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जन्मदिन विशेष: जब संगीत ने कहा- मुकेश के गीत अमर कर दो

मुकेश ने अपने करियर में डेढ़ हजार से भी कम गाने गाए. लेकिन ऐसा लगता है मानो हर गाना हिट था

Shailesh Chaturvedi Updated On: Jul 22, 2017 09:49 AM IST

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जन्मदिन विशेष: जब संगीत ने कहा- मुकेश के गीत अमर कर दो

जिंदगी में सबसे मुश्किल काम है सहजता और सरलता. किसी काम को आसान बना देना सबसे मुश्किल है. एक आवाज है, जिसे सुनकर लगता है कि ऐसा तो हम भी गा सकते हैं. प्रेमियों को जुदाई या अलगाव के समय इस गायक की याद आती है. न जाने कितने प्रेमियों को अलगाव के समय इसी गायक की याद आई होगी. गायक का नाम है मुकेश चंद्र माथुर.

एक गीत है - झूमती चली हवा, याद आ गया कोई... शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस गाने की भी खासियत है सहजता. दिल को छू लेने का अपना अंदाज. यही खासियत मुकेश जी की.

22 जुलाई 1923 को दिल्ली में जन्मे मुकेश उस दौर में आए ऐसे गायक थे, जिन्हें शास्त्रीय संगीत के लिए नहीं जाना जाता. लेकिन औसत के लिहाज से देखें, तो मुकेश के हिट गाने सबसे आगे दिखाई देंगे.

मुकेश के पिता जोरावर चंद माथुर इंजीनियर थे. दस बच्चों में मुकेश छठे नंबर पर थे. मुकेश की बहन सुंदर प्यारी को संगीत सिखाने एक शिक्षक आते थे. मुकेश साथ के कमरे से सुनते और सीखते थे. दसवीं के बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और कुछ समय पीडब्ल्यूडी में काम किया. उन्हें मोतीलाल ने अपनी बहन की शादी में गाते सुना, जो उनके दूर के रिश्तेदार थे.

मोतीलाल उन्हें मुंबई ले आए, जहां पंडित जगन्नाथ प्रसाद से मुकेश ने सीखना शुरू किया. 1945 में फिल्म आई पहली नजर. मोतीलाल फिल्म में थे. मुकेश ने गाया – दिल जलता है तो जलने दे. लोगों को लगा कि यह के एल सहगल हैं. सहगल ने गाना सुना और कहा कि ताज्जुब है, मुझे याद नहीं आ रहा कि मैंने ये गाना कब गाया.

हर गाना हिट था

नौशाद साहब को श्रेय दिया जा सकता है, जिन्होंने मुकेश को उनके अपने स्टाइल में गाने के लिए प्रेरित किया. धीरे-धीरे हर संगीतकार एक खास किस्म के गाने के लिए मुकेश को ढूंढता था. राज कपूर की तो वो आवाज ही बन गए.

शंकर-जयकिशन के गानों का अभिन्न हिस्सा थे मुकेश. 1974 में उन्हें रजनीगंधा फिल्म के गाने कई बार यूं ही देखा है के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. कहा जाता है कि उन्होंने डेढ़ हजार से भी कम गाने गाए. ये संख्या बाकी गायकों के मुकाबले काफी कम है. लेकिन ऐसा लगता है मानो हर गाना हिट था.

क्रिकेटर चंद्रशेखर उनकी आवाज के बड़े प्रशंसक हैं. मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर भी. कुछ समय पहले जब भारतीय क्रिकेट टीम कानपुर में रुकी, तो सचिन तेंदुलकर ने होटल स्टाफ से एक डिमांड की. जानते हैं क्या? उन्होंने मुकेश के गानों की सीडी मांगी. इससे आप हर पीढ़ी में मुकेश की लोकप्रियता का आलम समझ सकते हैं.

घर से भागकर मुंबई में शादी की

मुकेश की शादी की कहानी बड़ी रोचक है. उन्होंने सरल त्रिवेदी से शादी की, जो रायचंद त्रिवेदी की बेटी थीं. रायचंद जी गुजराती ब्राह्मण थे, जिनके पास अकूत संपत्ति थी. मुकेश के पास न कमाई का जरिया था.. न कोई घर था. ऐसे पेशे से जुड़े थे, जिसे रायचंद जी अच्छा नहीं मानते थे. उन्होंने शादी को मंजूरी नहीं दी. मुकेश जी सरल को लेकर भाग गए.

उन्होंने मुंबई में कांदिवाली के मंदिर में 22 जुलाई 1946 को शादी कर ली. मुकेश तब 23 साल के थे. मोतीलाल ने मदद की. हालत ये थी कि शादी के बाद कुछ दिनों तक दोनों फर्श पर सोए, क्योंकि घर में कुछ नहीं था.

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मुकेश जी के पांच बच्चे हुए, जिनमें नितिन मुकेश गायक बने. अपने पुत्र के साथ मुकेश अगस्त 1976 में अमेरिका गए, यहां उन्हें कॉन्सर्ट में हिस्सा लेना था. 27 अगस्त का दिन था. सुबह उठे, नहाए और बाथरूम से बाहर आए, तो पसीना-पसीना थे. सीने में तेज दर्द था. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. वहां उनकी मौत हो गई. कॉन्सर्ट को लता मंगेशकर और मुकेश के सुपुत्र नितिन ने पूरा किया.

लता जी मुकेश को भैया कहती थीं. वो उनके पार्थिव शरीर के साथ भारत आईं. मुकेश की मौत के बाद भी उनके कुछ गाने आए, जो पहले रिकॉर्ड हो गए थे. खास तौर पर 1978 में कई फिल्में आईं, जिनमें उनके गाने थे. यहां तक कि उनके गाने वाली आखिरी फिल्म 1997 में आई, जिसका नाम था चांद ग्रहण. मौत के 21 साल बाद. इसमें कैफ़ी आज़मी के गीत को जयदेव ने संगीत दिया था.

Lata Ji with Mukesh

गायक मो. रफी और मुकेश के साथ लता मंगेशकर (फोटो: फेसबुक से साभार)

राग-सुरों के बारे में क्या जानता है

मुकेश जी का एक बड़ा दिलचस्प किस्सा कहीं पढ़ा था. मुकेश एक गाने की रिहर्सल के बाद संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के कल्याणजी के म्यूजिक रूम से निकले. एक प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत से जुड़े गायक वहां थे. मुकेश के जाने के बाद उन्होंने कहा कि कैसी विडंबना है, ये आदमी राग और सुरों के बारे में क्या जानता है. लेकिन वो मर्सिडीज से जा रहा है और मुझे बस से जाना पड़ेगा.

कल्याणजी ने उन्हें अपने साथ बिठाया. कहा- एक गाना सुना दीजिए. गाना था- चंदन सा बदन, चंचल चितवन. गायक ने गाना शुरू किया. उन्होंने तमाम जगह मुरकियां लीं. कल्याणजी ने उन्हें फिर से नोट्स समझाए और कहा कि यहां मुरकियां नहीं हैं. उन्होंने फिर से इसे गाया लेकिन मुरकियां कम नहीं हुईं. कल्याणजी भाई ने कहा- अब आपको पता चला कि वो मर्सिडीज से क्यों घूमते हैं. आसान गाना भी आसान काम नहीं है.

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