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जन्मदिन विशेष गौतम अडानी: धंधा दिमाग से होता है किताबों से नहीं

गौतम अडानी को किस्मत का साथ जरूर मिला, लेकिन उन्होंने सबकुछ किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ा

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Jun 24, 2017 06:54 PM IST

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जन्मदिन विशेष गौतम अडानी: धंधा दिमाग से होता है किताबों से नहीं

आज देश के चुनिंदा अरबपतियों में गिने जाने वाले गौतम अडानी को यह सब विरासत में नहीं मिला था. उन्हें किस्मत का साथ जरूर मिला लेकिन उनकी कोशिशें भी कम नहीं थीं. 8 भाई-बहनों में एक गौतम अडानी के घर की हालत ऐसी नहीं थी कि वे अरबपति बनने का ख्वाब भी देख सकें. लेकिन अपनी जिद और विजन के दम पर उन्होंने ऐसा कर दिखाया.

खुद लिखी अपनी तकदीर

अडानी ने अपनी किस्मत अपनी मेहनत से बनाई है. ऐसे दौर में जब उनका परिवार वित्तीय तंगी से जूझ रहा था तब उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर खुद अपना रास्ता बनाने का फैसला किया. उनके इस फैसले से उनके पिता शांतिलाल अडानी कतई खुश नहीं थे. लेकिन अपनी धुन के पक्के गौतम अडानी ने वही किया जो उन्होंने करना चाहा.

कॉलेज की पढ़ाई भले ही पूरी न हो सकी लेकिन अडानी ने अपने दम पर अडानी पावर लिमिटेड की शुरुआत की. इनकी कामयाबी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इनका शुमार फोर्ब्स मैगजीन के टॉप 10 भारतीयों में हुआ था. अप्रैल 2017 तक इनकी संपत्ति 6.3 अरब डॉलर है.

खून में है धंधा

गुजराती-जैन परिवार से निकले अडानी की रगों में धंधा खून बनकर दौड़ता है. उनके माता पिता शांताबेन और शांतिलाल अडानी को इस बात का अंदाजा नहीं था कि एक दिन उनका बेटा अरबों रुपए का मालिक होगा. अडानी का परिवार पूर्वी गुजरात के थराड से अहमदाबाद आया था. शांतिलाल अडानी के 8 बच्चे थे. लिहाजा अपने बच्चों को बेहतर जिंदगी देने के लिए उन्हें अहमदाबाद आना पड़ा था.

अडानी की एक खासियत थी कि वे लोगों की कहीसुनी बातों पर ध्यान नहीं देते थे. उन्हें नाकामियों से डर नहीं लगता था. वे सिर्फ अपने विजन और आइडिया पर चलते थे. अपनी इसी खूबी के कारण वे यह मुकाम हासिल करने में कामयाब रहे हैं. अडानी ने सब अपने दम से कमाया, अपने दम से बनाया.

कैसा रहा सफर

गौतम अडानी की शुरुआती पढ़ाई अहमदाबाद के सीएन विद्यालय से हुई. ग्रेजुएशन के लिए उन्होंने गुजरात यूनिवर्सिटी के कॉमर्स में दाखिला तो लिया, लेकिन वह पढ़ाई पूरी नहीं कर सके. कॉलेज के दिनों में उन्हें लगने लगा था कि किताबी पढ़ाई उनके लिए नहीं है.

उन्हें हर वक्त यह लगता था कि यह वक्त कुछ बड़ा करने का है. ग्रेजुएशन के दूसरे साल में उन्होंने कॉलेज छोड़कर सबको चौंका दिया. जेब में सिर्फ 100 रुपए लेकर अडानी सपनों की नगरी मुंबई पहुंचे. यहां उन्हें पहली नौकरी महिंद्र ब्रदर्स के मुंबई ब्रांच में मिली. यहां उनका काम हीरे छांटना था. कारोबार का ककहरा सीखते-सीखते अडानी अपने दिमाग में आगे की रणनीति भी तय कर रहे थे. अडानी ने मुंबई के सबसे बड़े ज्वैलरी मार्केट जावेरी बाजार में डायमंड ब्रोकरेज का काम शुरू किया था.

एक कॉल ने बदल दी जिंदगी

एक साल बाद उनके बड़े भाई महासुख अडानी ने अहमदाबाद में एक प्लास्टिक यूनिट खरीदी. महासुख चाहते थे कि गौतम अडानी वापस लौट आए और उनके कारोबार की एक फ्रेंचाइजी संभालें. अपने भाई के एक फोन कॉल पर वह वापस लौट आए. यह अडानी के कारोबारी जीवन का एक अहम मोड़ था. उन्होंने पीवीसी (पोलीविनाइल क्लोराइड) आयात करना शुरू कर दिया था. इसके बाद से ही अडानी का ग्लोबल ट्रेडिंग शुरू हुआ था.

गौतम अडानी को किस्मत का साथ जरूर मिला, लेकिन ऐसा नहीं था कि उन्होंने खुद को किस्मत के भरोसे छोड़ दिया था. अडानी का फोकस नतीजों के बजाय कोशिश पर रहता था. इसी वक्त देश में वैश्विकीकरण और उदारीकरण का दौर चल रहा था.

उस दौर का फायदा उठाते हुए अडानी ने 1988 में अडानी ग्रुप की नींव डाली. शुरुआती साल में ग्रुप का फोकस एग्रो कमोडिटी और पावर पर रहा. 1991 तक कंपनी दोनों कारोबार में बेहतर कर रही थी. लेकिन अडानी का मानना था कि यह दूसरे कारोबार में उतरने का सही वक्त है.

इसके बाद अडानी ग्रुप एनर्जी और लॉजिस्टिक्स में भी शामिल हुई. साथ ही पावर जेनरेशन और ट्रांसमिशन, कोल ट्रेडिंग एवं माइनिंग, गैस डिस्ट्रीब्यूशन, ऑयल  एवं गैस एक्सप्लोरेशन में भी हाथ आजमाया.

विवादों से नाता

सरकार के साथ गौतम का मतभेद भी जगजाहिर रहा. अपने कुछ कारोबार में वह लैंड डील को लेकर विवादों में रहे हैं. वहीं उनके कुछ कारोबार को पर्यावरण विभाग की मंजूरी नहीं मिली. वहीं अब नरेंद्र मोदी सरकार के साथ उनके संबंध भी विवादों से परे नहीं है. सरकार के साथ उनकी नजदीकियां आम हैं. कौड़ियों के भाव अडानी को जमीन देने पर मोदी सरकार की भी आलोचनाएं होती रहती हैं.

अडानी पहले भी दूसरों की बातों के बजाय अपने काम पर फोकस करते थे और आज भी वह यही कर रहे हैं.

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