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हमारे राष्ट्रपति कलाम जो जिंदगी भर एक कमरे में रहे और उनके साथ पूरा देश रहा

सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े पद पर बैठे विज्ञान के इस संत के पास देश के लिए इस स्वप्न के सिवाय और कुछ भी ना था.

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa | Published On: Jul 13, 2017 05:28 PM IST | Updated On: Jul 13, 2017 05:28 PM IST

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हमारे राष्ट्रपति कलाम जो जिंदगी भर एक कमरे में रहे और उनके साथ पूरा देश रहा

सारे अनुमान धरे के धरे रह गए, जब तक एलान नहीं हो गया कोई सूंघ भी ना पाया कि रामनाथ कोविंद सत्ताधारी दल की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार होंगे. और एलान सामने आया तो विपक्ष चारों खाने चित्त! उसे देर तक ना सूझा कि भारतीय गणतंत्र के सर्वोच्च पद के चुनावी मुकाबले में अब वह अपना दांव किसपर लगाए?

एकता कायम करने की विपक्ष की मंशा में सेंध लग गई, तय हो गया कि विपक्ष अब चाहे जिसे भी अपना उम्मीदवार बनाए हार सुनिश्चित है!

कुछ ऐसा ही हुआ था अब से 15 साल पहले. बेशक सीटों की संख्या इतनी ना थी लेकिन सत्ता की बागडोर उस वक्त भी बीजेपी के ही हाथ में थी. दौर गठबंधनी सरकारों का था और हर पार्टी चाह रही थी कि उसकी पसंद का कोई व्यक्ति राष्ट्रपति बने ताकि आगे मिली-जुली सरकार बनाने का संयोग हो तो वह राष्ट्रपति से कुछ उम्मीद पाल सके.

पंद्रह साल पहले का वाकया

तब चर्चा में कई नाम थे, लेकिन इनमें दो की दावेदारी मजबूत जान पड़ रही थी. बीजेपी के एक हिस्से को लग रहा था कि महाराष्ट्र के तत्कालीन गवर्नर पी.सी अलेक्जेंडर राष्ट्रपति पद के लिए बेहतर उम्मीदवार साबित होंगे.

महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना की सरकार (1994-1999) के वक्त उन्होंने कोई अड़ंगे नहीं डाले और फिर 1993 के दंगे को लेकर श्रीकृष्णा कमीशन की रिपोर्ट आई(1998) तब भी उनका रुख नरम ही रहा.

एक बात और थी- उनका ईसाई धर्म समुदाय का होना भी एक लिहाज से बीजेपी की हिंदुआनी छवि को उदार बता सकने में मददगार साबित हो सकता था.

पीसी अलेक्जेंडर के बरक्स एक नाम तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत का चर्चा में था. दरअसल उप-राष्ट्रपति के लिए उन्हें संयुक्त मोर्चा और कांग्रेस ने सहमति से अपना उम्मीदवार बनाया था और विचारधारा के लिहाज से भी वे विपक्ष के लिए ज्यादा अनुकूल थे.

मोरारजी देसाई (scoopwhoop)

इमरजेंसी के बाद के समय में मोरारजी देसाई की सरकार जिन वजहों से गिरी उसमें एक भूमिका दोहरी सदस्यता वाले मामले की भी थी. मधु लिमये के साथ कृष्णकांत ने ही यह सवाल सरगर्म किया कि आरएसएस का सदस्य रहते हुए कोई जनता पार्टी का मेंबर नहीं हो सकता.

राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए चर्चा में एक नाम एल.एम सिंघवी का भी था. संविधान विशेषज्ञ सिंघवी को नरसिम्हाराव की सरकार में लंदन में उच्चायुक्त बनाया गया था और 1998 में बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा में सांसद बनाया.

बीते वक्त में ‘लोकपाल’ जैसी भ्रष्टाचार विरोधी संस्था का प्रस्ताव करने वाले सिंघवी अपने लंबे अनुभव के कारण जितने अटलबिहारी वाजपेयी को प्रिय हो सकते थे उतने ही सोनिया गांधी को भी, फिर वैश्वीकरण के समय में अनिवासी भारतीयों के बीच भी उनकी छवि बड़ी चमकदार थी.

कांग्रेस का एक हिस्सा कर्ण सिंह के नाम पर गोलबंद हो रहा था और हिन्दू धर्म की उदारवादी व्याख्या वाले कर्णसिंह बीजेपी को भी पसंद आ सकते थे. ऐसा एक नाम के.सी. पंत का भी था. योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके केसी पंत को बीजेपी का भी विश्वास हासिल था और कांग्रेस का भी. वाजपेयी ने उन्हें कश्मीर-समस्या के समाधान के लिए उन्हें अपना दूत बनाया था. बीजेपी से जुड़ने से पहले वे कांग्रेस की सरकार में रक्षामंत्री का पद संभाल चुके थे और गोविन्दवल्लभ पंत के पुत्र के रुप में उनकी राजनीतिक विरासत भी बहुत चमकीली थी.

राष्ट्रपति पद के लिए 2002 के चुनावों में एक नाम के.आर. नारायणन का भी था. कार्यकाल की समाप्ति की घड़ी में वे चाह रहे थे कि राजनीतिक दलों में सहमति कायम हो और अगले पांच साल के लिए फिर से उन्हें मौका मिले. लेकिन विचारों के मामले में सत्ताधारी बीजेपी से उनका छत्तीस का रिश्ता था सो विपक्ष तो उनके नाम पर हां कह सकता था लेकिन बीजेपी नहीं.

पीसी अलेक्जेंडर, कर्णसिंह या फिर के सी पंत की तुलना में के.आर नारायणन की दावेदारी कमजोर आंकी जा रही थी.

लेकिन जब सत्ताधारी दल ने अपने राष्ट्रपति पद के नाम का ऐलान किया तो सारे अनुमान धराशायी हो गये. चयन ऐसा था कि कांग्रेस सहित विपक्षी बहुत से दलों के लिए ना कहना मुश्किल हो गया. यह नाम था एपीजे अब्दुल कलाम का !

सक्रिय राजनीति से उनका दूर से भी कोई नाता नहीं था. राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार चुने जाने से वे ना तो कभी उप-राष्ट्रपति थे, ना लोकसभा के स्पीकर और ना ही सांसद या फिर राज्यपाल. के.आर नारायणन और डा. राधाकृष्णन की तरह उन्होंने विदेशों में राजदूत की भी भूमिका नहीं निभायी थी.

सो चलन के हिसाब से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए उनके नाम का प्रस्ताव बहुत चौंकाऊ था, चौंकाऊपन का एक साक्ष्य यह भी है कि खुद एपीजे अब्दुल कलाम को भी ऐन वक्त तक खबर ना थी कि सत्ताधारी गठबंधन राष्ट्रपति पद के लिए उनके नाम पर भी विचार कर सकता है.

जब प्रधानमंत्री का फोन आया

एपीजे अब्दुल कलाम उस घड़ी (जून 2002) चेन्नई के अन्ना यूनिवर्सिटी में थे. 1992 की जुलाई से 1999 के दिसंबर तक विज्ञान के मामलों में प्रधानमंत्री के मुख्य सलाहकार और डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) के सचिव की भूमिका निभाने के बाद भारत का यह ‘मिसाइल मैन’ कॉलेज के छात्रों को पढ़ाने के अपने प्रिय काम पर लौट आया था.

2003 में 15 अगस्त पर पीएम वाजपेयी के साथ राष्ट्रपति कलाम.

2003 में 15 अगस्त पर पीएम वाजपेयी के साथ राष्ट्रपति कलाम.

अपनी किताब ‘टर्निंग प्वाइंटस्- ए जर्नी थ्रू चैलेंजेज’ मे वे लिखते हैं ‘2001 के दिसंबर से मैं अन्ना यूनिवर्सिटी में था. मिशन था कि सामाजिक बदलाव में तकनीक की भूमिका के बारे में कॉलेज के छात्रों को बताऊं. यों तो मेरी क्लास में कायदे से 60 ही विद्यार्थियों के लिए जगह थी लेकिन जब मेरा पीरियड शुरु होता तो छात्रों की तादाद 350 के भी पार पहुंच जाती. पीरियड एक घंटे से खिसककर दो घंटे का हो जाता लेकिन बीच में उसे रोकने का कोई तरीका ना नजर आता.’

‘ऐसा ही एक भरा-पूरा पीरियड खत्म करके मैं लौटा और लंच से निपटकर अगली क्लास के बारे में सोचता अपने कमरे की तरफ जा रहा था कि रास्ते में यूनिवर्सिटी के वीसी प्रोफेसर ए कलानिधि मिले. उन्होंने कहा कि आपके लिए दफ्तर में ढेर सारे फोन आ रहे हैं. कोई आपसे बात करने के लिए बहुत बेताब है और लगातार फोन कर रहा है. मैं कमरे में पहुंचा तो फोन की घंटी बज ही रही थी. मैंने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से आवाज आई कि ‘प्रधानमंत्री आपसे बात करना चाहते हैं.’ मैं इंतजार कर रहा था कि फोन प्रधानमंत्री से कनेक्ट हो कि इसी बीच आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने मुझे मेरे सेलफोन पर कॉल किया. उन्होंने मुझसे कहा कि आपको प्रधानमंत्री की ओर से फोन पर एक महत्वपूर्ण संदेशा मिलने वाला है और इसरार किया कि ‘आप ना मत कहना.’

चंद्रबाबू नायडू से फोन पर बात हो ही रही थी कि प्रधानमंत्री का फोन आ गया. कलाम साहब लिखते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने पूछा- ‘कलाम साहब, कैसा चल रहा है पढ़ाई-लिखाई का काम.’ सवाल के जवाब में एपीजे अब्दुल कलाम ने दो शब्द कहे- ‘बहुत अच्छा’!

इसके तुरंत बाद फोन पर प्रधानमंत्री ने कहा कि 'हमारे पास आपके लिए एक अहम संदेशा है. मैं अभी-अभी गठबंधन में शामिल दलों के नेताओं की बैठक से लौटा हूं. हमने सर्वसम्मति से फैसला किया है कि देश को राष्ट्रपति के रुप में आपकी जरुरत है. मुझे आज रात ही इसका एलान करना है. मुझे आपकी सहमति चाहिए. देखिए, मुझे आपसे सिर्फ ‘हां’ सुनना है, ‘ना’ मत कर दीजिएगा.'

एपीजे अब्दुल कलाम ने लिखा है- ‘मुझे कमरे में घुसने के बाद बैठने की भी मोहलत नहीं मिली थी. मेरे मन में भविष्य की अलग-अलग तस्वीरें उमड़ने लगीं. एक तस्वीर यह कि मैं छात्रों और शिक्षकों से घिरा हुआ हूं. दूसरी यह कि संसद को भावी भारत के अपने स्वप्न के बारे में संबोधित कर रहा हूं. जेहन में एक बार आ रहा था कि पढ़ाई-लिखाई का जीवन ही अबतक जीया है, वही मेरा प्यार है, उसी से राग है सो ऐसे जीवन से नाता छुड़ाना ठीक नहीं. दूसरा ख्याल यह आ रहा था कि अपने इंडिया 2020 का विजन संसद और राष्ट्र के सामने रखने का मौका है सो इस मौके को हाथ से नहीं निकलने देना चाहिए.'

दुविधा की ऐसी ही मनोदशा में उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा कि ‘वाजपेयी जी, मुझे दो घंटे का समय दीजिए. और हां, मेरी उम्मीदवारी सारी पार्टियों की सहमति से तय होनी चाहिए.'

आगे की तफसील थोड़े में यह कि बहुत सोच-विचार के बाद एपीजे अब्दुल कलाम ने तय किया कि मेरे पास विज्ञान के सहारे देश के नव-निर्माण का सपना है और राष्ट्रपति बनकर यह सपना पूरे देश के साथ साझा किया जा सकता है. सो उन्होंने सर्वसम्मति की शर्त पर अपनी उम्मीदवारी की बात मान ली.

सर्व-सम्मति भी एक हदतक बन ही गई. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से कांग्रेस इनकार नहीं कर सकती थी. इंदिरा गांधी के जमाने में रक्षा मंत्री रहते आर.वेंकटरमण ने आखिर जिसे देश के पहले मिसाइल कार्यक्रम इंटीग्रेटेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का प्रधान चुना था वही एपीजे अब्दुल कलाम अब मिसाइल मैन के रुप में प्रसिद्ध होकर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार थे. अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि के होने के कारण उनके प्रतीकात्मक महत्व से भी इनकार नहीं किया जा सकता था.

इससे भी ज्यादा महत्व की बात थी कि कलाम किसी पार्टी के ना थे, वे विज्ञान के प्रति अपनी निष्ठा और प्रतिभा के लिए मशहूर थे ना कि दलगत प्रतिबद्धताओं के लिए. कांग्रेस सहित सारी पार्टियां बाआसानी मान सकती थीं कि राष्ट्रपति के रुप में एपीजे अब्दुल कलाम ‘अराजनीतिक’ होने के कारण तटस्थ फैसले करेंगे.

कलाम के बारे में ‘अराजनीतिक’ होने की इसी धारणा ने 2002 के राष्ट्रपति पद के चुनावों को एकतरफा बनाया. सिर्फ वाममोर्चा ही उनके नाम से सहमत नहीं था. उसने स्वतंत्रता सेनानी और आजाद हिन्द फौज की प्रसिद्ध कमांडर लक्ष्मी सहगल को अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन मुकाबला एकतरफा साबित हुआ और कलाम 8 लाख से भी ज्यादा मतों के अन्तर से विजयी हुए.

कलाम के राष्ट्रपति बनने के बाद देशभर में कुछ इस तरह उनका स्वागत किया गया.

कलाम के राष्ट्रपति बनने के बाद देशभर में कुछ इस तरह उनका स्वागत किया गया.

एपीजे अब्दुल कलाम की राजनीति

खुद को ‘वर्किंग प्रेसिडेंट’ वाले के. आर. नारायणन सत्ताधारी एनडीए के लिए परेशानी का सबब बने और उसने सीख लेते हुए 2002 में उसने एपीजे अब्दुल कलाम के रुप में बेशक एक ‘अराजनीतिक’ राष्ट्रपति चुनना चाहा लेकिन जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि नए राष्ट्रपति राजनीतिक तो हैं ही बाकी राष्ट्रपतियों की तुलना में अपने एजेंडे को लेकर बहुत मुखर भी हैं.

राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार नियुक्त होने के तुरंत बाद एपीजे अब्दुल कलाम का इंटरव्यू छपा. इंटरव्यू करने वाले ने उनसे सवाल पूछा कि राष्ट्रपति के रुप में आप अपनी भूमिका के रुप में क्या सोचते हैं ? भावी राष्ट्रपति का जवाब लीक से हटकर था कि ‘पोरबंदर में  3000 बच्चों के बीच एक ने मुझसे सवाल पूछा कि हमलोगों के लिए आपका संदेश क्या है और मैंने कहा कि हमारे मन में हमेशा अपने देश का ख्याल चलते रहना चाहिए, देश हमेशा व्यक्ति से बड़ा होता है और किसी राष्ट्रपति के लिए भी यही बात प्रासंगिक है.’

लेकिन शायद इंटरव्यू करने वाला भावी राष्ट्रपति के जवाब से संतुष्ट नहीं था. उसे लग रहा था कि किसी वैज्ञानिक के लिए राजनीति की रोजमर्रा की पेचीदगियों को समझ और सुलझा पाना मुमकिन नहीं. सो उसने सीधे-सीधे पूछ लिया कि सियासत की जटिलताओं को आप कैसे संभालेंगे भला ? एपीजे अब्दुल कलाम का जवाब था कि ‘राजनीति की मेरी परिभाषा थोड़ी अलग है. राजनीति का मतलब है ऐसे नेता तैयार करना जो देश को ऊंचाई का मकाम बख्शने वाली नीतियां बनायें. बहुमुखी नेतृत्व ही देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकता है.

वे मानते थे कि वैज्ञानिक होना राष्ट्र को नेतृत्व प्रदान करने के लिहाज से उन्हें बाकियों की तुलना ज्यादा सक्षम बनाता है. इंटरव्यू लेने वाले को अपनी बात समझाते हुए उन्होंने कहा कि ‘वैज्ञानिकों का मिशन तनिक अलग मिजाज का भले हो लेकिन सीख उसे भी नेतृत्व की ही मिली होती है. मिशन को पूरा करने के लिए उसे परिस्थिति का विश्लेषण, रुपांकन और समेकन करना होता है और वह जानता है कि ऐसा करते हुए वह सिर्फ एक मिशन को अंजाम नहीं दे रहा बल्कि राष्ट्र के विकास में योगदान दे रहा है.

राष्ट्रपति रहते राजनीति और नेतृत्व की अपनी इसी धारणा से उन्होंने अपनी चुनी हुई भूमिका का निर्वाह किया. राजनीति के रोजमर्रा से नहीं उलझे बल्कि भारत के समग्र विकास का अपना स्वप्न ‘विजन 2020’ जहां तक हो सका संसद से लेकर देश के स्कूल-कॉलेजों तक साझा करने की कोशिश की.

2002 में गुजरात दंगों के बाद कलाम की गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी के साथ अहमदाबाद में कलाम.

2002 में गुजरात दंगों के बाद कलाम की गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी के साथ अहमदाबाद में कलाम.

राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद दंगाग्रस्त गुजरात पहुंचे थे. कयास लगाये जा रहे थे कि गुजरात के मुख्यमंत्री से कोई राजनीतिक उलझाव होगा. कहा यह भी जा रहा था कि राष्ट्रपति का दंगाग्रस्त इलाके में जाना एक तरह से सूबे की कार्यपालिका के अधिकार-क्षेत्र में हस्तक्षेप है. लेकिन राष्ट्रपति का नजरिया समस्या को लेकर सूबे की सरकार से टकराव का नहीं बल्कि रचनात्मक समाधान का था. उन्होंने घाव पर मरहमपट्टी रखने वाला बरताव किया, सूबे की सरकार से कहा राहत के इंतजाम बेहतर से बेहतर होने चाहिए. इरादा टकराव का होता तो वे राहत-कार्यों में कमियां खोज सकते थे और अमलों को फटकार भी लगा सकते थे.

किसी हालात के बारे में सुलह और समाधान के नजरिये से सोचना है, समस्या और शिकायत के नजरिए से नहीं—यह एपीजे अब्दुल कलाम की कार्यशैली की खासियत थी. इसकी एक मिसाल है आरक्षण जैसे संवेदनशील मसले पर पर उनका नजरिया. एपीजे के राष्ट्रपति पद पर रहते 2006 में तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने संविधान के 93वें संशोधन के जरिए केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम और एम्स जैसे शिक्षा के अग्रणी संस्थानों में ओबीसी तबके के विद्यार्थियों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव किया.

इस प्रस्ताव पर सवर्ण तबके के छात्रों में आक्रोश भड़क उठा. यह ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ जैसे मंच के उठ खड़े होने और एक आंदोलन का रुप लेने का वक्त था. आरक्षण-विरोधी इस माहौल के बारे में बाद के समय ने एपीजे अब्दुल कलाम ने बिल्कुल लीक से हटकर बात कही थी, ऐसी बात जो आरक्षण को मसला बनाकर समाज में भेद पैदा करने और अपने पक्ष में गोलबंदी करने की राजनीतिक पार्टियों की कोशिशों की पोल खोलती है.

उन्होंने ना आरक्षण की मुखालफत की और ना ही समर्थन बल्कि समस्या की सटीक व्याख्या करते हुए कहा कि ‘देश के नौजवान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव और बेरोजगारी की दोहरी समस्या से जूझ रहे हैं और इसका एक ही मतलब है कि हमें इंजीनियरिंग, मेडिकल, विशिष्ट विज्ञान की पढ़ाई वाले उच्च शिक्षा की संस्थाओं में सीटों की संख्या बड़ी तादाद में बढ़ा देनी चाहिए.’

इसका एक मतलब हुआ कि उच्च शिक्षा-संस्थानों में विभिन्न वंचित तबकों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व वांछित स्तर तक नहीं पहुंचा है तो इसकी वजह वर्णवादी व्यवस्था से ज्यादा इस बात में खोजी जानी चाहिए कि शिक्षा के ढांचे पर पर्याप्त सरकारी निवेश अभी तक क्यों ना हुआ. शायद एपीजे कलाम सरीखा वैज्ञानिक सोच वाला व्यक्ति ही इतने सुलझे तरीके से यह बात राजनेताओं के आगे रख सकता था.

बेशक रोजमर्रा की राजनीति को लेकर उनके कुछ फैसलों की आलोचना हुई. मिसाल के लिए 2005 में राज्यपाल बूटा सिंह की चिट्ठियों के आधार पर केंद्र की यूपीए सरकार ने बिहार विधानसभा को भंग करने का फैसला किया. एपीजे अब्दुल कलाम उस समय रुस में थे और उन्होंने बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुमति दे दी.

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बिहार विधानसभा को भंग करने का फैसला असंवैधानिक था. इससे राष्ट्रपति के बारे में संदेश गया कि उन्होंने केंद्र सरकार के फैसले को तौलने या नकारने का साहस नहीं दिखाया. शायद अपनी इसी आलोचना को ध्यान में रखकर आगे उन्होंने सरकारी फैसले को नकारने का साहस दिखाना जरुरी समझा और‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ बिल पर दस्तखत करने से मना करते हुए उसे सरकार को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया.

दरअसल उस वक्त चुनाव आयोग की सिफारिश पर समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन को राज्यसभा की सदस्यता से अयोग्य ठहराया गया था. तर्क था कि सांसद रहते उन्होंने उत्तर प्रदेश फिल्म डिवीजन काउंसिल का अध्यक्ष पद संभाला जो कि ‘लाभ का पद’ है. इसी को आधार बनाकर विपक्ष (बीजेपी) ने सोनिया गांधी के एनएसी (नेशनल एडवाइजरी काउंसिल) के अध्यक्ष होने पर सवाल उठाये और राष्ट्रपति (एपीजे कलाम) को एक अर्जी दी. अर्जी पर किसी निर्णय से पहले संसद में हंगामे के बीच ‘लाभ का पद’ मामले में सोनिया गांधी ने संसद की सदस्यता से इस्तीफा देना ज्यादा उचित समझा.

लेकिन एपीजे अब्दुल कलाम का राष्ट्रपति होना सियासत के रोजमर्रा के फैसले के लिहाज से नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व में समाए साधुता के गुण के कारण अहम है और किसी भी वक्त इसी गुण के कारण याद किया जाएगा.

राष्ट्रपति भवन में एक संत

राष्ट्रपति रहते एपीजे अब्दुल कलाम ने इस पद को नई नैतिक आभा दी. राष्ट्रपति बनने से तुरंत पहले उनसे एक इंटरव्यू में सवाल पूछा गया कि कहीं आपको अल्पसंख्यक समुदाय का सदस्य होने के कारण तो इस पद के योग्य नहीं समझा गया. एपीजे का जवाब था कि- ‘क्या सचमुच ऐसा है, मैंने तो हमेशा अपने को भारतीय के रुप में ही सोचा है.’

और इसमें शायद ही किसी को शक हो कि एपीजे अब्दुल कलाम भारतीयता को ठीक-ठीक उसी अर्थ में समझते थे जो संविधान-निर्माताओं के सपने में था. संविधान-निर्माताओं का सपना एक ऐसे भारत को गढ़ने का था जहां सत्ता के सबसे ऊंचे आसन तक देश के सबसे कमजोर आदमी की पहुंच हो और अपने राष्ट्रपति रहते एपीजे अब्दुल कलाम ने मन-वचन-कर्म से ऐसा ही किया.

2006 में विशाखापट्टनम में नेवी अधिकारियों के बच्चों से बात करते कलाम.

2006 में विशाखापट्टनम में नेवी अधिकारियों के बच्चों से बात करते कलाम.

उनके राष्ट्रपति रहते देश में पहली बार हुआ कि सत्ता का सर्वोच्च महल आम जनता के आवास में तब्दील हुआ. एक दफे उन्होंने 6000 किसानों को राष्ट्रपति भवन बुलाया तो दूसरी दफे भारत के कोने-कोने से आये 250 पुलिसकर्मियों की बैठक के लिए राष्ट्रपति भवन का प्रांगण खुला. पोस्टमैन और गांव के सरपंच तक की बैठक अगर राष्ट्रपति भवन में हो सकी तो इसलिए कि एपीजे अब्दुल कलाम अपने निजी और सार्वजनिक जिंदगी में अदने और अव्वल के बीच कोई भेद नहीं करते थे.

राष्ट्रपति बनने के बाद एक बार अपने पुराने दफ्तर तिरुअनंतपुरम के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर पहुंचे. बीते वक्त में यहां बतौर वैज्ञानिक काम करते वक्त वे दोपहर के खाने के लिए एक खास रेस्तरां में जाते थे. उस रास्ते में एक मोची बैठा करता था. विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर में काम करते इस मोची से उनका अपनापा हो गया था, सो कभी-कभी जूतों की मरम्मत करनी होती तो उसके पास रुककर बड़ी देरतक आत्मीयता से बतियाते थे.

राष्ट्रपति बनने के बाद जार्ज नाम का यह मोची उनके ख्यालों में बना रहा. स्पेस सेंटर पहुंचने के बाद उन्होंने अपने प्रिय ‘जार्ज’ से भेंट की और तमिल में पूछा- जार्ज, इप्पिडी इरिक्क ? सौख्याम्मा ?(जार्ज, कहो कैसे हो, कुशल तो है?)

रिपोर्ट छपी कि राष्ट्रपति को सामने देख वह मोची हक्का-बक्का रह गया, सिर हिलाकर एक छोटा-सा जवाब दे पाया था वह!

लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी, राष्ट्रपति ने केरल की राजकीय यात्रा के दौरान गेस्ट हाऊस में उसे विशेष आदर-सत्कार के साथ बुलवाया. शायद केरल के इतिहास में पहली बार हुआ होगा जब हमारे विशाल लोकतंत्र के कतार में सबसे पीछे खड़ा एक शख्स राष्ट्पति का अतिथि बनकर वहां के राजभवन की सीढ़ियां चढ़ा.

पांच वक्त के नमाजी थे एपीजे अब्दुल कलाम लेकिन देश के अलग-अलग धर्म-समुदायों के बीच पुल बनाने का काम उनसे बेहतर तरीके से शायद ही कोई कर पाया हो. पवित्र रामेश्वरम में एक मौलाना के घर जन्मे एपीजे के राष्ट्रपति नियुक्त होने पर रामेश्वर मस्जिद के इमाम नुरुल खुदा बतौर अतिथि आमंत्रित थे तो रामेश्वरम् मंदिर के वेंकटसुब्रम्णयम् शास्त्रीगल और रामेश्वरम् चर्च के रेवरेंड एजी लियोनार्ड भी.

विज्ञान का यह संत राष्ट्रपति भवन एक सपना लेकर आया था- भारत के नव-निर्माण का सपना! राष्ट्रपति रहते उन्हें इस बात का संतोष रहा कि भारत को विकसित देश बनाने के अपने स्वप्न विजन 2020 को वह संसद को बताने में कामयाब रहे और 14 राज्यों के सरकारों को भी उससे सहमत किया. जीवन की आखिरी पल तक उनकी कोशिश अपने सपने से देश की भावी पीढियों को सहमत करने की थी. मलाल बस एक बात का रहा कि आखिर कोई राजनेता यह क्यों नहीं बताता कि भारत में हरेक को जरुरत भर का रोटी, कपड़ा, मकान, सेहत, शिक्षा और आवास कब उपलब्ध होगा ?

आप चाहें तो कह सकते हैं कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे ऊंचे आसन तक पहुंचने वाले विज्ञान के इस संत के पास देश के लिए इस स्वप्न के सिवाय और कुछ भी ना था, वे आजीवन एक कमरे में रहे यह अलग बात है कि उस कमरे में उनके साथ पूरा देश रहता था!

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