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बहुत छोटी थी, बंटवारे के बाद लाहौर से आए रिश्तेदारों का गम नहीं समझ सकी

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता आजादी के समय विभाजन के दर्द को याद कर रही हैं

Sheila Dixit Updated On: Aug 14, 2017 05:34 PM IST

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बहुत छोटी थी, बंटवारे के बाद लाहौर से आए रिश्तेदारों का गम नहीं समझ सकी

मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है इंडिया का पार्टीशन. बहुत से हमारे अपने रिश्तेदार लोग खास कर मेरी मां के साइड के लाहौर और रावलपिंडी से चल कर मेरे घर रहने आए थे.

वो रिश्तेदार हमलोगों के लिए अनजाने थे. उस समय रिश्तेदारों से मेरा घर खचाखच भर गया था. वो लम्हा हमलोगों को बड़ा एक्साइटिंग लगा.

हमलोगों को यह एहसास नहीं हो रहा था कि हिंदुस्तान का बंटवारा हो गया है. हमलोगों को सिर्फ लग रहा था कि मेरे घर के सारे कमरे भर गए हैं. हर कमरे में मेहमान सो रहे हैं. रिश्तेदारों के साथ हमलोग खाना खा रहे हैं. घर में ऐसा माहौल था जैसे कोई त्योहार का मौका हो.

इसी तरह की याद गांधी जी से भी जुड़ी हुई है. जिस जगह पर गांधी जी को मारा गया था, उस जगह से कुछ ही दूरी पर हमलोग रहते थे.

हमारा मकान डुप्ले रोड पर था. शायद आज राजाजी मार्ग कहलाता है. शाम का वक्त था एकाएक हमलोगों ने देखा कि भगदड़ मच गई. लोग हमारे घर के सामने से भाग रहे थे.

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हमलोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है. लोग जोर-जोर से चिल्ला रहे थे कि मार दिया, मार दिया, गांधी जी को मार दिया. हमलोग डर गए. हमारे परिवार में गांधी जी को भगवान का रूप माना जाता था.

हमलोगों को लगा कि अब जब भगवान ही मर गए तो हमलोग सब खत्म हो जाएंगे. पृथ्वी नष्ट हो जाएगी. जब भगवान ही नहीं रहा तो हमलोग कहां से रहेंगे? ये डर सताने लगा. हम बहनें डर गए.

उस रात मेरी मां ने हमलोगों को सुलाया. जब अगले दिन हमलोग सुबह उठे तो एक तरह से यह एहसास हुआ कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है, जैसा कि शाम और रात को हमलोग सोच रहे थे. न हमलोग मरेंगे और न ही दुनिया समाप्त होने वाली है.

महात्मा जी को जिस तरह से मारा गया वह एक गंभीर दुर्घटना थी. उस समय ऐसा लग रहा था कि मानो मेरे घर के अंदर कुछ दुर्घटना हो गई हो. हम बहनें काफी छोटे थे. मैं उस वक्त लगभग 10 साल की थी.

मेरी मां कभी किसी की पूजा नहीं करती थीं. हमारे घर में केवल महात्मा गांधी की फोटो ही लगी रहती थी.

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इतना एहसास हमलोगों को जरूर हो रहा था कि देश में सरकार बदल गई है. पंडित जवाहरलाल नेहरू हमारे प्रधानमंत्री बने हैं. पर, हमलोगों को यह एहसास नहीं था कि प्रधानमंत्री के क्या मायने हैं और क्या हैसियत थी?

जब हमलोग बड़े होते गए तो पता चलता गया कि पंडित जवाहरलाल नेहरू क्या हैं? पंडित जवाहरलाल नेहरू से हमलोगों को लगाव इसलिए हुआ कि उन दिनों हर रोज अखबारों में पंडित नेहरू की कहीं न कहीं फोटो छपा करती थी.

उस समय सिर्फ दो ही अखबार हुआ करते थे. एक हिंदुस्तान टाइम्स दूसरा टाइम्स ऑफ इंडिया. हमलोग पंडित नेहरू का फोटो अखबार में देख कर समझ लेते थे कि जब पंडित जी की फोटो आज आ गई है तो देश और दुनिया में सब कुछ ठीक-ठाक ही होगा.

आज-कल के जो चैलेंजेज हैं, प्राइस राइजेज उसका एहसास हमलोगों को नहीं था. थोड़ी सी दिल्ली में गाड़ियां थीं. हमलोग बचपन में दिल्ली में चल रहे गाड़ियों के नंबर लिखा करते थे. दिल्ली में उस समय हजार-पंद्रह सौ से ज्यादा गाड़ियां नहीं थीं. उस समय की गाड़ियां आजकल की गाड़ियों से भिन्न थी. विदेशों से ये गाड़ियां आती थीं. तब तक एंबेसडर, जो कोलकाता में बनाई जाती थी. भी नहीं आई थी.

हमलोगों का एक जीवन स्कूल का था. एक जीवन थोड़ा बहुत म्यूजिक का था. क्योंकि, रेडियो भी 24 घंटे नहीं चलते थे और टेलीविजन तो था ही नहीं. रेडियो पर एक-दो घंटे सुबह दो-तीन घंटे दोपहर और तीन-चार घंटे शाम सिर्फ न्यूज वगैरह सुन लिया करते थे.

खेल वगैरह यही होता था कि पेड़ पर चढ़ गए उतर गए. कुछ दोस्त आ गए. हमलोगों का ऐसा जीवन था जिसकी कल्पना आज कोई भी नहीं कर सकता.

हमलोग पहली कक्षा में थे तो हिंदी सीखना शुरू किया था. हमारे हिंदी के टीचर जब पढ़ाने आते थे तो हमलोग उनका मजाक उड़ाते थे. हमलोगों को लगता था कि हमारी भाषा तो अंग्रेजी है. नुकसान ये हुआ कि आज तक मुझे हिंदी में कठिनाई आ रही हैं.

बहरहाल, जमाना चलता ही गया. हमलोगों ने पंडित नेहरू का भी जमाना देखा. हमलोग पंडित नेहरू के कोठी में उनको देखने कभी-कभार चले जाते थे. हमलोगों को कोई रोकता नहीं था. हमलोग गेट पर जा कर गार्ड से कहते थे कि पंडित नेहरू को देखना चाहते हैं तो गार्ड बोलता है अच्छा यहां पर खड़े हो जाओ वह अभी निकलने वाले हैं. पंडित नेहरू जब निकलते तो हमलोग उनकी तरफ हाथ हिलाते थे. पंडित नेहरू भी कभी हाथ हिला देते तो कभी वैसे चले जाते थे. तीन-चार बजे वो अपनी एंबेस्डर गाड़ी से निकलते थे. कोई सुरक्षा नहीं था सबकुछ ओपेन था.

हमलोगों की उम्र करीब 10-12 साल की थी. हमलोग समझते थे कि महात्मा गांधी के बाद देश में पंडित नेहरू ही बड़े लीडर हैं. हमलोगों को उस समय दूसरे किसी नेता का उतना नाम याद नहीं था.

स्वतंत्रता दिवस के बारे में हमलोगों को सिर्फ इतना एहसास होता था कि पंडित नेहरू रेड-फोर्ट पर जाकर झंडा फहराएंगे और अपना भाषण देंगे. लेकिन, उस समय कोई टेलीविजन नहीं था. हमलोग देख नहीं पाते थे, हां उनका भाषण रेडियो पर हमलोग अपने पैरेंट्स के साथ सुनते जरूर थे. घर के सीनियर्स ज्यादा सुनते थे. हमलोगों को ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती थी.

हां, 26 जनवरी की दिलचस्पी जरूर होती थी. मेरे फादर का दफ्तर साउथ ब्लॉक में था. वो जब साउथ ब्लॉक में रहते थे हमलोग 26 जनवरी देखने साउथ ब्लॉक चले जाते थे. उनके कमरे के बाहर खड़े हो जाते थे.

हमलोग सिर्फ कारवां जाते ही देख पाते थे थे. लेकिन, आज जहां प्रेसिडेंट सेल्यूट लेते हैं उस समय भी वहीं पर सेल्यूट लिया जाता था. यह दृश्य हमलोग नहीं देख पाते थे.

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हां, अगले दिन पेपर्स में उनके फोटोग्राफ्स आते थे तो हमलोगों को बहुत खुशी होती थी कि जिस जगह पर पंडित जी खड़े हैं, जिस जगह पर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद खड़े हैं, जिस जगह पर कुछ कैबिनेट मिनिस्टर जैसे किदवई वगैरह खड़े हैं. वहां मैं भी गई थी और ये लोग हमारे करीब थे.

लेकिन, मैं सच बताती हूं कि हमलोगों को न रुचि थी न ही कोई दिलचस्पी थी. राजनीति से हमलोगों को कोई दिलचस्पी नहीं थी. हमलोगों को ये लगता था कि हमारे माता-पिता हमें पढ़ा रहे हैं, हमें खाना मिल जाता है. जब जरूरत होती है गाड़ी मिल जाती है, पिकनिक्स करने कुतुबमिनार और ओखला चले जाते हैं. ये मेरा सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए होता था.

सिनेमा देखने का मन होता तो कभी रीगल या ओडियन में चले गए वो भी किसी बड़े के साथ. रेस कोर्स में भी उस समय एक छोटा सिनेमा हॉल हुआ करता था, जिसका किराया शायद एक पैसे था. क्योंकि हमलोग कॉंवेंट स्कूल में पढ़ रहे थे इसलिए हिंदी की फिल्में कम और अंग्रेजी की फिल्में ज्यादा देखते थे.

15 अगस्त की असली अहमियत और उसके मायने मुझे मेरे विवाह के बाद पता चले. 15 अगस्त के बारे में पता तो था जैसा मैंने पहले कहा है. पर, दिलचस्पी शादी के बाद कुछ ज्यादा ही होने लगी. मेरे ससुर एक फ्रीडम फाइटर थे और मेरे पति एक आईएएस ऑफिसर थे.

हमको अच्छी तरह याद है जब पंडित जवाहर लाल नेहरू के बुलावे पर 15 अगस्त के दिन मेरे ससुर को गाड़ी लेने और छोड़ने आती थी.

नेशनल हेराल्ड पेपर में 15 अगस्त की कवरेज ज्यादा होती थी. हमें लगने लगा कि ये भी एक फ्रीडम फाइटर का अखबार है. उस समय नेशनल हेराल्ड लखनऊ से पब्लिश होता था. फ्रीडम स्ट्रगल के वक्त इस अखबार को बनाया गया था.

नेशनल हेराल्ड पढ़-पढ़ कर मुझे मालूम हुआ कि देश आजादी से पहले क्या था और आजादी के बाद क्या बना. एक डिवाइडिंग लाइन पता चली. तब मुझे इससे ज्यादा अटैचमेंट होने लगा. फ्रीडम फाइटर कैसे जेल काटते थे और आजादी के समय जेल जाना भी एक फख्र की बात हुआ करता था.

कुल मिलाकर 15 अगस्त के दिन खुशी तो होती थी. लेकिन, आवाम के लिए 26 जनवरी की ज्यादा अहमियत थी. लोगों में भी उत्साह 26 जनवरी को लेकर ज्यादा होता था.

हमलोग उस दिन सिनेमा देखने भी जाते थे. सिनेमा शुरू होने से पहले उस समय सात-आठ मिनट का पर्दे पर पिछले हफ्ते की न्यूज भी दिखाई जाती थी. सिनेमा देखने के दौरान ही हमें यह भी पता चल जाता था कि देश और दुनिया में क्या चल रहा है.

(लेखिका कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री हैं.)

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