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हमारे राष्ट्रपति: प्रतिभा पाटिल- विवादों के साये में बीता कार्यकाल

प्रतिभा पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं थीं

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa | Published On: Jul 17, 2017 10:30 AM IST | Updated On: Jul 17, 2017 10:30 AM IST

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हमारे राष्ट्रपति: प्रतिभा पाटिल- विवादों के साये में बीता कार्यकाल

क्या सचमुच किसी दलित, महिला या अल्पसंख्यक का राष्ट्रपति पद पर पहुंचना इस बात की पक्की सूचना है कि इन वर्गों की राजनीतिक भागीदारी के सवाल को नकारना राजनीतिक दलों के लिए असंभव हो गया है?

राष्ट्रपति पद के लिए बीते दो दशक में हुए चुनाव-परिणामों को ध्यान रखें तो उत्तर होगा- हां!

लेकिन राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन हो- इस सवाल पर पार्टियों के बीच चलने वाले घमासान पर नजर रखें तो लगेगा किसी दलित, महिला या अल्पसंख्यक का राष्ट्रपति बनना एक संयोग भर है, पार्टियों की पहली प्राथमिकता कतई नहीं.

इन वर्गों से कोई व्यक्ति राष्ट्रपति पद तक पहुंच पाया तो इसलिए कि सत्ताधारी दल या गठबंधन को लगा वह रोजमर्रा के राजनीतिक फैसले के लिहाज से उसके एजेंडे के अनुकूल साबित होगा.

राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी- दो दशक की कहानी

मिसाल के लिए 1992 में राष्ट्रपति पद के चुनाव हुए तो वीपी सिंह और रामविलास पासवान ने कहा कि दलित समुदाय के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए लेकिन वाममोर्चे को इनकार था. उसका तर्क था कि राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी चुनने के लिए सिर्फ दलित होने को आधार नहीं बनाया जा सकता. उस वक्त अल्पमत की सरकार चला रहे नरसिम्हाराव की पहली पसंद शंकरदयाल शर्मा थे.

इसी तरह केआर नारायणन को राष्ट्रपति पद के लिए चुनने की बारी आई तो 1997 में सारी पार्टियां सहमत थीं लेकिन शिवसेना अड़ गई. उसने पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को अपना उम्मीदवार बनाया. ध्यान यह भी रखना होगा कि संयुक्त मोर्चा और कांग्रेस की तरफ से केआर नारायणन की उम्मीदवारी का एलान होने के ऐन पहले तक खींचतान कायम थी.

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संयुक्त मोर्चा की ओर से प्रधानमंत्री पद की कुर्सी संभाल चुके एचडी देवगौड़ा को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने के लिए कर्नाटक विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित किया था. आखिरी पलों में देवगौड़ा ने कहा कि राष्ट्पति बनने में मेरी कोई रुचि नहीं है.

दूसरे, सांसदों के एसटी-एससी फोरम के अध्यक्ष कांग्रेस के सांसद जी वेंकटस्वामी ने साफ कह दिया था कि केआर नारायणन ना तो कभी दलित-आंदोलन के नेता रहे हैं और न ही स्वतंत्रता सेनानी, सो किसी दलित को बेशक राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाय लेकिन केआर नारायणन को नहीं क्योंकि उन्होंने दलित-समुदाय के सशक्तीकरण के लिए कुछ भी नहीं किया.

बेशक अल्पसंख्यक समुदाय के एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में वाममोर्चा को छोड़कर बाकी पार्टियां सहमत हुईं लेकिन जगजाहिर तथ्य तो यही है कि खुद एपीजे को भी पता ना था कि पार्टियां राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम पर भी विचार कर सकती हैं.

महाराष्ट्र के राज्यपाल पी. सी अलेक्जेंडर, उपराष्ट्रपति कृष्णकांत या फिर केसी पंत और कर्ण सिंह के नामों पर विचार न कर सत्ताधारी एऩडीए ने उस वक्त एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्पति पद का उम्मीदवार बनाया तो इसलिए कि उनका ‘अराजनीतिक’ होना उसे अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए अनुकूल लगा.

कलाम का मिसाइल मैन के रुप में प्रसिद्ध होना उग्र राष्ट्रवाद की राजनीति में सहायक था और देश की ज्यादातर समस्याओं का समाधान प्रौद्योगिकी की प्रगति में खोजने का उनका विचार भी किसी सत्ताधारी दल के लिए बहुत आकर्षक था. राष्ट्र को अगर कल-पुर्जों से बनी मशीन मान लिया जाय तो फिर राजनीतिक इच्छा-स्वातंत्र्य का सवाल एकदम ही गौण हो जाता है और किसी केंद्रीकृत शासन के लिए इससे बेहतर स्थिति क्या होगी!

2007 में प्रतिभा पाटिल देवी सिंह पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं और एक इतिहास कायम हुआ लेकिन तथ्य बताते हैं, उनका भी इस पद के लिए चुना जाना एक संयोग ज्यादा है, महिला हितों की पक्षधर राजनीति का मामला कम.

प्रतिभा देवीसिंह पाटिल की उम्मीदवारी की कहानी

राष्ट्पति पद के लिए प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के नाम का एलान यूपीए ने 14 जून 2007 को किया. एलान से ऐन पहले तक की सियासी कहानी बताती है कि प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का नाम कहीं चर्चा में भी ना था.

यूपीए और एनडीए से अलग एआईएडीएमके, समाजवादी पार्टी और तेलुगु देशम पार्टी ने यूनाइडेट नेशनल प्रोग्रेसिव अलायंस(यूएनपीए) बनाकर कहा कि ‘राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल के नाम का एलान कर एक मजाक किया है. हम एपीजे अब्दुल कलाम को दूसरी बार भी राष्ट्रपति के रुप में देखना चाहते हैं.’

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यूएनपीए का एक प्रतिनिधि-मंडल 20 जून को अपनी इस इच्छा के साथ कलाम से मिला भी.लेकिन कलाम का जवाब था कि जब मेरे नाम पर सर्व-सहमति कायम नहीं हो जाती, मैं अपनी उम्मीदवारी पर सहमति नहीं दे सकता. वे कुछ दिन और इंतजार कर भांपना चाहते थे कि उनकी जीत सुनिश्चित है या नहीं. बाद में उन्होंने उम्मीदवारी की दौड़ से अपना नाम बाहर रखने का फैसला किया.

यूपीए अपने गठबंधन के साथियों को समझाना चाह रही थी कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर कर्ण सिंह या फिर शिवराज पाटिल के नाम सहमति हो जाय. ये नाम चर्चा में नहीं आते अगर कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी के नाम से इनकार ना किया होता.

वाममोर्चा की राय थी कि प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना चाहिए लेकिन कांग्रेस को लग रहा था कि प्रणब मुखर्जी के बगैर सरकार चलाने में बहुत मुश्किल आएगी. कांग्रेस ने वाममोर्चा से कहा कि यूपीए के कामकाज के लिए प्रणब मुखर्जी बहुत अहम हैं सो उनको राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाने के बारे में हमारी पार्टी नहीं सोच सकती.

गठबंधन के साथियों से सहमति कायम करने के लिए बैठक हुई. वाममोर्चा ने कहा कि कांग्रेस चाहे तो हम अर्जुन सिंह या फिर मोतीलाल वोरा के नाम पर सहमत हो सकते हैं. लेकिन कांग्रेस का तर्क था कि इन दोनों नेताओं की सेहत की दशा ऐसी नहीं कि राष्ट्रपति पद की जिम्मेवारी संभाल सकें.

बात को कहीं पहुंचता न देख बैठक में शामिल सीपीआई के डी राजा ने कहा कि पुरुषों के नाम पर कोई सहमति नहीं बन रही तो फिर क्यों ना किसी महिला प्रत्याशी के नाम पर विचार करके देख लें. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देखा कि डी राजा महिला प्रत्याशी के नाम पर हां कह सकते हैं तो उन्होंने झट से प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का नाम सुझाया.

प्रतिभा देवीसिंह उस वक्त राजस्थान की राज्यपाल थीं लेकिन बैठक में शामिल वाममोर्चा के ज्यादातर नेता इस नाम पर चुप्पी साधे रहे, शायद उन्हें यह नाम एकदम ही अनजाना लगा.

ऐसे में बात को आगे बढ़ाने का मोर्चा संभाला सीपीआई के महासचिव एबी वर्धन ने. नागपुर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के दौरान वामपंथी विचारधारा से जुड़ने वाले एबी वर्धन ने ही बैठक में शामिल नेताओं को याद दिलाया कि प्रतिभा देवीसिंह पाटिल 1962 से 1985 के बीच महाराष्ट्र विधानसभा की सदस्य थीं और वहां की कांग्रेसी सरकार में 1967 से लगातार विभिन्न मंत्रालयों का प्रभार संभाला.

1985 में राज्यसभा का सदस्य बनने से पहले 1979 की जुलाई से 1980 के फरवरी तक महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाई और 1991 में लोकसभा के लिए चुनी गईं.

एबी वर्धन को उस वक्त यह भी याद था कि प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के पति देवीसिंह रामसिंह शेखावत कभी अमरावती के मेयर के पद पर थे.

यूपीए में तो प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के नाम पर सहमति बन गई लेकिन उनकी उम्मीदवारी को एनडीए की तरफ से कड़ी टक्कर मिली. उस वक्त ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति पद के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का प्रस्ताव किया था. एनडीए के नेता वाजपेयी के नाम से सहमत थे लेकिन वाजपेयी ने एक बयान जारी कर स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रपति बनने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं हैं.

एनडीए ने भैरोसिंह शेखावत पर अपना भरोसा जताया. राजस्थान के ‘सिंह’ और ‘बाबोसा’( परिवार का मुखिया) कहलाने वाले भैरोसिंह शेखावत उस वक्त उप-राष्ट्रपति थे. कांग्रेस के सुशील कुमार शिंदे को हराकर वे 2002 में इस पद पर नियुक्त हुए थे. प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के मुकाबिल वे स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में प्रत्याशी बने.

लेकिन, संख्याबल के लिहाज से यूपीए की एकता भारी साबित हुई. बीएसपी और डीएमके ही नहीं शिवसेना ने भी प्रतिभा देवीसिंह पाटिल की उम्मीदवारी का समर्थन किया था. ऐसे में भैरोसिंह शेखावत चुनाव हार गये. उन्हें 3 लाख 31 हजार वोट मिले और प्रतिभा सिंह पाटिल को 6 लाख 38 हजार वोट!

शुरू से आखिर तक विवाद ही विवाद

राष्ट्पति पद के उम्मीदवार के रुप में नाम की घोषणा से लेकर कार्यकाल के बाद तक प्रतिभा देवीसिंह पाटिल विवादों के घेरे में रहीं. दिलचस्प यह भी है कि उन पर आरोप सिर्फ विपक्ष के नेताओं ने ही नहीं अपनी पार्टी के नेताओं ने भी लगाये. हद तो यह है कि कार्यकाल की समाप्ति के बाद भी विवादों से उनका पिंड नहीं छूटा.

प्रतिभा देवीसिंह पाटिल की उम्मीदवारी का एलान होने पर बीजेपी ने उनके खिलाफ एक सार्वजनिक अभियान चलाया. वेबसाइट के जरिए चलाए जाने वाले इस अभियान (‘नो प्रतिभा पाटिल’ यानी प्रतिभा पाटिल को जानिए) का उद्देश्य था लोगों को यह बताना कि प्रतिभा देवीसिंह पाटिल देश की राष्ट्रपति बनने लायक नहीं हैं.

अभियान के अंतर्गत प्रतिभा पाटिल पर भ्रष्टचार का आरोप लगाते हुए कहा गया, 'जैसा कि भारतीय प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की खबरों से स्पष्ट है, श्रीमती पाटिल का नाम प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से भारतीय समाज को घुन की तरह चाट रहे ‘करप्शन’ और ‘क्रिमिनलाइजेशन ऑफ पॉलिटिक्स’ से जुड़ा हुआ है.'

उस वक्त यह मामला खूब उठाया गया कि प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का अपने स्वामित्व वाले संत मुक्ताबाई कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के वित्तीय कुप्रबंधन में हाथ रहा है. यह भी कहा गया कि जलगांव में 2004 में हुई वीजी पाटिल की हत्या में उनके भाई जीएन पाटिल की कथित संलिप्तता रही है.

2009 में अत्याधुनिक लड़ाकू विमान सुखोई के जरिए आकाश में 2.2 किलोमीटर की ऊंचाई पर 800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर इतिहास रचनेवाली देश की पहली महिला राष्ट्रपति के बारे में 2011 में उन्हीं की पार्टी के एक नेता ने कहा कि राष्ट्रपति का पद उन्हें इंदिरा गांधी की निजी सेवा करने के कारण मिला.

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उस वक्त राजस्थान के पाली जिले के एक गांव में जिला कांग्रेस कमिटी के सदस्यों के बीच बोलते हुए राजस्थान के पंजायती राज और वक्फ मामलों के राज्यमंत्री अमीन खान ने कहा था कि ‘1977 में इंदिरा गांधी चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो गईं तो प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने उनके रसोई-बर्तन का काम किया और उसी सेवा के बदले में सोनिया गांधी ने उन्हें राष्ट्रपति के पद पर बैठाया है.’

राष्ट्रपति रहते उन्होंने जो विदेश यात्राएं की वह भी विवादों के साये में रहीं. सूचना के अधिकार कानून के तहत डाली गई अर्जियों के हवाले से मीडिया में खबर आई कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अपनी 12 विदेश यात्राओं में 4 महादेशों के 22 देशों का दौरा किया और विदेश में कुल 79 दिन बीताए जिसपर देश के कुल 205 करोड़ रुपए खर्च हुए जो कि अब तक के राष्ट्रपतियों की विदेश यात्रा पर हुए खर्चे से अधिक है. यात्राओं में विशेष रुचि रखने वाले एपीजे अब्दुल कलाम भी अपने कार्यकाल में महज 7 दफे विदेश यात्रा पर गये और इस दौरान 17 देशों का दौरा किया.

विवादों ने प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का पीछा रिटायरमेंट के बाद भी नहीं छोड़ा. उनपर पूना में जमीन कब्जाने के आरोप लगे. समाचारों में आया कि सेना के उपयोग की एक जमीन का 2.61 लाख वर्गफीट हिस्सा प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को आवंटित किया गया है जिसपर 4500 वर्गफीट का बंगला बनाया जाना है.

नियमों के मुताबिक रिटायरमेंट के बाद अगर कोई उचित सरकारी आवास उपलब्ध न हो तो राष्ट्रपति के लिए लीज पर 2000 वर्गफीट का कोई आवास लिया जा सकता है. अगर रिटायर हो चुके राष्ट्रपति को सरकारी आवास दिया जाता है तो वह अधिकतम 5498 वर्गफीट का हो सकता है जो कि किसी केंद्रीय मंत्री को दिये जाने वाले आवास का अधिकतम दायरा होता है. विवाद के बाद उन्होंने यह बंगला न लेना उचित समझा.

राष्ट्रपति के रुप में प्रतिभा पाटिल ने फांसी की सजा पाये अपराधियों की माफी की अर्जी पर आश्चर्यजनक तेजी से फैसले लिए. इसकी आलोचना करते हुए कहा गया कि उन्होंने जिन 35 अपराधियों की फांसी की सजा को आजीवन करावास में बदलकर एक रिकॉर्ड कायम किया है वे क्रूरतम अपराधों के दोषी थे और इस कारण उनकी फांसी की सजा माफ करने लायक नहीं थी.

दो साल पहले (जुलाई 2015) मे खबर आई थी कि पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल चाहती हैं कि केंद्र सरकार उनके परिवहन का भार उठाते हुए दी गई सरकारी गाड़ी और उनके निजी वाहन दोनों के ईंधन का खर्चा दे. नियम यह है कि अगर रिटायर राष्ट्रपति अगर निजी वाहन इस्तेमाल करें तो उन्हें ईंधन का भत्ता दिया जाएगा या फिर उन्हें उपयोग के लिए सरकारी वाहन दिया जायेगा.

विवादों से परे एक अहम बात

अगर विवादों की अनदेखी करें तो प्रतिभा देवीसिंह पाटिल को उनकी अच्छाइयों के लिए याद करने के पर्याप्त कारण हैं.

मिसाल के लिए फांसी की सजा माफ करने के उनके रिकॉर्ड को ही लें. बेशक उन्होंने 35 मुजरिमों की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदला लेकिन इसके बारे कोई भी राय बनाने से पहले हमें तीन प्रश्नों का उत्तर देना होगा.

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एक तो यह कि अच्छा क्या है- फांसी की सजा पाए मुजरिमों के माफीनामे की अर्जी पर किसी सोच-विचार को लटकाये रखना या उसपर हां-ना में कोई फैसला लेना. दूसरा यह कि फांसी की माफीनामे की हर अर्जी को राष्ट्रपति नकारे तो फिर उसे इस बाबत हासिल अधिकार का क्या औचित्य रह जाता है? और तीसरे यह कि फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने से क्या देश या समाज को किसी हानि की आशंका है, अगर हां, तो इस आशंका का आधार क्या है ?

इन तीनों प्रश्न का एक झटके में निश्चित उत्तर देना बहुत मुश्किल है, खासकर जब आप फांसी की सजा के फायदे-नुकसान को लेकर चलने वाली विश्वव्यापी बहस को ध्यान में रखें. फांसी के माफीनामे की अर्जियों पर प्रतिभा पाटिल के फैसले की आलोचना पर सवाल उठाते हुए सोचना होगा कि कहीं हम राष्ट्रपति को उदारता और दया-भावना दिखाने का दोषी तो नहीं ठहरा रहे.

लोकसभा और राज्य विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के विधेयक पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के रुख की बड़ी कम चर्चा हुई है. 2006 के सितंबर में यह बिल पहली बार पेश हुआ था. उस वक्त लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव ने इस बिल के पारित होने में अड़ंगे लगाए, आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग की गई.

उसके बाद से इस बिल पर तकरार बनी रही. 2010 के मार्च में कानून मंत्री वीरप्पा मोईली ने राज्यसभा में इस बिल को पेश किया तब भी हंगामा हुआ. इस हंगामे पर पत्रकारों ने महिला-दिवस (8 मार्च) के दिन प्रतिभा पाटिल से राष्ट्रपति भवन में सवाल पूछा. प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का जवाब था कि बिल राज्यसभा में पास हुआ है तो लोकसभा को भी चाहिए कि पर्याप्त सोच-विचार के बाद उसे पास कर दे. जैसे पंचायती-राज कानून की दिक्कतें एक समय के बाद खत्म हो गईं वैसे ही इस कानून से जुड़ी दिक्कतें भी कालक्रम में खत्म हो जायेंगी. कानून से महिलाओं की राजनीति में भागीदारी का रास्ता बन सकेगा.

महिला रिजर्वेशन बिल लोकसभा में पास नहीं हुआ और अब यह एक ‘लैप्स बिल’ है लेकिन राष्ट्रपति की सोच में शामिल सवाल अब भी प्रासंगिक है कि आखिर हमारी राजनीति आधी आबादी यानी महिलाओं की चुनावी राजनीति में भागीदारी के सवाल से कबतक मुंह चुराएगी.

यह बात भी याद रखी जानी चाहिए कि देश की पहली महिला राष्ट्रपति ने महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए अपने कई विशेष प्रयास किए. 2008 में राज्यपालों की एक विशेष बैठक में उन्होंने कहा कि महिलाओं की जीवनदशा सुधारने के खयाल से एक रिपोर्ट तैयार की जाए. इस रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर ही महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत ‘महिला सशक्तीकरण का राष्ट्रीय मिशन’ बनाया गया. 8 मार्च 2010 के दिन इसकी शुरुआत हुई. तब से महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक दशा के सुधार का यह मिशन राष्ट्रव्यापी रुप ले चुका है.

प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने अपनी कार्यकाल की समाप्ति पर कहा था- ‘मेरी इच्छा है कि लोग मुझे एक ऐसे राष्ट्रपति के रूप में याद करें जिसने लोक-कल्याण में रुचि ली.' लेकिन उनके कार्यकाल की समाप्ति के बाद उठे विवादों से ऐसा नहीं लगता कि देश की पहली महिला राष्ट्रपति की यह इच्छा आगे किसी समय पूरी हो सकेगी.

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