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कैमरे के पीछे काम करते अमिताभ को देखना अद्भुत अनुभव है

अमिताभ शायद इकलौते ऐसी फंतासी हैं जिन्हें आप और आपके पिता दोनों ने अपने बचपन में अनुभव किया हो.

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Oct 11, 2017 10:34 AM IST

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कैमरे के पीछे काम करते अमिताभ को देखना अद्भुत अनुभव है

अमिताभ बच्चन आज हिंदुस्तान में उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं जहां वो हर चीज़ से परे बस अमिताभ हैं. किसी के लिए अमित जी, किसी के लिए बच्चन साहब, किसी के लिए विजय दीनानाथ चौहान तो किसी के लिए दीवालिया होने की कगार पर पहुंचकर वापसी करने वाला महानायक. हर किसी के पास एक अपना बच्चन है. ये सारे बच्चन अपने-अपने आयाम में एक साथ भी हैं और अलग भी.

जब शोले रिलीज हुई थी तो मेरी मां ने हाईस्कूल की परीक्षा दी थी. मगर शोले मेरे बचपन की सबसे सुखद फैंटेसी भी रही. हम दोनों के बीच शायद ही कोई ऐसी और साझा याद रही हो. आज जब हम एक साथ (यहां हम से आप कोई भी सामान्य भारतीय दो पीढ़ियां मान सकते हैं) बैठकर कौन बनेगा करोड़पति को टीवी पर देख रहे होते हैं तो दरअसल हम अपने-अपने बचपन की फैंटेसी को एक साथ जी रहे होते हैं.

ऐसा नहीं है कि बच्चन साहब आलोचना से परे होकर देवता तुल्य हो गए हों. समय-समय पर बदलती राजनीतिक विचारधाराओं, ट्विटर पर किसी गलत ट्वीट या संपत्ति से जुड़े मामलों में उनकी खूब आलोचना हुई है. लेकिन शायद यही है जो उन्हें और लोकप्रिय बनाए रखता है. नायक जब आलोचना से परे हो जाते हैं तो उनके और बढ़ने की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं.

सवाल है कि अमिताभ के बारे में और क्या लिखा जाए? लोग सबकुछ तो जानते ही हैं. चलिए एक निजी अनुभव साझा करते हैं. कुछ साल पहले की बात है. कुछ लिखने का एक काम हाथ आया. बातचीत जंच गई और मामला तय हो गया. टीवी पर प्रसारित होने वाले एक खास शो की स्क्रिप्ट लिखनी थी. कुल चार लोगों को 20 दिनों तक ये काम करना था.

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पहले दिन प्रोड्यूसर ने काम समझाना शुरू किया. बात करते-करते कहा कि ये-ये बातें मत लिखना, बिगबी नहीं पढ़ेंगे. उस समय कुछ समझ नहीं आया. रात को घर जाते वक्त अचानक से लगा कि अरे, कहीं इस शो की स्क्रिप्ट को अमिताभ तो नहीं पढ़ने वाले. लगा नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. एक लगभग अंजान संघर्षरत युवा की ऐसी किस्मत कहां. हिम्मत ही नहीं हुई कि पूछा जाए. मगर कुछ ही दिन में साफ हो गया कि ये सपने जैसी घटना हकीकत है.

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बीच के हिस्से को यहीं छोड़कर सीधे पहुंचते हैं शो के दिन. लाइव इवेंट्स बड़ी मारामारी वाला काम है. बिलकुल अलग-अलग तरीके से काम करने वाले बिना किसी खास तैयारी के एक साथ काम कर रहे होते हैं. इस भरोसे के साथ कि दूसरे ने अपनी जिम्मेदारी पूरी मुस्तैदी से निभाई होगी. अगर एक ने गड़बड़ की तो सब जाएगा और टीवी पर लाइव चल रहे शो को संभाला भी नहीं जा सकता.

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बच्चन साहब तैयारियों के लिए सेट पर आए. पहले ही निर्देश दे दिया गया था कि कोई भी सेल्फी नहीं लेगा. क्योंकि काम करना था. आने के बाद उन्होंने माइक लगाया और पर्दे के पीछे काम कर रहे लोगों का नाम पूछा. इसके बाद रिहर्सल शुरू हुई. 70 साल के उस सुपर स्टार को वो नाम याद थे. और वो कोई भी निर्देश बाकायदा नाम लेकर दे रहे थे. अंदर बैठे एक दो लोगों को हिलाकर बताना पड़ा कि बिगबी तुम्हारा नाम ले रहे हैं, जवाब दो. अमिताभ बच्चन के मुंह से अपना नाम सुनने की आदत तो बिरलों को ही होगी.

आप उनकी तमाम बातों की आलोचना कर लीजिए. कुछ भी कह लीजिए मगर सच ये है कि इस उम्र में इस स्टारडम के साथ उनका काम के प्रति ये समर्पण अद्वितीय है. हम नए दफ्तर में जाते हैं तो साथियों के नाम याद करने में हफ्ता भर ले लेते हैं. इसके बाद उनके अंदर काम करने की ऊर्जा. पहली बार शो कर रहे किसी न्यूकमर की शिद्दत से पूरी रिहर्सल की. ब्रेक हुआ तो बच्चों के साथ जमीन पर बैठ गए. समय पूरा होते ही अपनी वैन में वापस. यकीन मानिए 20 से 40 की उम्र के 200 से ज्यादा प्रोफेशनल्स से कहीं ज्यादा जोश और ऊर्जा उस 70 साल के आदमी में थी.

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किसी भी बड़े आदमी के करीब जाने पर उसके बड़े होने के आभामंडल में दरारें पड़ने लगती हैं. अमिताभ भी इसका अपवाद नहीं हैं. उनके बारे में भी तमाम बातें सुनने को मिलती हैं. किंतु वो जिस वजहों से अमिताभ हैं उस कद को पूरी जिम्मेदारी से निभाते भी हैं.

ये मेरे वाले अमिताभ का मेरा अनुभव था. आप अपनेवाले अमिताभ के अनुभव भी बताइएगा. मुझे अपनी उनसे एकमात्र मुलाकात पर उनका ही डायलॉग याद आ रहा है, कि साला एक ही मारा मगर सॉलिड मारा.

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