी’ का दिन एक औपचारिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि ‘आज़ादी’ का महत्व न सरकार समझती है न जनता. सरकार समझती भी है तो उसे लागू करना नहीं चाहती, और जनता तो बिलकुल नहीं समझती.

अब फिर जब ‘आज़ादी’ का दिन आया है तो इस ‘आज़ादी’ को चरितार्थ करने के लिए हमने देहरादून के पास एक मोहल्ले में जहां हम लोग रहते हैं, वहां हर एक घर में ‘आज़ादी’ पर बात हो, ऐसा करने की योजना बनाई है. सभी ये पता करें कि उनके घरों में कितनी ‘आज़ादी’ है? घर-घर में आज़ादी नहीं होगी तो देश में ‘आज़ादी’ कैसे होगी?

हम लोगों ने यह जो कार्यक्रम लिया है वह अपने आस-पास के घरों का यांत्रिक जीवन देखकर लिया है. बच्चे, औरतें, पुरुष सभी यांत्रिक जीवन जीने वाले हैं. तो ऐसे यांत्रिक जीवन जीने वाले परिवारों में ‘आज़ादी’ का क्या मतलब है?

एक बात और महत्वपूर्ण है कि ‘आज़ादी’ की धारणा में ही एक तरह की गुत्थी है. बचपन से मैं सुनता आया हूँ कि ‘मुक्ति’ का सबसे बड़ा प्रतीक ‘उड़ती चिड़िया’ को रखा गया. मालूम पड़ता है कि बस वही ‘मुक्त’ है. यह तो हम मनुष्य मानते हैं कि चिड़िया ‘मुक्त’ है. लेकिन चिड़िया क्या वास्तव में मुक्त है? यानि अगर किसी समाज में, किसी व्यक्ति में, किसी देश में मुक्ति की चेतना नहीं है तो वह ‘मुक्त’ होगा कैसे?

इसके लिए हमारा ये मानना है कि जब तक दुनिया में ‘घर’ जनवादी नहीं होंगे तब तक दुनिया में जनवाद पनप नहीं सकता. मेरी समझ से घर समाज का ‘परमाणु’ है, ‘इकाई’ है. ऐसे में घर में ही ‘वैयक्तिकता’ और ‘सामाजिकता’ पनपती है. यानि व्यक्ति का ‘व्यक्तित्व’ भी बचा रहे और उसकी ‘सामाजिकता’ और ‘परस्परता’ भी बनी रहे. इसलिए अगर यह ‘घर’ जो वह होना चाहिए वह नहीं हो पा रहा तो दुनिया भी वह नहीं हो पाएगी जो उसे होना चाहिए.

तो ऐसे में ‘घर’ में ‘मुक्ति’ का मतलब क्या होगा? पहले तो घर को ‘लोकतांत्रिक’ होना चाहिए. स्त्री, पुरुष, वयस्क, अवयस्क सबके अधिकार और कर्तव्य होने चाहिए. आज भी बहुत से परिवारों में कमाने वाले का ही वर्चस्व कायम है. आज भी बच्चों और महिलाओं को एक हद तक आज़ादी मिली है लेकिन जहां आज़ादी मिली भी है वहां मानसिकता नहीं बदली. यानि घर में ‘मुक्ति’ तभी आएगी जब किसी एक का ‘वर्चस्व’ न हो.

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हम किसी पर कुछ आरोपित न करें, यहां तक की बच्चे पर भी, उसका भी अपना व्यक्तित्व है. कोई किसी पर अपने को लादे न. हर व्यक्ति की संभावना को विकसित होने का मौका मिले. ‘आरोपित अनुशासन’ से घरों को मुक्त होना होगा, क्योंकि इससे न घर फलीभूत होते हैं न देश. यह एक लम्बी लड़ाई है.

‘मुक्ति’ हमारे लिए एक ‘सहज भावना’ बन जाय, इसके लिए अतिरिक्त प्रयास की जरुरत रह ही न जाय. ‘मुक्ति’ हमारे लिए एक ‘परम आवश्यकता’ होनी चाहिए, हम ‘मुक्त’ होने पर ही अपना सर्वोत्तम दे सकते हैं. दुनिया में कोई भी तंत्र स्थापित हो उसका लक्ष्य यही होना चाहिए. ‘मुक्ति’ को ही परम लक्ष्य होना चाहिए तभी आदमी एक दूसरे स्तर पर जी सकेगा.

इस तरह से ‘मुक्ति’ का चरितार्थ होना ‘मुक्ति’ से भी ‘मुक्ति’ की ओर ले जाएगा. तभी हम सही मायनों में अपने देश की आज़ादी को इस देश के हर इंसान के लिए सार्थक बना सकेंगे और पूरी दुनिया के लिए नजीर बन सकेंगे.

अंत में जैसी भी और जितनी भी आज़ादी है, सभी को उसकी मुबारकबाद...

(लेखक इतिहासकार हैं)

अंकित पाठक से बातचीत पर आधारित लेख

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