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भूखा सोने को भी तैयार है ये देश मेरा, आप परियों के उसे ख्वाब दिखाते रहिए

भारत की आजादी के 70 साल पूरे होने पर गोपालदास नीरज का खास लेख

Gopaldas Neeraj Updated On: Aug 14, 2017 05:36 PM IST

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भूखा सोने को भी तैयार है ये देश मेरा, आप परियों के उसे ख्वाब दिखाते रहिए

हां मुझे याद है, जब पहली बार मुझे लगा कि हम आजाद हैं. लगा कि अपने लोगों के बीच कुछ भी बोला जा सकता है और सुना जा सकता है. बंधन में भी स्वतंत्रता क्या होती है! बात 1975-76 की है. उस वक्त देश में इमरजेंसी लगी हुई थी. सरकार के खिलाफ कुछ भी लिखना अपराध था. उस समय ऐसा लग रहा था कि ब्रिटिश हुकूमत अभी हिंदुस्तान से गई नहीं है. पर कवि हृदय कहां मानता? कवि-साहित्यकार में तो देश की आत्मा बसती है. और जिस दिन उसकी आवाज या लेखनी पर संगीनों के साए मंडराने लगते हैं, देश पतन की तरफ चल देता है. उस वक्त मैंने एक कविता लिखी थी-

फूलों की आंखों में आंसू उतरा है रंग बहारों का

लगता है आने वाला है फिर से मौसम अंगारों का

आंतरिक सुरक्षा के भय से बुलबुल ने गाना छोड़ दिया

गोरी ने पनघट पर जाकर गागर छलकाना छोड़ दिया.

ये कविता सरकार के विरोध में थी. मगर एक कवि सम्मेलन में मुझे कांग्रेस के एक बहुत बड़े नेता ने आग्रह कर इसे गाने को कहा. तब लगा कि आज मैं आजाद भारत में हूं. लेकिन 1942 में ऐसी ही एक कविता लिखने पर मुझे देहरादून छोड़कर भागना पड़ा था, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने मेरी गिरफ्तारी के वारंट निकाल दिए थे. तब मैंने लिखा था -

मैं विद्रोही हूं जग में विद्रोह करने आया हूं

बहुत कुछ बदल गया है, चाहे शोर समय का या जोर हवाओं का.

सोच, विचारधाराएं, पहनावा, शिक्षा, स्थिति परिस्थितियां ऐसी हैं कि आज हम चंद्रमा पर फतह कर रहे हैं. उस वक्त देश सुई बनाना भी नहीं जानता था, आज हवाई जहाज बना रहा है. बड़ी बड़ी इमारतें, बिजली की रफ्तार से दौड़ते जहाज, मीलों भागती ट्रेन और उसमें दौड़ती जिंदगी. भौतिक दृष्टि से देश बहुत संपन्न हुआ है. लेकिन इस संपन्नता में हम अपने मूल्यों को कई मील पीछे छोड़ आए हैं. हम लोगों का नैतिक पतन हुआ है.

सभ्यता कहां आ गई? कहां है खड़ा विश्व

जा रहा है किधर गति-रथ विज्ञान कलाओं का

किस दिशि उन्मुख इतिहास? दे रहा यह विकास

क्या शोर समय का है? क्या जोर हवाओं का

गांधी का देश यही? सुभाष की यही भूमि

है कैद जहां आजादी सेफ तिजोरी में?

वेदों उपनिषदों गीता का क्या यही मर्म

हो जाय आदमी बंद नाज की बोरी में...

सारी व्यवस्था अब अर्थ-प्रधान हो गई है. पैसा एक बहुत बड़ी जरूरत हो गया है. पहले लोग मां-बाप को धन समझते थे. अब पैसा ही माई-बाप हो गया है. लेकिन इससे अलग भी बहुत कुछ है. आज उम्र के इस पड़ाव पर जब हमारे बालों में सिर्फ चांदी ही शेष रह गई है. इस लहलहाते चमन को देखता हूं तो नई पीढ़ी दिखाई देती है. हम लोग तो बीता हुआ कल हैं. लेकिन -

हर एक नई पीढ़ी वह सीढ़ी है जिस पर

चढ़कर गत युग नीचे से ऊपर आता है

जैसे पुरवाई के झोंके पर हो सवार

बादल समुद्र से उठ नभ पर छा जाता है.

आज मन बार-बार दुखी हो जाता है. जिस तरह संसद में और चुनावों में अमर्यादित भाषा का प्रयोग होता है, उस को देखकर लगता है कि इस देश में अगर किसी चीज का पतन हुआ है तो वो राजनीति है.

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आजादी के इतने साल में अगर हमने किसी कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार नेता को देखा तो वो लाल बहादुर शास्त्री थे. हालांकि मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी बहुत सशक्त महिला थीं उनके जाने के बाद ही राजनीति का पतन शुरू हो गया. मैंने लिखा था -

नेताओं ने तो गांधी की कसम तक बेची

कवियों ने निराला की कलम तक बेची

मत पूछ इस दौर में क्या क्या न बिका

इंसानों ने आंखो की शरम तक बेची.

दरअसल ‘वसुधैव कुटुंबकम’, ‘सत्यम शिवम् सुंदरम’ हमारी संस्कृति है. लेकिन आजादी के बाद राजनीति ने सांप्रदायिकता को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया. धर्म-जाति के नाम पर लोगों को बांटा और लड़ाया गया. आज भी देश में जाति के नाम पर चुनावों में लोगों का टिकट दिया जाता है. जिस तरह के देश की कल्पना गांधी, नेहरू, सुभाष, अंबेडकर ने की थी वो प्रजातंत्र की इस भीड़ में खो गई है.

नही बने गुणतंत्र जब तक ये गणतंत्र

तब तक गणिकातत्रं ही होगा इसका मंत्र

नई पीढ़ी के सामने मुख्य रूप से दो चुनौतियां हैं. नौकरी और पैसा. पहले के मुकाबले नई पीढ़ी ज्यादा जागरूक है. पर उसमें संयम की कमी है. वो तुरंत अपनी मेहनत का फल चाहता है. शायद उसने आजादी में सांस ली है इसलिए उस तरह की राष्ट्रभावना कम देखने को मिलती है. इस नई पीढ़ी के नाम मेरा ये संदेश है.

साथियों शहीदों के लहू की कसम तुम्हें है

इन अंधियारों को उजियारों में बदल दो

टूटते मकानों को शिवालयों में बदल दो

बुझते चिरागों को सितारों में बदल दो

अब मैं थोड़ी बात अपनी कविता के बारे में करना चाहता हूं. जब मैं कविता का मुखड़ा लिखने के बारे में सोचता हूं तो नहीं लिख पाता. लेकिन जैसे ही मैं सोच से बाहर आकर सरल और सहज होता हूं, कविता खुद ब खुद लिख जाती है. इसी तरह पिछले 69-70 सालों में हर बार सवाल करता हूं कि आजादी और क्या चाहती है? इस पर विचार करना प्रारंभ करता हूं तो हर साल मैं 70 साल पीछे चला जाता हूं.

प्रेम, सद्भाव, भाईचारा, ईमानदारी, निष्ठा, राष्ट्रचेतना...ये सारे विचार मेरे मन में आते हैं. लेकिन साल दर साल समय पंख लगा कर उड़ता गया. मैं उसके पदचिंह्न ढूंढता रहा. 70 साल में हर साल एक नया शब्द मेरे आजादी के विचार में जुड़ता रहा. और आजादी का घड़ा खाली होता गया. अब मेरे पास 70 शब्द हैं. मैं तो सिर्फ ये चाहता हूं कि किसी तरह से कोई इन 70 शब्दों में से सिर्फ एक शब्द का बोझ हल्का कर दे, ताकि मैं हंसी खुशी 71वें साल में दाखिल हो सकूं.

जागते रहिए जमाने को जगाते रहिए

मेरी आवाज में आवाज मिलाते रहिए

भूखा सोने को भी तैयार है ये मेरा देश

आप परियों के उसे ख्वाब दिखाते रहिए

(गोपादास नीरज आजादी के वक्त करीब 22 वर्ष के थे. नीरज देश के सबसे सम्मानित कवियों में हैं. यह लेख उनके बेटे मृगांक प्रभाकर ने उनसे बात करके लिखा है.)

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